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सचेतन 252: शिवपुराण- वायवीय संहिता - आनंदमय कोष तक स्पर्श करने के लिए शरीर के तीनों आयाम का योग आवश्यक है

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आप स्वभाव से ही आनंदित हो सकते हैं। आनंदमय कोष या  करण-शरीर हमारे अनुभव को आनंदमय बनाता है लेकिन आपको प्रसन्नता से निर्मित स्व को समझना होगा!  उदाहरण के लिए, यदि आप चीनी के बारे में बात कर रहे हैं, तो आप कहते हैं कि वह मीठी है। मिठास चीनी का स्वभाव नहीं है। मिठास वह अनुभव है, जो वह आपके भीतर उत्पन्न करती है। जब आप उसे अपने मुंह में रखते हैं, तो आपको उसका स्वाद मीठा लगता है, इसलिए आप उसे मीठा कहते हैं। ठीक इसी तरह, आनंद हमारी सबसे अंदरूनी परत का स्वभाव नहीं है।  वह शारीरिक नहीं है, जो भी चीज शरीर की सीमा से आगे है, हम उसकी व्याख्या या वर्णन नहीं कर सकते, इसलिए हम बच्चे की भाषा में बोलते है। मान लीजिए यहां एक स्पीकर सिस्टम है, और एक बच्चा आकर उसे छूता है। वह नहीं जानता कि वह क्या चीज है, इसलिए वह कहता है, “बूम बूम बूम”। अमेरिका में उसे बूम बॉक्स कहते हैं। यह एक बच्चे की भाषा है। इसी तरह, इसे आनंदमय शरीर कहना बच्चे की भाषा है। हम उसके बारे में बात करते समय उसकी प्रकृति की नहीं, अपने अनुभव की बात करते हैं। आनंदमय कोष को स्पर्श करने के लिए तीनों शरीर को संरेखित करना चाहिए। अगर...

सचेतन 251: शिवपुराण- वायवीय संहिता -आनंदपूर्ण शरीर- आनंदमय कोष या करण-शरीर है

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आपको प्रसन्नता से निर्मित स्व को समझना होगा  हमलोग पंचकोष के बारे में चर्चा कर रहे हैं जिसमें अन्नमय कोश - अन्न तथा भोजन से निर्मित हमारा शरीर और मस्तिष्क है। प्राणमय कोश - प्राणों से बना। यह हमारी  मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और उत्तम अवस्था का परत है। मनोमय कोश - मन से बना। हम जो देखते, सुनते हैं अर्थात हमारी इन्द्रियों द्वारा जब कोई सन्देश हमारे मस्तिष्क में जाता है तो उसके अनुसार वहाँ सूचना एकत्रित हो जाती है, और मस्तिष्क से हमारी भावनाओं के अनुसार हमारे विचार बनते हैं, जैसे विचार होंते हैं उसी तरह से हमारा मन स्पंदन करने लगता है। और विज्ञानमय कोश इसे आम तौर पर सूक्ष्म शरीर या आध्यात्मिक काया कहते हैं। यह वह आयाम है, जहां रूपांतरण एक वास्तविक रूप में संभव है। यह सत्यज्ञानमय या विज्ञानमय कोश है जहां सांसारिक सत्य का ज्ञान होने लगे और जो माया-भ्रम का जाल कटकर साक्षित्व में स्थित होने लगे या जो जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के स्तर से मुक्ति पाकर निर्विचार की दशा में होने लगे उसे ही सत्यज्ञान पर चलने वाला कहते हैं। प्राणमय-कोश: क्रिया-शक्ति (करने की शक्ति), मनोमय-कोश: इच्...

सचेतन 250: शिवपुराण- वायवीय संहिता -विज्ञानमय कोष से रूपांतरण संभव है

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यदि आप सूक्ष्म शरीर में जरूरी बदलाव लाते हैं, तो वह हमेशा के लिए होता है। पिछले विचार के सत्र में हमने पंचकोश के बारे में बात किया था जो मानव का अस्तित्व है और यह स्पर्श योग में आपके रूपांतरण का भी एक आयाम है, जिससे परिवर्तन संभव है! ये पाँच आवरण या परत है जो विभिन्न कोशों में चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन की अनुभूति के लिए आवश्यक होती है। प्रत्येक कोश का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। वे एक दूसरे को प्रभावित करती और होती हैं। अन्नमय कोश - अन्न तथा भोजन से निर्मित। शरीर और मस्तिष्क। सम्पूर्ण दृश्यमान जगत, ग्रह-नक्षत्र, तारे और हमारी यह पृथ्वी, आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है। यह दिखाई देने वाला जड़ जगत जिसमें हमारा शरीर भी शामिल है यही अन्न से बना शरीर अन्न रसमय कहलाता हैं।  प्राणमय कोश - प्राणों से बना। यही हमें मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ और उत्तम अवस्था में रहता है। इसीलिए प्राणायाम के सतत प्रयोग से प्राणमय कोश को स्वस्थ रखा जा सकता है। मनोमय कोश - मन से बना। हम जो देखते, सुनते हैं अर्थात हमारी इन्द्रियों द्वारा जब कोई सन्देश हमारे मस्तिष्क में जाता है तो उसके अनुसार वहाँ सू...

