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सचेतन 2.27: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - जीवन में किसी घटना के होने से बचने के लिए प्रतीक्षा करना चाहिए।

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वीर वानर हनुमान् विदेहनन्दिनी के दर्शन के लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे। देवताओं और असुरों के लिये भी दुर्जय जैसी लंकापुरी को देखकर हनुमान जी भी विचार करने लगे और सोचते हैं की - अच्छा तो किस उपाय का अवलम्बन करने से स्वामी का कार्य नहीं बिगड़ेगा। साथ मुझे में कोई घबराहट या अविवेक लक्षण नहीं होना चाहिए नहीं तो मेरा यह समुद्र का लाँघना भी व्यर्थ हो जाएगा, भगवान् श्रीराम का यह कार्य सफल न हो सकेगा।  हनुमान जी राक्षस का रूप धारण करके भी राक्षसों से अज्ञात नहीं रह सकते। हनुमान जी विचार करते हैं की यदि यहाँ मैं अपने इस रूप से छिपकर भी रहँगा तो मारा जाऊँगा और मेरे स्वामी के कार्य में भी हानि पहुँचेगी। अतः मैं श्रीरघुनाथजी का कार्य सिद्ध करने के लिये रात में अपने इसी रूप से छोटा-सा शरीर धारण करके लंका में प्रवेश करूँगा। यद्यपि रावण की इस पुरी में जाना बहुत ही कठिन है तथापि रात को इसके भीतर प्रवेश करके सभी घरों में घुसकर मैं जानकीजी की खोज करूँगा। ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान् विदेहनन्दिनी के दर्शन के लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्त की प्रतीक्षा करने लगे। जीवन में ...

सचेतन 2.26: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सोच-विचार करने से निरपेक्ष सत्य की स्वानुभूति होती है, वही ज्ञान है

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देवताओं और असुरों के लिये भी दुर्जय जैसी लंकापुरी को देखकर हनुमान जी भी विचार करने लगे।  हमने अबतक यह समझा की अवलोकन या निरीक्षण करने से विज्ञान उपजता है और यही  तथ्य और परिकल्पना हनुमान जी को भी लग रह था जब वे विश्वकर्मा की बनायी हुई लंका को एक सुन्दरी स्त्री के तरह से मानसिक संकल्प कर रहे थे।लंका की चहारदीवारी और उसके भीतर की जघनस्थली तथा समुद्र का विशाल जलराशि और वन मानो उस स्त्री के वस्त्र, केश और आभूषण-सी प्रतीत हो रही थीं।  अब हनुमान जी विचार करने लगे, की पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेह कुमारी सीता जीवित हैं या नहीं। जनक किशोरी का दर्शन करने के पश्चात् ही मैं इस विषय में कोई विचार करूँगा। तदनन्तर उस पर्वत-शिखर पर खड़े हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान् जी श्रीरामचन्द्रजी के अभ्युदय के लिये सीताजी का पता लगाने के उपाय पर दो घड़ी तक विचार करते रहे। उन्होंने सोचा—मैं इस रूप से राक्षसों की इस नगरी में प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि बहुत-से क्रूर और बलवान् राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं। विचार में सतर्कता का ज्ञान सबसे पहले ज़रूरी है। जानकी की खोज करते समय मुझे अपने को छिपाने के लिये यहाँ...

सचेतन 2.25: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - अवलोकन से विज्ञान तक

