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सचेतन 2.12: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी अप्रत्यक्ष उपमान अलंकार हैं।

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हनुमान जी से आप सीख ले कर सिर्फ़ कर्म को विशिष्टता और उत्कृष्टता के साथ करते रहें।  अलंकार चारुत्व को कहते हैं। यह हनुमान जी  का सौंदर्य, चारुत्व, काव्य रूप में उनकी शोभा का धर्म ही अलंकार का व्यापक अर्थ है। यह अलंकार को महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में प्राणभूत तत्त्व के रूप में लिखा है।  सीता माता की खोज में चलते हुए वे परम तेजस्वी महाकाय महाकपि हनुमान् आलम्बन हीन आकाश में पंखधारी पर्वत के समान उड़ रहे थे। वे बलवान् कपिश्रेष्ठ जिस मार्ग से वेग पूर्वक निकल जाते थे, उस मार्ग से संयुक्त समुद्र सहसा कठौते या कड़ाह के समान हो जाता था (उनके वेगसे उठी हुई वायु के द्वारा वहाँ का जल हट जाने से वह स्थान कठौते आदि के समान गहरा-सा दिखायी पड़ता था)। पक्षी-समूहों के उड़ने के मार्ग में पक्षिराज गरुड़ की भाँति जाते हुए हनुमान् वायु के समान मेघमालाओं को अपनी ओर खींच लेते थे। आप हनुमान जी का हरेक वर्णन विशिष्टता और उत्कृष्टता उपमा अलंकार के समान है और अपने जीवन में यह सीखना चाहिए। जब आपके कार्य की तुलना अत्यंत समानता के कारण किसी अन्य प्रसिद्ध वस्तु या अवस्था या लोगों से या प्राणी से की जात...

सचेतन 2.11: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - उत्कृष्टता के प्रदर्शन में विशेष उपमा होती है

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कपिकेसरी अपने प्रचण्ड वेग से समुद्र में बहुत ऊँची-ऊँची तरंगों को आकर्षित करते हुए सीता माता की खोज में आगे बढ़ रहे थे  कल हमने बात किया था की आपके कार्य में उत्कृष्टता स्वाभाविक होनी चाहिये। सीता माता की खोज में चलते हुए सूर्य के समान विशालकाय हनुमान्जी अपनी पूँछ के कारण ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो कोई बड़ा गजराज अपनी कमर में बँधी हुई रस्सी से सुशोभित हो रहा हो। हनुमान्जी का शरीर समुद्र से ऊपर- ऊपर चल रहा था और उनकी परछाईं जल में डूबी हुई सी दिखायी देती थी। इस प्रकार शरीर और परछाईं दोनों से उपलक्षित हुए वे कपिवर हनुमान् समुद्र के जल में पड़ी हुई उस नौका के समान प्रतीत हो रहे थे, जिसका ऊपरी भाग (पाल) वायु से परिपूर्ण हो और निम्न भाग समुद्र के जल से लगा हुआ हो। वे समुद्र के जिस- जिस भाग में जाते थे, वहाँ-वहाँ उनके अंग के वेग से उत्ताल तरंगें उठने लगती थीं। अतः वह भाग उन्मत्त (विक्षुब्ध)-सा दिखायी देता था। महान् वेगशाली - महाकपि हनुमान् पर्वतों के समान ऊँची महासागर की रंग-मालाओं को अपनी छाती से चूर-चूर करते हुए आगे बढ़ रहे थे। कपिश्रेठ हनुमान्के शरीर से उठी हुई तथा मेघों की घटा में व्याप...