सचेतन 249: शिवपुराण- वायवीय संहिता - पंचकोश मानव का अस्तित्व है

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स्पर्श योग में आपका रूपांतरण भी एक आयाम है, जो संभव है!  योग की धारणा के अनुसार मानव का अस्तित्व पाँच भागों में बंटा है जिन्हें पंचकोश कहते हैं या यूँ कहें की ये पाँच आवरण या परत है। ये कोश एक साथ विद्यमान अस्तित्व के विभिन्न तल समान होते हैं। विभिन्न कोशों में चेतन, अवचेतन तथा अचेतन मन की अनुभूति होती है। प्रत्येक कोश का एक दूसरे से घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। वे एक दूसरे को प्रभावित करती और होती हैं। अन्नमय कोश - अन्न तथा भोजन से निर्मित। शरीर और मस्तिष्क। सम्पूर्ण दृश्यमान जगत, ग्रह-नक्षत्र, तारे और हमारी यह पृथ्वी, आत्मा की प्रथम अभिव्यक्ति है। यह दिखाई देने वाला जड़ जगत जिसमें हमारा शरीर भी शामिल है यही अन्न से बना शरीर अन्न रसमय कहलाता हैं।  इसीलिए वैदिक ऋषियों ने अन्न को ब्रह्म कहा है। यह प्रथम कोश है जहाँ आत्मा स्वयं को अभिव्यक्त करती रहती है। शरीर कहने का मतलब सिर्फ मनुष्य ही नहीं सभी वृक्ष, लताओं और प्राणियों का शरीर।‍ जो आत्मा इस शरीर को ही सब कुछ मानकर भोग-विलास में निरंतर रहती है वही तमोगुणी कहलाती है। इस शरीर से बढ़कर भी कुछ है। इस जड़-प्रकृति जगत से बढ़कर भी कुछ है।...

सचेतन 248: शिवपुराण- वायवीय संहिता - प्रपंच का शमन आवश्यक है

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बाबा बैद्यनाथ मंदिर के शिखर पर स्थित पंचशूल पांच योग पंचक हैं  बाबा बैद्यनाथ मंदिर के शिखर पर स्थित पंचशूल पांच योग पंचक को जानने की प्रेरणा देता है।पंचक का अर्थ होता है जब हम कोई मांगलिक कार्य या अच्छा करना चाहते हैं लेकिन वह करना मुश्किल हो जाता है या एक तरह की पाँच वस्तुओं का समूह जिसको जानना और उससे जुड़ना ज़रूरी है। पांच योग पंचक हैं- मंत्र योग, स्पर्श योग, भाव योग, अभाव योग और पांचवां महायोग।  जीवन में पंचशूल लगा रहता है यानी जो मुश्किल आ रही है, वह संकेत देता है कि प्रकृति में भासित पांच प्रकार के प्रपंच होते हैं जिसको समझने की ज़रूरत है।  प्रपंच यानी पाँच तत्वों के भेद और उनका विस्तार का होना और यह विस्तार कोई बखेड़ा, झंझट, झगड़ा, झमेला आपके जीवन की मुश्किल घड़ी की तरह होता है।तुलसी दास जी अपने रामायण में प्रपंच को बहुत अच्छे से दर्शाते हैं-  जब मंथरा  प्रपंच रच कर कैकेयी से कहती है की -  राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी। सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी॥ रचि प्रपंचु भूपहि अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई॥ जिसका भावार्थ है की राजा का तुम पर विशेष प्रेम है। कौसल्या ...

सचेतन 247: शिवपुराण- वायवीय संहिता - मंत्रयोग से स्पर्शयोग तक पहुँचने के लिए प्राणायाम का अभ्यास करना होगा

