सचेतन- 60 – आत्मबोध “जो किसी भी रूप में नहीं आता… वही असली तुम हो”
सचेतन- 60 – आत्मबोध “जो किसी भी रूप में नहीं आता… वही असली तुम हो” अगर मैं आपसे पूछूँ… भगवान कैसे दिखते हैं? छोटे? बड़े? प्रकाश जैसे? या किसी रूप में? पर आज का आत्मबोध कहता है — 👉 जो तुम सोच सकते हो… वह ब्रह्म नहीं है। श्लोक का सरल भावार्थ है की “ब्रह्म न छोटा है, न बड़ा… न छोटा, न लंबा… उसका जन्म नहीं होता, वह बदलता नहीं… उसका कोई रूप, रंग, गुण या नाम नहीं है।” ब्रह्म को पकड़ना क्यों मुश्किल है? हमारा मन कैसे काम करता है? हर चीज़ को किसी रूप में देखता है किसी आकार में समझता है पर ब्रह्म क्या है? न छोटा न बड़ा न ऐसा न वैसा मतलब… मन जहाँ भी पकड़ने जाए… वह वहाँ नहीं है “न यह… न वह” श्लोक हमें एक तरीका देता है — “यह नहीं… यह भी नहीं…” न शरीर न विचार न भावना न कोई रूप धीरे-धीरे सब हटाते जाओ… क्यों सब हटाया जा रहा है? एक बहुत गहरी बात… जो भी हम जानते हैं… वह सीमित है छोटा है या बड़ा लंबा है या छोटा रूप है या रंग पर ब्रह्म असीम है इसलिए… उसे किसी भी सीमा में नहीं बाँधा जा सकता जन्म और परिवर्तन से परे हमारी दुनिया में क्या होता है? सब कुछ पैदा होता है बदलता है खत्म ...