सचेतन 2.10: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - आपके कार्य में उत्कृष्टता स्वाभाविक होनी चाहिये।

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हनुमान्जी की पिंगल नेत्र चन्द्रमा और सूर्यके समान प्रकाशित होती है। आप को विचार करना है की अगर आपका लक्ष्य और रणनीति सही है तो हर कोई आपके साथ चलने को तैयार है और आपको साथ देंगे।  मेघ के समान विशालकाय हनुमान्जी अपने साथ खींचकर आये हुए वृक्षों के अंकुर और कोर सहित फूलों से आच्छादित हो जुगुनुओं की जगमगाहट से युक्त पर्वत के समान शोभा पाते थे। वे वृक्ष जब हनुमान्जी के वेग से मुक्त हो जाते ( उनके आकर्षण से छूट जाते), तब अपने फूल बरसाते हुए इस प्रकार समुद्र के जल में डूब जाते थे, जैसे सुहृद्वर्गके लोग परदेश जानेवाले अपने किसी बन्धुको दूरतक पहुंचाकर लौट आते हैं। आज हनुमान जी का वर्णन ऐसा है की जब हमें किसी कार्य में रुचि हो और उसे करने के हुनर का संगम हो, तो उसमें उत्कृष्टता स्वाभाविक रूप से दिखने लगती है। हनुमान्जी के शरीर से उठी हुई वायु से प्रेरित हो वृक्षों के भाँति-भाँति के पुष्प अत्यन्त हलके होने के कारण जब समुद्र में गिरते थे, तब डूबते नहीं थे। इसलिये उनकी विचित्र शोभा होती थी। उन फूलों के कारण वह महासागर तारों से भरे हुए आकाश के समान सुशोभित होता था। अनेक रंगकी सुगन्धित पुष्पराशि ...

सचेतन 2.8: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - अपने तेज, बल और पराक्रम के आवेश और प्राणों को हृदयमें रोककर कार्य की तैयारी करें।

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स्वातिक चिन्ह प्रायः साँप के फणों में दिखाई देनेवाली नीली रेखाओं को कहते हैं। सबने हनुमान जी के विशाल दृश्य का अहसास किया उन्होंने जो संकल्प लिया और उन कार्य को करने के लिए अपने शारीरिक बल का आवाहन किया।  कहते हैं की वो पर्वत के समान विशालकाय महान वेगशाली पवनपुत्र हनुमान्जी वरुणालय समुद्र को पार करना चाहते हैं। श्रीरामचन्द्रजी और वानरों के कार्य की सिद्धि के लिये दुष्कर कर्म करने की इच्छा रखनेवाले ये पवनकुमार समुद्र के दूसरे तटपर पहुँचना चाहते हैं, जहाँ जाना अत्यन्त कठिन है।  हनुमान जी ने समुद्र को लांघने की इक्षा से अपने शरीर को बेहद बड़ा कर लिया और अपनी दोनों भुजाओं तथा चरणों से उस मैनाक पर्वत को दवाया। इस प्रकार पर्वतको दबाने के कारण उत्पन्न हुआ वह जीव-जन्तुओं का महान् कोलाहल पृथ्वी, उपवन और सम्पूर्ण दिशाओं में भर गया। कपिवर हनुमान जी के द्वारा दबाये जाने पर तुरंत ही वह पर्वत काँप उठा और दो घड़ी तक डगमगाता रहा।  पूरे वातावरण में उन सर्प के फणों से विष की भयानक आग उगलते हुए स्वस्तिक चिह्न स्पष्ट दिखायी दे रहे थे। बड़े- बड़े सर्प उस पर्वत की शिलाओं को अपने दाँतों से डसने...

सचेतन 2.7: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - आपके घोषणा में इतनी तीव्रता होनी चाहिए की चारों ओर हलचल मच जाये

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समुन्द्र ने हनुमान जी के बाहुवल के कारण उनको श्री रघुनाथ जी का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि है अपने ऊपर इन्हे विश्राम दे। कल हमने बात किया था की सामान्य समझदारी वाले संकल्प से कार्य सिद्धी होती है। जब भी हम काम की तैयारी करें तो सबसे पहले आपने शारीरिक और मानसिक बल का विस्तार करना चाहिए। आपके आस पास के वातावरण के हलचल आपके शारीरिक और मानसिक बल के विस्तार से बढ़ेगा और आपका दृढ़ निश्चय भी उतना ही विशाल और मज़बूत होटी रहना चाहिए और यही तो हनुमान जी के चरित्र के वर्णन की विशेषता है की समुद्र लांघने के लिए और श्री राम के कार्य की सिद्धी के लिए उनका संकल्प बाधाओं से घबराया नहीं बल्कि विस्तार हुआ और बढ़ने लगा था।  सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।। बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी ।। 3 ।। समुन्द्र के तीर पर एक सुन्दर पर्वत था । हनुमान् जी खेल से ही ( अनायास ही ) कूदकर उसके ऊपर जा चढ़े और बार-बार श्री रघुवीर का स्मरण करके अत्यंत बलवान् हनुमान जी उस पर से बड़े वेग से उछले ।। 3 ।। जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।। जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही ...

