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सचेतन- 15: साक्षी भाव (Witness Consciousness)

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जब हम साक्षी भाव में रहते हैं, तो हम अपने अनुभवों को सिर्फ अपने विचारों, भावनाओं, और घटनाओं को एक दर्शक की तरह देखना , "देखते" हैं —  जैसे कोई फिल्म देख रहा हो — जुड़ा भी है, पर उसमें डूबा नहीं है। न जज करना , न रोकना, न पकड़ना — बस देखना, समझना और गुजर जाने देना। जैसे: जब क्रोध आए — उसे देखें, "यह क्रोध है", कहें, लेकिन क्रोध न बनें। जब दुख हो — उसे महसूस करें, लेकिन उसमें डूबें नहीं। 📽️ जैसे फ़िल्म देखते समय हम किरदारों से जुड़ते हैं, पर जानते हैं कि हम दर्शक हैं —  वैसे ही साक्षी भाव हमें याद दिलाता है:  "मैं भावना नहीं हूँ, मैं उनका साक्षी हूँ।" प्रज्ञावान व्यक्ति: हर भावना, जैसे दुख, क्रोध, सुख, आदि को वह अंदर से नहीं पकड़ता — बल्कि उन्हें बाहर से देखता है, समझता है, और जाने देता है। इससे क्या होता है? • हम भावनाओं में उलझते नहीं। • मन शांत रहता है। • निर्णय विवेकपूर्ण होते हैं। • जीवन में हल्कापन आता है। 📿 साक्षी भाव आत्म-ज्ञान की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है। 🕰️ साक्षी भाव कब अनुभव होता है? • जब मन शांत होता है। • जब हम ध्यान में होते हैं। •...