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विश्वकर्मा की बनायी हुई लंका मानो उनके मानसिक संकल्प से रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी। हनुमान जी ने सोने की चहारदीवारी से घिरी हुई लंका महापुरी का निरीक्षण स्वयं को जागरूक करने के लिए किया उन्होंने देख की लंका का बाहरी फाटक सोने के बने हुए थे और उनकी दीवारें लता-बेलों के चित्र से सुशोभित थीं। हनुमान जी ने उन फाटकों से सुशोभित लंका को उसी प्रकार देखा, जैसे कोई देवता देवपुरी का निरीक्षण कर रहा हो। तेजस्वी कपि हनुमान् ने सुन्दर शुभ्र सदनों से सुशोभित और पर्वत के शिखर पर स्थित लंका को इस तरह देखा, मानो वह आकाश में विचरने वाली नगरी हो।  कपिवर हनुमान् ने विश्वकर्मा द्वारा निर्मित तथा राक्षसराज रावण द्वारा सुरक्षित उस पुरी को आकाश में तैरती-सी देखा। विश्वकर्मा की बनायी हुई लंका मानो उनके मानसिक संकल्प से रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी। चहारदीवारी और उसके भीतर की वेदी उसकी जघनस्थली जान पड़ती थीं, समुद्र का विशाल जलराशि और वन उसके वस्त्र थे, शतघ्नी और शूल नामक अस्त्र ही उसके केश थे और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ उसके लिये कर्णभूषण-सी प्रतीत हो रही थीं। शतघ्नी अस्त्र  यानी इसके प्रहार से सौ आदमी...

सचेतन 2.24: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड -हनुमान जी वीर्यवान थे

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हनुमान जी ने सोने की चहारदीवारी से घिरी हुई लंका महापुरी का निरीक्षण स्वयं को जागरूक करने के लिए किया  हम सुंदरकांड के द्वितीयः सर्ग के प्रारंभ में चर्चा किया था की पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् जब सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लम्बी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानि का या आलस्य का ही अनुभव करते थे। उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनों के बहुत से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्र को पार करना कौन बड़ी बात है?  तो जब हम बिना थके लगातार अथक परिश्रम करते हैं पराक्रमी और वीरता की संज्ञा का आभास होता है। वीर व्यक्ति का अर्थ है की किसी भी काम से कभी पीछे नहीं हटना। हनुमान् जी वीर और पराक्रमी होने के के साथ साथ वे अत्यन्त वीर्यवान थे। शरीर की भौतिक शक्तियों का अन्तिम सार वीर्य है। जब आप भोजन करते हैं तो पहले रस बनता है, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से मेढ़, मेढ़ से हड्डी, हड्डी से मज्जा, मज्जा से वीर्य ; वीर्य शरीर का अन्तिम धातु है। इस के बनाने में, शरीर को, जीवन के लिये आवश्यक अन्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक मेहनत करनी पड़ती है। थोड़े - से वीर्य को बनाने क...

सचेतन 2.23: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - अथक परिश्रम के लिए पराक्रमी, और वीर्यवान बनना पड़ता है।

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पवनपुत्र हनुमान् ने लंका का अवलोकन किया।  आज हम सुंदरकांड के द्वितीयः सर्गः की शुरुआत कर रहे हैं जिसमें लंकापुरी का वर्णन है और, उसमें हनुमान जी के लंका में प्रवेश करने के विषय में विचार लिखा गया  है जिसमें उनका लघुरूप से पुरी में प्रवेश तथा चन्द्रोदय का वर्णन किया गया है।  महाबली हनुमान् जी अलङ्घनीय समुद्र को पार करके त्रिकूट (लम्ब) नामक पर्वत के शिखर पर स्वस्थ भाव से खड़े हो लंकापुरी की शोभा देखने लगे और तभी उनके ऊपर वहाँ वृक्षों से झड़े हुए फूलों की वर्षा होने लगी। इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूल के बने हुए वानर के समान प्रतीत होने लगे।  उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लम्बी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानि का या आलस्य का ही अनुभव करते थे। उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनों के बहुत से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्र को पार करना कौन बड़ी बात है? बलवानों में श्रेष्ठ तथा वानरों में उत्तम वे वेगवान् पवन-कुमार महासागर को लाँघकर शीघ्र ही लंका में जा पहुँचे थे।  बिना थके लगातार किया जाने वाला,...