सचेतन 2.6: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - संकल्प से कार्य सिद्धी होती है

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काम की तैयारी में सबसे पहले आपने शारीरिक और मानसिक बल का विस्तार करना चाहिए  जामवंत के सुन्दर वचन हनुमान जी के हृदय को बहुत ही भाए और सुनकर वे बोले हे भाई !  तुम लोग दुःख सहकर , कन्द-मूल-फल खाकर तब तक मेरी राह देखना ।।  जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।। यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा ।। 2 ।। यह कहकर और सबको मस्तक नवाकर तथा हृदय मे श्री रघुनाथजी को धारण करके हनुमान जी हर्षित होकर चलने की कामना किए और हनुमान जी कहते हैं की जब तक में सीताजी को देखकर लौट के आने से ही मुझे बहुत ही हर्ष होगा।  इस चौपाई में पहली बात है की आपने इष्ट को हमेंशा हृदय में धारण करना और एक प्रार्थना का भाव होना उनके प्रति मस्तक को नवाकर रखना। और दूसरा भाव बड़ा ही सामान्य है की किसी काम को करने से पहले एक सरल और साधारण सा लक्ष्य का होना जैसे हनुमान जी का लक्ष्य एक सामान्य समझदारी वाला है की मैं की मुझे तो सीता माता को देखने से ही ख़ुशी मिलेगी और जब मैं उनको देखकर आने से ही मुझे बहुत ही हर्ष होगा।हम सभी को जीवन में कितना ही विशाल काम करना हो, हमारा लक्ष्य ...

सचेतन 2.5: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - उचित ज्ञान और प्रभु के आशीर्वाद से सब कुछ कर सकते हैं

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जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।

सचेतन 2.3: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - अंतरात्मा में राम की भक्ति ही हनुमान का रूप है

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राम का इतिहास सनातन और अप्रमेय है जिसके प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है यह हर काल में मौजूद था और रहेगा। रामभक्त हनुमान जी, माया से मनुष्य रूप में दीखने वाले और  राम कहलाने वाले जगदीश्वर को शांत, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्षरूप परम् शांति देने वाले महसूस करते हुए, ब्रह्मा, शम्भु और शेषजी से निरन्तर सेवित, वेदान्त के द्वारा जानने योग्य समझते हुए, सर्वव्यापक, देवताओं में सबसे बड़े, जो रघुकुल में श्रेष्ठ तथा राजाओं के शिरोमणि जैसे बड़े और व्यापक रूप की वंदना करते हुए लंका में त्रिकूटांचल पर्वत शृंखला के सुंदर पर्वत के क्षेत्र की ओर प्रस्थान करते हैं और आगे सुंदरकाण्ड की रचना होती है।  राम एक जगदीश्वर का प्रतीक है जो सनातन है यानी इस रूप में ईश्वर का वर्णन का इतिहास अप्रमेय है जिसके प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती है यह पहले भी था और आज भी है और हमेंशा रहेगा।  नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ रामभक्त हनुमान जी एक महाशक्ति और असंभव को संभव बनाने वाले कृति के रूप ...

