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सचेतन 182: श्री शिव पुराण- आशा ही जीवन है

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यह भी बीत जाएगा  आशा ही जीवन है

सचेतन 181: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- नरक की कल्पना

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पाप या अपराध का दंड ज़रूर मिलता है पाप या गुनाह या सामान्य भाषा में कहे तो बुरे कार्यों कई प्रकर के होते हैं जैसे  हिंसा किसी जीव को मारना,उसे दुख देना हिंसा हैं, असत्य झूठ बोलना, चोरी किसी वस्तु को बिना आज्ञा ग्रहण करना,चुराना, कुशील व्यभिचार रूप गलत कार्यों को करना यहाँ तक की परिग्रह यानी अपरिग्रह गैर-अधिकार की भावना, गैर लोभी या गैर लोभ की अवधारणा यह सब पाप की श्रेणी में आता है।  प्रत्येक पाप का फल मिलता है। जिसको हम नरक भी कहते हैं। यज्ञ और ग्राम को नष्ट करने वाले को घोर वैतरणी नदी पार करना पड़ता है यानी वह नदी जिसमें प्रायः बाढ़ हुआ करती है, धर्म की मर्यादा को तोड़ते से अपवित्र आचार-विचार और छल-कपट से जीविका चलाने वाले को कृत्य नामक नरक में जाना पड़ता है। जो अकारण ही वृक्षों को काटता है, वह असि-पत्रवन नामक नरक में जाता है जहां पुराणों के अनुसार वह सहस्त्र योजन की जलती भूमि है, जिसके बीच में एक जंगल है जिसके पत्ते तलवार के समान हैं वह असिपत्रवन कहलाता है।  भेंड़ों को बेचकर जीविका चलाने वाले तथा पशुओं की हिंसा करने वाले कसाई वहिनिज्चवाल नामक नरक में गिरते हैं। भ्रष्टाच...

सचेतन 180: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- समय जब अनुकूल नहीं हो तो मनुष्य प्रायः पाप या गुनाह कर लेते हैं

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अनुकूलता आपका सर्वस्व बन जाये तो आप सब कुछ कर सकते हैं  समर्पण करने से हमारे अहंकार समाप्त हो जाते हैं और हम सामाजिक कल्याण हेतु उपयुक्त भी बन जाते हैं। समर्पण से ही किसी का विश्वास अर्जित किया जा सकता है। इसी विश्वास से प्राय: हम जीवन के सबसे अमूल्य अवसर प्राप्त करते हैं। यही अवसर हमारी प्रगति में निर्णायक सिद्ध होते हैं। समर्पित होने के लिए आपको सुख-दुख की अधीनता को छोड़ कर उनके ऊपर अपना स्वामित्व स्थापन करना पड़ता है और उसमें जो कुछ उत्तम मिले उसे लेकर अपने जीवन को नित्य नया रस-युक्त बना सकते हैं।  जीवन को उन्नत करना ही मनुष्य का कर्त्तव्य है। इसलिये आप जो उचित समझो सो मार्ग ग्रहण कर इस कर्त्तव्य को सिद्ध करो। प्रतिकूलता से डरना छोड़ना होगा उससे डरना बंद करना होगा।  अनुकूलता आपका सर्वस्व बन जाये तो आप सब कुछ कर सकते हैं यानी, जो मिले उसी से शिक्षा ग्रहण कर जीवन को उच्च बनाना एक धेय बनाना पड़ेगा। यह जीवन ज्यों-ज्यों उच्च बनेगा त्यों-त्यों आज जो तुम्हें प्रतिकूल प्रतीत होता है, वह सब अनुकूल दीखने लगेगा और अनुकूलता आ जाने पर, दुःख मात्र की निवृत्ति हो जायेगी।  लेकिन ...

सचेतन 179: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- समर्पण जीवन का आवश्यक भाव है।

