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सचेतन- 18: ध्यान और मनन (Meditation & Contemplation)

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प्रज्ञा केवल ज्ञान नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव है — प्रज्ञा: ज्ञान से आगे, अनुभव की ओर ले जाता है। प्रज्ञा का अर्थ केवल पढ़ा-पढ़ाया हुआ ज्ञान नहीं है। यह वह गूढ़ बुद्धि है जो तब जागती है जब हम ज्ञान को आत्मा में जीते हैं , जब सत्य केवल समझा नहीं जाता — अनुभव किया जाता है। और यह अनुभव ध्यान और मनन के अभ्यास से गहराता है। जब हम ध्यान करते हैं — मन की चंचलता रुकती है, विचार शांत होते हैं, और उस शांति में हमारी आत्मिक चेतना प्रकट होती है। मनन का अर्थ है — सुनाए गए सत्य पर बार-बार सोचकर उसे भीतर उतारना। जैसे बीज को मिट्टी में रोपकर, बार-बार जल देकर, उसे वृक्ष बनाना। परिणाम क्या होता है? आत्मा की गहराई दिखने लगती है भीतर स्थायी आनंद और शांति का अनुभव होता है विवेक और साक्षी भाव प्रबल हो जाते हैं मुंडक उपनिषद 3.2.3 में कहा गया है: "नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः, न मेधया, न बहुना श्रुतेन। यं एव ऐष वृणुते तेन लभ्यः, तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्।" (यह आत्मा वाणी या शास्त्रों से नहीं, बल्कि ध्यान और मनन से अनुभव की जाती है।) सत्यकाम की कथा जो , महर्षि गौतम के एक शिष्य थे, ज...