सचेतन 163 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- तप की बड़ी भारी महिमा
दूसरों की भलाई के लिए अपने सूखों की परवाह न करना यही तप है। श्री शिव पुराण के उमा संहिता में तप की बड़ी भारी महिमा बताते हुए सनत्कुमारजीने कहा-मुने! तप की महिमा अपार है। तपस्या या तप का मूल अर्थ था प्रकाश अथवा प्रज्वलन जो सूर्य या अग्नि में स्पष्ट होता है।आजकल धीरे-धीरे उसका एक रूढ़ार्थ विकसित हो गया और किसी उद्देश्य विशेष की प्राप्ति अथवा आत्मिक और शारीरिक अनुशासन के लिए उठाए जानेवाले दैहिक कष्ट को तप कहा जाने लगा। कहते हैं की तपस्या से मनुष्य तेजस्वी होता है, बलवान् होता है, शत्रुओं को जीत सकने में समर्थ होता है, मनचाही इच्छाओं को पूर्ण कर सकता है, स्वस्थ रहता है, ऐश्वर्य प्राप्त करता है, सोने की तरह चमकता है, स्वर्ग प्राप्त करता है और अमर तक बन जाता है। पर यह तप है क्या-सुनो! दूसरों की भलाई के लिये अपने सूखों की परवाह न करना यही तप है। तुम्हारे उपकारों के बदले में यदि कोई प्रशंसा न करे, कृतज्ञता प्रगट न करे तो भी कुछ परवाह मत करो, यहाँ तक कि भोजन वस्त्र में भी न्यूनता आये और सर्दी-गर्मी से बचने का भी प्रबन्ध न हो तो इन सब कष्टों को खुशी-खुशी से सहन कर लो, यह मत सोचो कि दू...