सचेतन 2.2: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हे रघुनाथ जी आप सबके अंतरात्मा हैं

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मनोवैज्ञानिक रूप में सुन्दरकाण्ड मानवीय जीवन में आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति बढ़ाने वाला है। रामान्य त्रेतायुग की कथा है और सुंदरकांड लंका में त्रिकूटांचल पर्वत शृंखला में एस एक के सुंदर पर्वत के क्षेत्र की कथा है इस पर्वत में दो अन्य शृंखला हैं सुबैल पर्वत क्षेत्र जहां पर भगवान राम और राक्षस राज रावण का युद्ध स्थल है और नील पर्वत क्षेत्र पर राक्षसों का निवास एवं महल। सुंदर पर्वत के क्षेत्र पर राक्षस राज रावण की प्रिय अशोक वाटिका थी जहां माता सीता रहती थी । सुन्दरकाण्ड का अध्ययन या पाठ करने से सर्वार्थसिद्धि की प्राप्ति होती है ।  पवननंदन व अंजली पुत्र रामभक्त हनुमान द्वारा माता सीता की खोज में त्रिकुटांचल पर्वत पर बसी लंका में परिभ्रमण किया गया था। त्रिकूटपर्वत समूह की सुंदर पर्वत क्षेत्र में स्थित अशोक वाटिका में हनुमान जी और माता सीता से मुलाकात हुई थी। अशोकवाटिका में माता सीता द्वारा हनुमान जी को अष्ट सिद्धि एवं नाव निधि का वरदान दी गयी थी। रामायण और श्रीरामचरितमानस में भगवान श्रीराम के गुणों और पुरूषार्थ को दर्शाती लेकिन सुंदरकांड श्रीराम के भक्त हनुमान की विजय का कांड है !...

सचेतन 2.1: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सर्वार्थसिद्धि की प्राप्ति

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राम की जीवन-यात्रा के सात काण्ड- बालकाण्ड, अयोध्यकाण्ड, अरण्यकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, लङ्काकाण्ड और उत्तरकाण्ड। रामायण आदिकाव्य में 'राम की जीवन-यात्रा है। इसके रचयिता महर्षि वाल्मीकि को 'आदिकवि' कहा जाता है। संस्कृत साहित्य परम्परा में रामायण और महाभारत को इतिहास कहा गया है और दोनों सनातन संस्कृति के सबसे प्रसिद्ध और लोकप्रिय ग्रन्थ हैं। रामायण के सात अध्याय हैं जो काण्ड के नाम से जाने जाते हैं। इसमें कुल लगभग २४,००० श्लोक हैं।  मान्यतानुसार रामायण का समय त्रेतायुग का माना जाता है। श्रीराम अवतार श्वेतवाराह कल्प के सातवें वैवस्वत मन्वन्तर के चौबीसवें त्रेता युग में हुआ था जिसके अनुसार श्रीरामचंद्र जी का काल लगभग पौने दो करोड़ वर्ष पूर्व का है। इसके सन्दर्भ में विचार पीयूष, भुशुण्डि रामायण, पद्मपुराण, हरिवंश पुराण, वायु पुराण, संजीवनी रामायण एवं पुराणों से प्रमाण दिया जाता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भगवान राम, विष्णु के मानव अवतार थे। इस अवतार का उद्देश्य मृत्युलोक में मानवजाति को आदर्श जीवन के लिये मार्गदर्शन देना था। अन्ततः श्रीराम ने राक्षसों के राजा रावण ...

