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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते

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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचार आपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर, कभी चिंता, कभी भविष्य की टेंशन, तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ कि इस तूफ़ान के बीच भी एक ऐसी जगह है जहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंग यही जगह दिखाता है। यह प्रसंग कहता है कि जिसे आप “मैं” मान बैठे हैं— शरीर, मन, अहंकार— वह सब पानी के बुलबुले जैसा है। और आप? आप वह पानी हैं। आदि शंकराचार्य कहते हैं— जो कुछ भी देखा जा सकता है , महसूस किया जा सकता है , सोचा जा सकता है — वह सब नाशवान है। शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, यहाँ तक कि “मैं” की भावना भी। ये सब पानी पर बने बुलबुले जैसे हैं। एक पल दिखते हैं, फिर बदलते हैं, और फिर मिट जाते हैं। अगर कोई चीज़ आती-जाती है, तो वह आप कैसे हो सकती है? ज़रा कल्पना कीजिए— पानी की सतह पर एक बुलबुला बनता है। वह चमकता है, सुंदर लगता है, लेकिन थोड़ी देर में फूट जाता है। अब सोचिए— शरीर बदल रहा है विचार बदल रहे हैं भावनाएँ बदल रही हैं अहंकार भी बदल रहा है...

क्या आत्मा वास्तव में हर जगह है?

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सचेतन- 17:  आत्मा हर जगह है, फिर भी हमें दिखती क्यों नहीं? नमस्कार मित्रों, आज सचेतन में एक बहुत ही सरल, पर बहुत गहरी बात पर बातचीत करेंगे। एक सवाल से शुरू करते हैं— क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है कि सब कुछ होते हुए भी कुछ अधूरा-सा है? लोग हैं, काम है, हँसी भी है… फिर भी भीतर कहीं एक दूरी-सी, एक खालीपन-सा। हम सोचते हैं— शायद कुछ मिल जाए, तो यह भर जाएगा। कोई रिश्ता, कोई सफलता, कोई ज्ञान, कोई साधना। लेकिन फिर भी… वह कमी बनी रहती है। आज आदि शंकराचार्य आत्मबोध के एक छोटे से श्लोक में इस पूरे रहस्य को बहुत आसान तरीके से समझाते हैं। असली समस्या क्या है? हम मान लेते हैं कि जिस शांति, जिस आत्मा, जिस “सच्चे मैं” को हम खोज रहे हैं— वह कहीं बाहर है। हम कहते हैं— “मुझे खुद को पाना है” “मुझे ईश्वर से जुड़ना है” “मुझे आत्मा को देखना है” लेकिन यही मान्यता हमारी सबसे बड़ी भूल है। यह बिल्कुल वैसा है जैसे— गले में माला पहनकर हम घर-घर उसे ढूँढते फिरें। माला कभी खोई ही नहीं थी। बस ध्यान बाहर था। शंकराचार्य का सूत्र (श्लोक 17) श्लोक कहता है— आत्मा सदा और सर्वत्र है, फिर भी...