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लघुता से प्रभुता मिले!  पूर्व कालीन दृष्टान्तों पर विचार करो— अपने शरीर की हड्डियों से वज्र बनाने के लिये दधीचि ऋषि ने जब स्वयं अपने को प्रसन्नता पूर्वक इन्द्र को समर्पण कर दिया था, तब क्या उन्हें कष्ट हुआ था? नहीं। उन्होंने अपना जीवन त्याग दिया ताकि उनकी हड्डियों का उपयोग वज्र के निर्माण के लिए किया जा सके, जो वृत्र को मारने के लिए देवता इंद्र का हीरे जैसा दिव्य वज्र है ।कारण उन्होंने उस दुख को अपने आधीन मानकर ही उसे स्वीकार किया था। भागवान राम, पांडव, भीष्म पितामह, ध्रुव पार्वती आदि स्त्री-पुरुष तथा बालक जाति ने विविध प्रकार के दुःख स्वीकार किये थे। परन्तु दुःखों के ऊपर अपना सामर्थ्य जानकर ही उन्हें ग्रहण किया था। अन्त में उन्होंने उस में अपना इस प्रकार हित साधन किया जो उन्हें अन्य किसी प्रकार से भी मिलना सम्भव न था। इसी कारण आज वह मर कर भी अमर है और सदैव अमर रहेंगे।  साराँश यह है कि हमें दुःखों से न डरना चाहिए और न उनके आधीन होना चाहिए। वरन् उन्हें आया हुआ देख, उनमें हितकर क्या है, यह जानने का प्रयत्न करना चाहिए। कई सद्गुण ऐसे भी हैं जो दुःखों के द्वारा ही प्राप्त होते हैं।...

सचेतन 178: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दुःख और सुख- सृष्टि का नियम है

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सकारात्मक रहे.. सकारात्मक जिए! सच पूछो तो सुख और दुःख दोनों पर ही तुम्हारी सत्ता है। सत्ता द्वारा ही तुम उनमें से जो चाहो सो ग्रहण कर सकते हो। यह इच्छा योग्य नहीं कि हमें कभी दुःख मिले ही नहीं, किन्तु दुःख से सुख किस प्रकार उत्पन्न करना होता है इस कला की सामर्थ्य प्राप्त करना तुम्हारे लिये योग्य है।  क्या तुम समझते हो कि जिसे तुम इस समय प्रतिकूल कहते हो, उसमें से क्या तुम्हारे लायक कुछ भी लाभदायक नहीं मिल सकता? परन्तु ऐसा समझने का कुछ भी कारण नहीं! वास्तव में जब तक सुख की एकरसता को वेदना की विषमता का गहरा आघात नहीं लगता तब तक जीवन के यथार्थ सत्य का परिणाम नहीं मिल सकता। याद रहे कि “काले बादलों के अँधेरे में ही बिजली की चमक छिपी होती है, दुःख के बाद सुख- निराशा के बाद आशा- पतझड़ के बाद बसन्त ही सृष्टि का नियम है।”  सच तो यह है कि दुःखादि के आधीन होकर जो मनुष्य उसे सहन करते हैं, वे दुःख से कुछ भी लाभ नहीं प्राप्त कर सकते। परन्तु जो दुखादि को अपने अधीन जानकर उनको भोगते हैं वे ही उनमें से वास्तविक सुख तथा हित प्राप्त करते हैं। दुःख के आधीन तुम नहीं वरन् तुम्हारे आधीन दुःख है, यह ज...

सचेतन 177: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- सुख और दुख दोनों आपके पास है

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क्या हमें कभी भी दुःखी होना चाहिए?  द्वेष करने से ही दुःख का साक्षात्कार होता है।     हम अनुकूलता या प्रतिकूलता की भावना को इन्द्रिय और नके विषय से महसूस करते हैं। इन्द्रिय यानी हमारे श्रोत्र, त्वचा, नेत्र, रसना और घ्राण और उनके विषय यानी शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध।  यानी जब हमारी इन्द्रिय के विषय में अनुकूलता का भाव महसूस होता है तो मनुष्य को उस विषय में 'राग' हो जाता है यानी वह उस स्थिति में अपने आप को अनुकूल यानी  उस विशेष वातावरण में सुगमता पूर्वक जीवन व्यतीत करने को इक्षा शुरू हो जाती है। इन्द्रियों के विषय में अनुकूलता होने पर बहुत सारे स्थायी बदलावों की प्रक्रिया को हम महसूस करते हैं और हमारा भाव प्रसन्न दिखता है और यह राग है। जब हमारी इन्द्रिय के विषय में  प्रतिकूलता का भाव होने पर उस विषय में 'द्वेष' हो जाता है यानी हमारा आचरण हमारी भावना या क्रिया सब एक प्रकार से प्रतिकूलत्व, विपरीतता, विरुद्धता, वैपरीत्य होने लगता है। यही हम कहना शुरू करते हैं की जीवन में क्लेश हो गया है, हमें भय लगने लगता है, मृत्यु जैसा महसूस होने लगता है। कहते हैं...