सचेतन 261: शिवपुराण- वायवीय संहिता - योगक्षेमं वहाम्यहम्

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आपका हरेक कर्म इस सृष्टि में शून्यता से ही प्रारंभ होता है। ‘शिव’ का अर्थ है शून्य, ‘शिव’ यानी ‘जो नहीं है’। एक बार अपने शून्य होने की सहनशीलता को सक्षम करके देखिए आपको लगेगा की आपका हरेक कर्म इस सृष्टि में शून्यता से ही प्रारंभ होता है। अगर जीवन में यह जान पाये तो आध्यात्मिक और भौतिक क्षेत्र में भी निश्चित रूप से महान सफलता प्राप्त की जा सकती है। हम क्रमश आध्यात्मिक और भौतिक दृष्टि से इसके अर्थ पर विचार करेंगे। हम अगर यह महसूस कर पाएँ या जान पाएँ की एकमात्र आत्मा ही सम्पूर्ण विश्व का अधिष्ठान और पारमार्थिक सत्य है तो अनन्यभाव से शिव अर्थात् आत्मस्वरूप का ध्यान संभव हो जाता है। हमने मंत्र योग, स्पर्श योग और भाव योग में शरीर के पंच आवरण - अन्नमय कोष, प्राणमय-कोश, मनोमय-कोश, विज्ञानमय-कोश और आनंदमय कोषन को भेदने का प्रयास करते हैं जिसका लक्ष्य है एकमात्र आत्मा और सम्पूर्ण विश्व के अधिष्ठान और पारमार्थिक सत्य को अनन्यभाव से शिव के साथ साक्षात्कार करना।  श्रीकृष्ण कि गीता के उपदेश में 'योगक्षेमं वहाम्यहम्' कहा गया है जिसका अर्थ है अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति करा देना 'योग' है...

सचेतन 260: शिवपुराण- वायवीय संहिता - भगवान की योगमाया आपको चिन्मय बनती है

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यह सनातन सत्य हैं की आप स्वयं से संबंध स्थापित कर सकते हैं  आप अपने बाह्य दुनियाँ को देखें जिसे बहिरंग प्रकृति कहते हैं इसका नाम “माया' है। भावयोग के ज्ञान मात्र से जब आप अपने आंतरिक प्रकृति से जुड़ने लगाते हैं तभी ही  हम भगवान की अन्तरंगा शक्ति के साथ अपना संबंध स्थापित कर लेते हैं। जिसका नाम 'योगमाया' है और यही भाव योग है।  लेकिन एक माया है जिसे हम मलिन माया कहते हैं। यह बड़ा ही शक्तिशाली है हम यहाँ से ख़ुद भी निकालना नहीं चाहते हैं। आप देखेंगे की आपके आस पास व्यक्ति अपनी चतुराई से वस्तु को विपरीत रूप में दिखाता है चाहे वो कितना ही मैला, मलयुक्त, अपवित्र, नापाक, गंदा, अस्वच्छ, दागदार, धब्बेदार, धूमिल, बदरंग, क्यों ना हो यह उसकी माया है। यह माया उस व्यक्ति को मिथ्या ज्ञान से प्राप्त हुई है और यहाँ तक की यह पूरा जगत इसी से आच्छादित है। क्या हम भगवान को नहीं ठग सकते हैं? वैसे याद करें तो हम सभी ने बहुत बार भगवान को भी ठग लिया है। प्रसाद तो उनके लिए चढ़ाते हैं लेकिन खाते ख़ुद हैं। अगर यह भाव कर लें की ईश्वर या भगवान् स्वयं योगमाया की चादर ओढ़कर, उस आवरण को स्वयं धारण कर साम...

सचेतन 259: शिवपुराण- वायवीय संहिता - भाव योग से जीवन ऊर्जा का महासागर बन जाता है

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भगवान नित्य विग्रह और चिन्मय हैं जिनमें आपका भगवत्स्वरूप दिखता है। भाव योग में जब जीवन ऊर्जा का रूपांतरण होता है तो आपका हृदय करुणा रस से द्रवित हो जाता है। यही भाव योग के मूल में श्रद्धा का होना है। अगर श्रद्धा का भाव नहीं है तो सब कुछ मिथ्या है। भाव करते-करते भगवत्कृपा से आप सच्चे भाव में प्रवेश करते हैं और आप एक साधक के रूप में स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम में भाव में प्रवेश करते हैं।  इस दिव्य भावना में प्रवेश करते ही आप भगवान की अर्चना और आनंदानुभूति करते हैं। वैसे हमने स्पर्श योग में चर्चा किया था की शरीर के आवरण हैं यह पाँच आवरण  को प्राणमय-कोश: क्रिया-शक्ति (करने की शक्ति), मनोमय-कोश: इच्छा-शक्ति (इच्छा की शक्ति) और विज्ञानमय-कोश: ज्ञान-शक्ति (जानने की शक्ति), आनंदमय कोष  से भी जानते हैं जिसे देह के पाँच भेद भी माने जाते हैं--स्थूल, सूक्ष्म, कारण, भाव और चिन्मय। चिन्मय और भाव देह कुछ विलक्षण हैं।  भगवान नित्य विग्रह और वह चिन्मय है। विग्रह यानी वह स्थूल स्वरूप जिसकी आप पूजा करते हैं और चिन्मय का मतलब ज्ञान से भरा हुआ आनंदमय होना अर्थात् ज्ञान के स...