सचेतन 2.22: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - विनम्रता से शक्ति प्राप्त होती है।

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हनुमान जी समुद्र को लाँघ जाने के बाद अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित हो गये।   धैर्य, सूझ, बुद्धि और कुशलता—ये चार गुणों के परिचय देने बाद हनुमान जी  आकाश में चढ़कर गरुड़ के समान वेग से चलने लगे। सौ योजन के अन्त में प्रायः समुद्र के पार पहुँचकर जब उन्होंने सब ओर दृष्टि डाली, तब उन्हें एक हरी भरी वनश्रेणी दिखायी दी।  आकाश में उड़ते हुए ही शाखामृगों में श्रेष्ठ हनुमान् जी ने भाँति-भाँति के वृक्षों से सुशोभित लंका नामक द्वीप देखा। उत्तर तट की भाँति समुद्र के दक्षिण तट पर भी मलय नामक पर्वत और उसके उपवन दिखायी दिये। समुद्र, सागर तटवर्ती जलप्राय देश तथा वहाँ उगे हुए वृक्ष एवं सागर पत्नी सरिताओं के मुहानों को भी उन्होंने देखा। मन को वश में रखने वाले बुद्धिमान् हनुमान जी ने अपने शरीर को महान् मेघों की घटा के समान विशाल तथा आकाश को अवरुद्ध करता-सा देख मन-ही-मन इस प्रकार विचार किया— ‘अहो! मेरे शरीर की विशालता तथा मेरा यह तीव्र वेग देखते ही राक्षसों के मन में मेरे प्रति बड़ा कौतूहल होगा—वे मेरा भेद जानने के लिये उत्सुक हो जायेंगे।’ परम बुद्धिमान् हनुमान जी के मन में यह धारणा पक्...

सचेतन 2.21: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - धैर्य, सूझ, बुद्धि और कुशलता जैसे चार गुणों से आप कभी असफलता नहीं होंगे

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हनुमान जी से स्पन्द (pulse) होने का संकेत मिलता है जो चेतना और चैतन्य का भाव और प्रत्याभास (reflection) करता है  सफलता के लिए शक्ति इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति आपको भी हनुमान जी की तरह से प्राप्त हो सकता है लेकिन उसके लिए दैव का अनुग्रह, स्वाभाविक धैर्य तथा कौशल चाहिए। हनुमान जी की छाया को जब सिंहिका राक्षसी ने पकड़ ली तो हनुमान जी ने उस राक्षसी को मार दिया और वे मनस्वी वानरवीर पुनः अपने लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए वेग से बढ़कर सीता माता की खोज में चल पड़े। हनुमान् जी ने अपनी सूझ बुझ से सिंहिका राक्षसी के प्राणों के आश्रयभूत उसके हृदयस्थल को ही नष्ट कर दिया, अतः वह प्राणशून्य होकर समुद्र के जल में गिर पड़ी। कल हमने बात की थी की हनुमान जी एक निमित्त मात्र होकर उसे मार गिराने में सफल हुए।  जब वानरवीर के द्वारा शीघ्र ही सिंहिका जल में गिर पड़ी तो यह देख कर आकाश में विचरने वाले प्राणी उन कपिश्रेष्ठ से बोले- ‘कपिवर! तुमने यह बड़ा ही भयंकर कर्म किया है, जो इस विशालकाय प्राणी को मार गिराया है। अब तुम बिना किसी विघ्न-बाधा के अपना अभीष्ट कार्य सिद्ध करो।  ‘वानरेन्द्र ! जिस पुरुष...

