सचेतन- 49 –आत्मबोध “जीवन्मुक्त: जीते-जी आज़ाद होने की कहानी”
क्या सच में कोई इंसान जीते-जी मुक्त हो सकता है? बिना दुनिया छोड़े… बिना भागे… बिना कुछ बदले? आत्मबोध के आज के विचार में आज हम बात करते हैं की — हाँ। मुक्ति मरने के बाद नहीं, यहीं… अभी… संभव है। इसे कहते हैं — जीवन्मुक्त । श्लोक कहता है — जिसने आत्मज्ञान पा लिया, वह जीते-जी मुक्त हो जाता है। वह अपने शरीर-मन की पुरानी पहचान छोड़ देता है और अपने असली स्वरूप — सत्-चित्-आनंद — में स्थित हो जाता है। जैसे एक कीड़ा धीरे-धीरे भंवरा बन जाता है। जीवन्मुक्त कौन? जीवन्मुक्त मतलब — शरीर है, दुनिया है, पर भीतर बंधन नहीं है। वह गुस्सा देखता है, पर खुद को गुस्सा नहीं मानता। वह शरीर की बीमारी देखता है, पर खुद को बीमार नहीं मानता। वह समझ चुका है — मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मन नहीं हूँ, मैं भावनाएँ नहीं हूँ। मैं वह हूँ जो सबको देख रहा है। “उपाधि” छोड़ना क्या है? शास्त्र कहता है — वह “उपाधि” के गुण छोड़ देता है। उपाधि क्या है? शरीर। मन। अहंकार। पहले वह कहता था — मैं मोटा हूँ। मैं बूढ़ा हूँ। मैं दुखी हूँ। मैं गुस्से वाला हूँ। अब वह कहता है — शरीर मोटा है। मन दुखी है। भावनाएँ बदल...