सचेतन 176: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- द्वेष करने से ही दुःख का साक्षात्कार होता है

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हम कब अनुकूलता या प्रतिकूलता की भावना को महसूस करते हैं? कभी भी किसी जन या पुरुष, देवता, ब्राह्मण और पितृगण से द्वेष करना पाप कहलाता है। द्वेष यानी चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति जैसे चिढ़, शत्रुता, वैर या फिर यूँ कहें की  द्वेष वह भाव है जब दुःख का साक्षात्कार होता है। दुःख के होने पर उससे या उसके कारण से दूर जाने, हटने या बचने की प्रेरणा जब आपको होती है तो समझें की द्वेष का पराभव होने लगा है। द्वेष तो तब भी होता है जब आप कभी किसी से अनिच्छा पूर्ण प्रशंसा की भावना करते हैं यानी जब मन नहीं हो तब भी हम उस बात को उस व्यक्ति को स्वीकारते है और किसी ऐसी चीज़ को पाने की इच्छा करते है जो दूसरे के पास है।  द्वेष का भाव तब भी आता है जब हम दूसरे की सफलता देखकर दुःखी होते हैं। इसलिए द्वेष और आक्रोश घातक पापों में से एक जाना जाता है। किसी क्रिया के प्रति ईर्ष्या महसूस करना, ईर्ष्यापूर्वक प्रशंसा करना, ईर्ष्यालु होना, झूठ मूठ में किसी का दिल लगाना सब एक प्रकार का पाप है।  यह मनुष्य के अंदर और उनके जीवन में अनुकूलता-प्रतिकूलता की भावना के कारण राग-द्वेष उत्पन्न होता है।  हम कब अन...

सचेतन 175: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- तुला-पुरुष दान का महत्व

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सत्यभामा ने श्री कृष्ण को देवर्षि नारद को दान में दे दिया था  ब्राह्मणों को तथा पीड़ित याचकों को संकल्पपूर्वक धनादि वस्तुओं का दान करता है, उससे दाता मनस्वी बन जाता है यानी बुद्धिमान, समझदार, समझदार, स्व-नियंत्रित हो जाता है। लोक यानी समाज में जो-जो अत्यन्त अभीष्ट और प्रिय है, वह यदि घर में हो तो उसे अक्षय बनाने की इच्छावाले पुरुष को गुणवान्, ज्ञानी याचकों को दान करना चाहिये। तुला-पुरुष का दान सब दानों में उत्तम है। जो अपने लिये कल्याण चाहे, उसे तराजू पर बैठना और अपने शरीर से तौली गयी वस्तु का दान करना चाहिये। दिन में, रात में, दोनों संध्या के समय, दोपहर में, आधी रात के समय तथा भूत, वर्तमान और भविष्य-तीनों कालों में मन, वाणी और शरीर द्वारा किये गये सारे पापों को तुला-पुरुष का दान दूर कर देता है। पौराणिक संदर्भ में तुला दान की बहुत सारी कथाएं हैं जिसमें एक कथा बहुत अच्छी है की श्री कृष्ण की पत्नी सत्यभामा को अपने रूप पर गर्व था और एक दिन जब नारद जी पधारे तो सत्यभामा ने कहा कि आप मुझे आशीर्वाद दीजिए कि अगले जन्म में भी श्री कृष्ण ही मुझे पति रूप में प्राप्त हों।  देवर्षि नारद बो...

सचेतन 174: श्री शिव पुराण- उमा संहिता- सुख बांटने का जरिया है दान

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सर्वे भवंतु सुखिन: सर्वे संतु निरामया शान्ति पाठ के रूप में आप सभी ने सुना होगा “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुख भागभवेत। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः”  अर्थ - "सभी प्रसन्न रहें, सभी स्वस्थ रहें, सबका भला हो, किसी को भी कोई दुख ना रहे। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः"। यह शान्ति पाठ सिर्फ एक धारणा नहीं है बल्कि यह सामाजिक व्यवस्था के रूप में  है। दान उसी व्यवस्था का एक हिस्सा है। कहा जाता है कि बांटने से दुख घटते हैं, जबकि सुख बढते हैं। दान सुख की साझेदारी का जरिया है। अगर रूढिय़ों से मुक्त होकर दान की सच्ची अवधारणा को समझा और उस पर अमल किया जा सके तो यह मनुष्यता के समग्र कल्याण का माध्यम बन सकता है। भारतीय या संपूर्ण विश्व की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक सोच में ही दान एक परंपरा है और जिसकी बड़ी महिमा बताई गई है। अगर आप सहृदयता और सहायता करने की सोच के साथ किसी जरूरतमंद को कुछ देते हैं तो इसका ही अर्थ दान है।  भारतीय परंपरा में दान को कर्तव्य और धर्म दोनों ही माना जाता है। यही कारण है कि दान की महिमा को हमारी सभ्यता में बडे ही धार्मिक और ...