सचेतन 2.20: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सफलता के लिए शक्ति के तीन रूप - इच्छा, ज्ञान और क्रिया शक्ति

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हनुमान जी की छाया को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली सिंहिका राक्षसी  ने पकड़ ली।  सीता माता की खोज में वायु के समान हनुमान जी आगे बढ़ रहे थे और बड़े-बड़े बादल से यह दृश्य से अद्भुत शोभायमान हो रहा था। इस तरह जाते हुए हनुमान जी को इच्छानुसार रूप धारण करने वाली विशालकाया सिंहिका नामवाली राक्षसी ने देखा। देखकर वह मन-ही-मन इस प्रकार विचार करने लगी- आज दीर्घकाल के बाद यह विशाल जीव मेरे वश में आया है। इसे खा लेने पर बहुत दिनों के लिये मेरा पेट भर जायगा। अपने हृदय में ऐसा सोचकर उस राक्षसी ने हनुमान् जी की छाया पकड़ ली।  छाया पकड़ी जाने पर वानरवीर हनुमान् ने सोचा—’अहो! सहसा किसने मुझे पकड़ लिया, इस पकड़ के सामने मेरा पराक्रम रुक सा गया है। जैसे प्रतिकूल हवा चलने पर समुद्र में जहाज की गति अवरुद्ध हो जाती है, वैसी ही दशा आज मेरी भी हो गयी है’।  यही सोचते हुए कपिवर हनुमान् ने उस समय अगल-बगल में, ऊपर और नीचे दृष्टि डाली। इतने ही में उन्हें समुद्र के जल के ऊपर उठा हुआ एक विशालकाय प्राणी दिखायी दिया। उस विकराल मुखवाली राक्षसी को देखकर पवनकुमार हनुमान् सोचने लगे-वानरराज सुग्रीव ने ज...

सचेतन 2.19: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान् जी का वायु वेग से गमन

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हनुमान् ने अपने शरीर को अँगूठे के बराबर संकुचित कर लिया और वे उसी क्षण अँगूठे के बराबर छोटे हो गये। देवताओं द्वारा हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेने की इक्षा से देवी सुरसा राक्षसी का रूप धारण कर हनुमान् जी को घेरकर कहा की मैं तुम्हें खाऊँगी क्योंकि  यह वर दिया था कि कोई भी मुझे लाँघकर आगे नहीं जा सकता। ऐसा कहकर वह तुरंत ही अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान् जी के सामने खड़ी हो गयी।  सुरसा के ऐसा कहने पर वानरशिरोमणि हनुमान जी कुपित हो उठे और बोले— ‘तुम अपना मुँह इतना बड़ा बना लो जिससे उसमें मेरा भार सह सको’ यों कहकर जब वे मौन हुए, तब सुरसा ने अपना मुख दस योजन विस्तृत बना लिया। अग्नि के समान तेजस्वी हनुमान् नब्बे योजन ऊँचे हो गये। यह देख सुरसा ने भी अपने मुँह का विस्तार सौ योजन का कर लिया।  सुरसा के फैलाये हुए उस विशाल जिह्वा से युक्त और नरक के समान अत्यन्त भयंकर मुँह को देखकर बुद्धिमान् वायुपुत्र हनुमान् ने मेघ की भाँति अपने शरीर को संकुचित कर लिया। वे उसी क्षण अँगूठे के बराबर छोटे हो गये। फिर वे महाबली श्रीमान् पवनकुमार सुरसा के उस मुँह में प्रवेश करके तुरंत निकल आये...

सचेतन 2.18: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सुरसा ने अपने मुँह का विस्तार सौ योजन का किया था

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सूर्य सिद्धान्त में 1 योजन 8 किलोमीटर के बराबर होता है  देवताओं द्वारा हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा लेने की इक्षा को  सत्कारपूर्वक देवी सुरसा ने स्वीकार किया और समुद्र के बीच में राक्षसी का रूप धारण किया। वह समुद्र के पार जाते हुए हनुमान् जी को घेरकर उनसे इस प्रकार बोली- ‘कपिश्रेष्ठ! देवेश्वरों ने तुम्हें मेरा भक्ष्य बताकर मुझे अर्पित कर दिया है, अतः मैं तुम्हें खाऊँगी तुम मेरे इस मुँह में चले आओ। ‘पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने मुझे यह वर दिया था। ऐसा कहकर वह तुरंत ही अपना विशाल मुँह फैलाकर हनुमान् जी के सामने खड़ी हो गयी।  सुरसा के ऐसा कहने पर हनुमान जी ने प्रसन्न मुख होकर कहा- देवि! दशरथनन्दन श्रीरामचन्द्रजी अपने भाई लक्ष्मण और धर्मपत्नी सीताजी के साथ दण्डकारण्य में आये थे, वहाँ परहित-साधन में लगे हुए श्रीराम का राक्षसों के साथ वैर बँध गया। दण्डकारण्य/ दण्डक वन प्राचीन भारत का एक क्षेत्र है जो ये वर्तमान में भारत के छत्तीसगढ़ राज्य में आता है। रावण ने उनकी यशस्विनी भार्या सीता को हर लिया। मैं श्रीराम की आज्ञा से उनका दूत बनकर सीताजी के पास जा रहा हूँ। तुम भी श्रीरा...