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प्राणायाम करते समय आप आपने बाहर और भीतर हो रहे शब्दों को ध्यान से सुने तो लगेगा की आपको मन की एकाग्रता चाहिए!  हमने शिवपुराण में मंत्र योग, स्पर्श योग, भावयोग, अभाव योग और महायोग, पांच प्रकार के योग के बारे में ज़िक्र किया था। अगर आप योग का अभ्यास करना चाहते हैं तो ऐसी योग क्रिया का आधार बनाये जो आपकी समस्त प्रवृत्तियों को शुद्ध कर उसे शिव से एकाकार करवाती हो।  सचेतन के पिछले क्रम में हमने विस्तार से मंत्र योग यानी मातृका और वर्ण के विषय को समझा है और वर्णमाला के बाबन अक्षर का विशाल महत्व है और उसका अर्थ और उनकी विशेषता है। मंत्र योग यानी मंत्र जप के अभ्यास करने मात्र से वह मातृका या वर्ण या वह शब्द आपके वाच्यार्थ में स्थित हो जाती है और आपका विक्षेप रहित मन की वृत्ति बनती जाती है जिससे मंत्र योग का प्रभाव हमारे तन और मन पर पड़ता है। वैसे आपकी वाणी और वचन में वही है जो आपके मन में स्थित है।मंत्र योग मनुष्य को मंत्रों का अर्थ समझने और मन को एकाग्र कर शिव से मिलाने में मदद करता है।  आज हम स्पर्श योग के बारे में बातचीत शुरू करेंगे। इसके लिए आपको मंत्रयोग के साथ साथ प्राणायाम...

सचेतन 246: शिवपुराण- वायवीय संहिता - बालक सुतनु द्वारा मातृका का ज्ञान

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तर्कों के अध्ययन से मन में केवल भ्रम हो सकता है।  एक बार की बात है की मन में मातृका शक्ति यानी मंत्र के महत्व और इसके प्रभाव  के प्रश्नों को लेकर ब्राह्मण यानी जानकार व्यक्ति की खोज के लिए नारद जी कलाप ग्राम पहुंचे। कहते हैं की कलाप ग्राम वह स्थान है, जहां सतयुग के लिए सूर्य वंश, चन्द्र वंश और ब्राह्मण वंश के बीज सुरक्षित हैं। वहां जा कर नारद जी ब्राह्मणों से अपने प्रश्नों के समाधान के लिए कहा। वहां के विद्वान ब्राह्मण ने कहा की “पहले मैं उत्तर दूंगा, पहले मैं उत्तर दूंगा ” ऐसा कह कर एक दुसरे को मना करने लगे।  तब नारद जी ने उनके सामने प्रश्न को रखा। प्रश्न सुन कर ब्राह्मण ने कहा विप्रवर! आपके प्रश्न तो बालकों जैसा छोटा, और आप हम लोगों में जिसे सबसे छोटा और ज्ञानहीन समझते हों, उनका चयन कर लीजिए और वही इस प्रश्न का उत्तर देंगे। यह सुन कर नारद जी को बड़ा आश्चर्य हुआ!  नारद जी ने अपने को कृतार्थ माना और उनमें से एक बालक जो सबसे हीन था उसे प्रश्नों के उत्तर देने कहा और उस बालक का नाम सुतनु था।  नारद जी ने बालक सुतनु के सामने यह प्रश्न रखा की मातृका को कौन विशेष रूप से...

सचेतन 245: शिवपुराण- वायवीय संहिता - आपके विमर्श-शक्ति से उत्पन्न शब्द आपकी ‘पराशक्ति’ है

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"सर्वोच्च ऊर्जा" या "श्रेष्ठ शक्ति" का संचार आपकी परिकल्पनाओं से एक निश्चित प्रभाव एवं सामर्थ्य के साथ दूसरों तक पहुँचता है। मंत्र साधना में वर्ण का महत्व सर्वोपरि है और वर्ण साधना हेतु उसमें स्थित शक्ति के स्वरूप, महिमा एवं मण्डल का ध्यान आवश्यक है। वर्ण का ध्वनि या उच्चारण करने से इसका प्रभाव विशेष रूप से आपको और आपसे जुड़े कर्म को प्रभावित करता है। यह मूल रूप से आपके  विमर्श-शक्ति यानी चिंतन से उत्पन्न शब्द और ज्ञान है  जिसको आपकी ‘पराशक्ति’ कहते हैं। पराशक्ति यानी भगवान शिव के पहलुओं में से एक है। इसका अर्थ है की "सर्वोच्च ऊर्जा" या "श्रेष्ठ शक्ति" का संचार और उसकी परिकल्पनाओं के एक निश्चित प्रभाव एवं सामर्थ्य को एक से दूसरे तक पहुँचता है। वर्णमाला के 'अ' से लेकर 'क्ष' तक बावन अक्षरों के मातृका वर्णों से बना कोई भी मन्त्र पराशक्ति सर्वव्यापी, शुद्ध चेतना, सर्वोच्च शक्ति है और समस्त वस्तुओं का मूल पदार्थ है जिसको हम मंत्र कहते हैं। उदाहरण के लिए वर्णमाला से महान आध्यात्मिक शक्ति और संपन्न ध्वनियां बनती है जैसे-  अ से मृत्यु  आ ...