सचेतन 173 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दान के लिए विवकेशीलता ज़रूरी है

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दान का उद्देश्य सामाजिक कल्याण होना चाहिए संकल्प पूर्वक कायिक, वाचिक और मानसिक रूप से दान देने का महात्म है। कहते हैं की जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी, अर्थात जिसकी जैसी दृष्टि होती है, उसे वैसी ही मूरत नज़र आती है।यहाँ दान की देने या लेने की भावना ही हमारा दृष्टिकोण है और उसकी उपयोगिता को सिद्ध करना हमारा संकल्प है।वाणी और सद्भावयुक्त व्यवहार युक्त होकर अगर आप कुछ भी देते हैं तो  द्वेषभाव भी समाप्त हो सकता है।  प्रमुखता से दान का उद्देश्य सामाजिक कल्याण होना चाहिए। दुखी के प्रति मन से करुणा का भाव रखना दान है। किसी का दुःख दूर हो अथवा कम हो सके ऐसी सलाह देना भी दान है। दुःखी को दिलासा मिले, हिम्मत मिले अथवा वह कुछ समय के लिए दुःख को भूल जाय, ऐसा बोलना भी दान है।  भूखे-प्यासे को अन्न-जल देना दान है। स्वयं किसी को विद्या देना या दिलवाना भी दान है। मार्ग से भटके हुओं को ठीक रास्ता दिखला देना, लोक हित के सुव्यवस्थित कार्य में द्रव्य से, शारीरिक श्रम से मदद करना, बीमार की सेवा-सुश्रूषा करनी या करानी भी दान है। घर, आँगन, मोहल्ला, गाँव को साफ रखना या रखाना सार्वज...

सचेतन 172 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दान से बड़ा दान देने और लेने की भावना है

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दान देने के लिये कायिक, वाचिक और मानसिक संकल्प की आवश्यकता होती है। दान का साधारण अर्थ है देना और किसी भी सराहनीय कार्य और अवश्य किए जाने काम के लिए अग्र आप कुछ भी देते हैं तो उसका अर्थ दान से बढकर सेवा और सहायता हो जाता है। इस प्रकार का दान किसी न किसी तरह से समाज को समृद्ध और समर्थ बनाता है। देने का यह भाव खुद की दुनिया का फैलाव करता है। अपना दायरा उन लोगों तक फैला देता है जिन्हें दिया जा रहा है। दान का सर्वाधिक लोकप्रिय अर्थ किसी जरूरतमन्द को सहायता के रूप में कुछ देना है। यह भी सही है कि किसी को कुछ देना हो तो वह वस्तु पर्याप्त रूप में पास होना जरूरी है। इसीलिए धन का महत्व क्योंकि सभी स्थूल पदार्थों में सबसे ज्यादा है। दान में कुछ कर्म को बर्जित किया गया है जैसे बिना दिये हुए दूसरे की वस्तु लेना, शास्त्र में वर्जित है हिंसा के साथ या हिंसा के लिए दान नहीं करना चाहिए।  कटु बोलकर, झुठ बोलकर,परोक्ष में किसी का निंदा करके तथा निष्प्रयोजन बातें करके दान नहीं देना चाहिए। दुसरे के द्रव्य को अन्यायसे लेने का विचार करके दान करना, मन से दूसरे का अनिष्ट चिंतन करते हुए दान करना तथा नास्तिक...

सचेतन 171 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- दान देना क्या होता है?