सचेतन 2.17: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - पराक्रम की परीक्षा से स्वयं के शक्ति और ज्ञान का आकलन होता है

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देवता, गन्धर्व, सिद्ध और महर्षियों ने हनुमान जी के बल और पराक्रम की परीक्षा सूर्यतुल्य तेजस्विनी नागमाता सुरसा के द्वारा लिया।  हनुमान जी मैंनाक पर्वत से सत्कार पा कहा - मैनाक मुझे भी आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता हुई है मेरा आतिथ्य हो गया और महाबली वांशिरोमणि हनुमान ने अपने हाथ से मैंनाक का स्पर्श किया और आकाश में ऊपर उठकर चलने लगे।  हनुमान जी का यह अत्यन्त दुष्कर कर्म (कठिन कार्य) देखकर सम्पूर्ण देवता, सिद्ध और महर्षिगण उनकी प्रशंसा करने लगे। वहाँ आकाश में ठहरे हुए देवता तथा सहस्र नेत्रधारी इन्द्र उस सुन्दर मध्य भागवाले सुवर्णमय मैनाक पर्वत के उस कार्य से बहुत प्रसन्न हुए। उस समय स्वयं बुद्धिमान् शचीपति इन्द्र ने अत्यन्त संतुष्ट होकर पर्वतश्रेष्ठ सुनाभ नाक या सुदर्शन चक्र समान सुदर एव सुडौल नासिका वाला मैनाक पर्वत से गद्गद वाणी में कहा- ‘सुवर्णमय शैलराज मैनाक! मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। सौम्य! तुम्हें अभय दान देता हूँ। तुम सुखपूर्वक जहाँ चाहो, जाओ। हनुमान जी को सौ योजन समुद्र को लाँघते समय उनके मन में कोई भय नहीं रहा है, फिर भी शचीपति इन्द्र के हृदय में यह भय था कि पता नहीं इन...

सचेतन 2.16: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - प्रत्युपकार करना धर्म है।

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सतयुग में पर्वतों के भी पंख होते थे, वे  भी गरुड़ के समान वेगशाली होकर संपूर्ण दिशा में उड़ते फिरते थे।  प्रत्युपकार (किसी उपकार के बदले में सत्कार ग्रहण करने से सम्मान होना) करने की इच्छा से सागर ने बड़े आदर से मैनाक पर्वत को नियुक्त किया था। कपिवर हनुमान ने सौ  योजन दूर जाने के लिए आकाश में छलांग मारी है इसीलिए वो कुछ देर विश्राम कर लें और फिर आगे जाएँगे।  मैनाक पर्वत ने कहा की कपिवर आपके साथ हमारा भी कुछ संबंध है आप महान गुणों  का संग्रह करने वाले और तीनों लोकों में विख्यात है। इस विषय में तो कहना क्या है कपिश्रेष्ठ आप देव  शिरोमणि महात्मा वायु के पुत्र हैं और वेग  में भी उन्हीं के समान है, आप धर्म के ज्ञाता है। आपकी पूजा होने पर साक्षात वायुदेव का पूजन हो जाएगा। मैनाक पर्वत ने कहा इसलिए आप अवश्य मेरे पूजनीय हैं।  इसमें एक और भी कारण है, इसे सुनिए तात पूर्वकाल के सतयुग की बात है। उन दिनों पर्वतों के भी पंख होते थे, वे  भी गरुड़ के समान वेगशाली होकर संपूर्ण दिशा में उड़ते फिरते थे, उनके इस तरह वेग  पूर्वक उड़ने और आने जाने पर देवता, ऋष...