सचेतन 258: शिवपुराण- वायवीय संहिता - भाव योग जीवन ऊर्जा को रूपांतरित कर देता है

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करुण रस में हृदय द्रवित हो जाता है  हम बात कर रहे थे की अध्यात्म यानी एक ऐसी प्रक्रिया जो जीवन और मृत्यु के बारे में नहीं होती यह आध्यात्मिक प्रक्रिया आपके बारे में होती है, जो कि न तो जीवन है और न ही मृत्यु। अगर इसे आसान शब्दों में कहा जाए तो इस पूरी आध्यात्मिकता का मकसद उस चीज को हासिल करने की कोशिश है, जिसे यह धरती आपसे वापस नहीं ले सकती। आपका यह शरीर इस धरती से लिया गया कर्ज है, जिसे यह धरती पूरा का पूरा आपसे वापस ले लेगी। लेकिन जब तक आपके पास यह शरीर है, तब आप इससे ऐसी चीज बना सकते हैं या हासिल कर सकते हैं, जो धरती आपसे वापस न ले पाए। भाव योग हो या चाहे आप प्राणायाम करें या ध्यान, आपकी ये सारी कोशिशें आपकी जीवन ऊर्जा को एक तरह से रूपांतरित करने का तरीका हैं, ताकि ये शरीर सिर्फ़ मांस बनाने के बजाय कुछ ऐसे सूक्ष्म तत्व का निर्माण कर सके, जो मांस की अपेक्षा ज्यादा टिकाऊ हो।  अगर आप इस सूक्ष्म तत्व को पाने की कोशिश नहीं करेंगे तो जीवन के अंत में जब आपसे कर्ज वसूली करने वाले आएंगे तो वे आपसे सब चीज ले लेंगे और आपके पास कुछ नहीं बचेगा। उसके बाद की आपकी यात्रा का हिस्सा अच्छा नह...

सचेतन 257: शिवपुराण- वायवीय संहिता - भाव योग उच्चाति-उच्च प्रेम है

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भाव योग की प्रक्रिया में संन्यासी का अर्थ महत्वपूर्ण है  कल हमने द्वेष के बारे में बात किया था और यह किसी दुःख के अनुभव होने के पश्चात् जो वासना चित्त में शेष रह जाती है, वह ‘द्वेष’ क्लेश कहलाती है। अगर हम बात करें तो दुःख के आभास होने या जिससे दुःख को हम जानने या समझने लगते है या कोई दुःखदायी वस्तुओं अथवा प्राणियों की स्मृति हमारे मन में आ जाती है अथवा उसके साधन के प्रति क्रोध अथवा उन दुःखों को नष्ट करने की इच्छा होने लगती है तो ही वह ‘द्वेष’ कहलाती है। सनातन या यौगिक प्रक्रिया में संन्यासी को बहुत बड़ा महत्व दिया गया है जो सहनशीलता का परिचायक है और आप अगर ध्यान दें तो महात्मा गांधी जी का भी कहना था की दूसरों के अतिवादों अर्थात् कठोर वचना को सहन करने का अभ्यास करना चाहिए, किसी का अनादर नहीं करना चाहिए तथा इस नश्वर देह के लिए किसी से वैर न करे अर्थात् किसी के लिए द्वेष भाव न रखे। यही तो संन्यास है।  आप अगर सनातन धर्म में संन्यासी की बात करें तो हमारी परंपरा में इस प्रकार गेरुआ वस्त्र धारण करने वाला संन्यासी मुण्डन युक्त, अपरिग्रही, पवित्र, किसी के प्रति द्रोह अर्थात् द्वेष से ...