स्वाध्याय व्यक्ति की जीवन दृष्टि को बदल देता है स्वाध्याय का प्रयोजन बहुत से कारणों से करना चाहिए जिसमें प्रमुख है की ज्ञान की प्राप्ति के लिये, सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति के लिये यानी जो पदार्थ जैसा है, उसे वैसे को वैसा ही जानना, न कम जानना,न अधिक जानना और न विपरीत जानना - जो ऐसा बोध कराता है, वह सम्यक ज्ञान है। स्वाध्याय सदाचरण में प्रवृत्ति हेतु और दुराग्रहों और अज्ञान का विमोचन करने के लिये करना चाहिए। यथार्थ का बोध या अवस्थित भावों का ज्ञान प्राप्त स्वाध्याय से होता है। स्वाध्याय के प्रयोजन और भी हो सकते हैं जैसे बुद्धि की निर्मलता, प्रशस्त मनोभावों की प्राप्ति, निजशासन की रक्षा, संशय की निवृत्ति, परवादियों अर्थात् शिकायत की शंका का निरसन, और तप-त्याग की वृद्धि और अतिचारों (दोषों) की शुद्धि के लिए हो सकता है। २४ घंटे में आठ प्रहर होते हैं जिसमें दिन के चार प्रहर- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल और रात के चार प्रहर- प्रदोष, निशिथ, त्रियामा एवं उषा। जैसे प्रत्येक प्रहर में गायन, पूजन, जप और प्रार्थना का महत्व है वैसे ही स्वाधाय का महत्व भी है। पहला पहर: शाम 6 ...