सचेतन 2.15: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - वसुधैव कुटुंबकम का एकमात्र कल्याण की आकांक्षा रखें

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क्षीर सागर और मैनाक पर्वत अपना सनातन धर्म समझकर हनुमान जी को विश्राम करने की पेशकश की  हे वानरशिरोमणि आपने यह दुष्कर कर्म किया है। आप उतर कर मेरे इन शिखरो  पर सुख पूर्वक विश्राम कर लीजिए फिर आगे की यात्रा कीजिएगा श्री रघुनाथ जी के पूर्वजों ने समुद्र की वृद्धि की थी, इस समय आप उनके हित करने में लगे हैं। अतः  समुद्र आपका सत्कार करना चाहता है किसी ने उपकार किया हो तो बदले में उसका भी उपकार किया जाए यह सनातन धर्म है। यहाँ जिज्ञासा को बढ़ाया जा रहा है लुभावना नहीं दी जा रही है।  यहाँ कोई थोपे गये विश्वास की बातचीत नहीं है और कोई अपराधबोध भी नहीं है। यहाँ एक दूसरे के परम कल्याण के लिए मैनाक पर्वत और हनुमान जी के बीच जिज्ञासा का एक गहन भाव लाया जा रहा है की आप यहाँ थोड़ा विश्राम कर लीजिए जिससे की आपके श्री रघुनाथ जी के पूर्वजों के द्वारा जो समुद्र के लिए उपकार किया गया था की उनकी वृद्धि की थी, और आप इस समय आप उनके दूत बन का उनका हित करने में लगे हैं इसीलिए यह समुद्र आपका सत्कार करना चाहता है। यानी पहले जो किसी ने उपकार किया था तो उसके बदले में उसका भी उपकार किया जाए यह सनात...

सचेतन 2.13: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - समुद्र में छिपे हुए मैनाक पर्वत का दर्शन

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नव वर्ष की शुभकामनाएँ! हमलोग चर्चा कर रहे थे की हनुमान जी उपमान अलंकार हैं क्योंकि आज के युग में वह अप्रत्यक्ष हैं। वह प्रसिद्ध बिन्दु या प्राणी या पर्वत या समुद्र आदि अभी भी मौजूद है जिसके साथ उपमेय रूप में हनुमान जी की तुलना किए गए हैं। किसी भी व्यक्ति  की  उपमा के लिए धर्मगत समता हेतु अर्थालंकार यानी दो वस्तुओं में भेद को बताया जा सकता है।  हनुमान जी का उदाहरण बहुत सरल है की आप सिर्फ़ कर्म को विशिष्टता और उत्कृष्टता के साथ करते रहते हैं। विशिष्ट बनने की कोशिश मत कीजिए। अगर आप बस साधारण हैं, दूसरों से ज्यादा साधारण हैं, तो आप असाधारण बन जाएंगे। कपि श्रेष्ठ को बिना थकावट के सहसा आगे बढ़ते देख नाग, यक्ष और नाना प्रकार के राक्षस सभी उनकी स्तुति करने लगे। जिस समय कपिकेसरी हनुमान्जी उछलकर समुद्र पार कर रहे थे, उस समय इक्ष्वाकु कुल का सम्मान करने की इच्छा से समुद्र ने विचार किया, 'यदि मैं वानरराज हनुमान्जी की सहायता नहीं करूँगा तो बोलने की इच्छा वाले सभी लोगों की दृष्टि में मैं सर्वथा निन्दनीय हो जाऊँगा। 'मुझे इक्ष्वाकु कुल के महाराज सगर ने बनाया था। इस समय ये हनुमान्जी भी इक...