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मानसिक रूप से क्षमा का दान देना बहुत ही महत्वपूर्ण है  दान का शाब्दिक अर्थ है - 'देने की क्रिया'। सभी धर्मों में सुपात्र को दान देना परम् कर्तव्य माना गया है। हिन्दू धर्म में दान की बहुत महिमा बतायी गयी है। आधुनिक सन्दर्भों में दान का अर्थ किसी जरूरतमंद को सहायता के रूप में कुछ देना है। सामान्यत: आज के युग में दान को एक प्रकार का व्यवसाय माना जाता है एक व्यापार के रूप में जब किसी वस्तु पर से अपना स्वत्व (अधिकार) दूर कर दूसरों का हो जाए तो हम दान समझते हैं।  दान में धन (अर्थ) का अधिक महत्व समझ कर कहा गया है की 'श्रेष्ठ पात्र देखकर श्रद्धापूर्वक द्रव्य (धन) का अर्पण करने का नाम दान है। ऐसा इसलिए, क्योंकि भौतिक साधनों की संपन्नता से मनुष्य सांसारिक सुख-साधनों को धन से प्राप्त कर लेता है।  श्रेष्ठ दान देने के लिये छह बातों का ध्यान रखना चाहिए - 'दान लेने वाला, दान देने वाला, श्रद्धायुक्त, धर्मयुक्त, देश और काल। श्रद्धा और धर्मयुक्त होकर अच्छे देश (तीर्थ) या पुण्य स्थल और अच्छे काल (शुभ-मुहूर्त) में अच्छे दान द्वारा सुपात्र को दिया गया दान ही श्रेष्ठ दान कहलाता है। दान को ती...

सचेतन 170 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- स्वाध्याय कब कब करें

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स्वाध्याय व्यक्ति की जीवन दृष्टि को बदल देता है स्वाध्याय का प्रयोजन बहुत से कारणों से करना चाहिए जिसमें प्रमुख है की ज्ञान की प्राप्ति के लिये, सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति के लिये यानी जो पदार्थ जैसा है, उसे वैसे को वैसा ही जानना, न कम जानना,न अधिक जानना और न विपरीत जानना - जो ऐसा बोध कराता है, वह सम्यक ज्ञान है। स्वाध्याय सदाचरण में प्रवृत्ति हेतु और दुराग्रहों और अज्ञान का विमोचन करने के लिये करना चाहिए। यथार्थ का बोध या अवस्थित भावों का ज्ञान प्राप्त स्वाध्याय से होता है।  स्वाध्याय के प्रयोजन और भी हो सकते हैं जैसे बुद्धि की निर्मलता, प्रशस्त मनोभावों की प्राप्ति, निजशासन की रक्षा, संशय की निवृत्ति, परवादियों अर्थात् शिकायत की शंका का निरसन, और तप-त्याग की वृद्धि और अतिचारों (दोषों) की शुद्धि के लिए हो सकता है।  २४ घंटे में आठ प्रहर होते हैं जिसमें दिन के चार प्रहर- पूर्वान्ह, मध्यान्ह, अपरान्ह और सायंकाल और रात के चार प्रहर- प्रदोष, निशिथ, त्रियामा एवं उषा। जैसे प्रत्येक प्रहर में गायन, पूजन, जप और प्रार्थना का महत्व है वैसे ही स्वाधाय का महत्व भी है।  पहला पहर: शाम 6 ...

सचेतन 169 : श्री शिव पुराण- उमा संहिता- स्वाध्याय के लाभ

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स्वाध्याय से आत्मा मिथ्या ज्ञान का आवरण दूर होता है  स्वाध्याय से हम आध्यत्मिक साधना कर सकते हैं जो ज्ञान के प्रकाश से प्राप्त होता है, और इससे समस्त दु:खों का क्षय हो जाता है। वस्तुत: स्वाध्याय ज्ञान प्राप्ति का एक महत्त्वपूर्ण उपाय है।  स्वाध्याय शब्द का सामान्य अर्थ है-स्व का अध्ययन। स्वाध्याय आत्मानुभूति है, अपने अन्दर झांक कर अपने आप को देखना है, स्वयं अपना अध्ययन करना होता है। मेरी दृष्टि में अपने विचारों, वासनाओं व अनुभूतियों को जानने व समझने का प्रयत्न ही स्वाध्याय है। वस्तुत: वह अपनी आत्मा का अध्ययन ही है, आत्मा के दर्पण में अपने को देखना है।  उत्तराध्ययन सूत्र में यह बताया गया है कि स्वाध्याय से जीव को क्या लाभ होता है? उत्तराध्ययन सूत्र जैन आगम साहित्य का प्रतिनिधि आगम है। इसमें जीवन निर्माण के सूत्र प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। इसके उत्तर में कहा गया है कि स्वाध्याय से ज्ञानावरण कर्म का क्षय होता है। दूसरे शब्दों में आत्मा मिथ्या ज्ञान का आवरण दूर करके सम्यग्ज्ञान का अर्जन करता है। स्वाध्याय के इस सामान्य लाभ की चर्चा के साथ उत्तराध्ययन सूत्र में स्वाध्याय के...