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सचेतन :26. श्री शिव पुराण- शिव जी का विषपान शिवरात्रि पर्व के समान है।

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सचेतन :26. श्री शिव पुराण-  शिव जी का विषपान शिवरात्रि पर्व के समान है। Sachetan:Shiva's poison drink is like the Shivaratri festival. विद्येश्वर संहिता हमने समुद्र मंथन और शिकारी की कथा में शिवरात्रि यानी एक सरल भक्ति के भाव को समझने की कोशिश की। शिवजी ने विषपान किया और विष को गले में ही रखा है,पेट में नहीं उतारा।विष की असर से शिवजी का कंठ नीला हो गया इसलिए उनका नाम पड़ा नीलकंठ। विषपान यह बताता है कि कोई निंदा करे तो निंदारूपी जहर को ध्यान में न लेना, पेट में नहीं उतारना है। पेट में जहर रखने से भक्ति नहीं हो सकती। कहते हैं की जब शिवजी विषपान कर रहे थे तो - कुछ छींटे निचे गिरे थे और वह विष के छींटे कुछ जीवों की आँखों में और पेट में पड़े थे। आँख और पेट में जहर मत रखो। मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा होता है कि दूसरों को सुखी देख खुद दुःखी होते है। ऐसा मत करो, आँख में हमेशा प्रेम रखना है। जगत के कल्याण के हेतु शंकर ने विषपान किया। साधु-पुरुष का वर्तन भी ऐसा ही होता है। सज्जन पुरुष अपने प्राण का बलिदान देकर अन्य के प्राण की रक्षा करते है। जबकि संसार के मानव, मोह-माया से लिपट कर पारस्परिक वैर भा...

सचेतन :25. श्री शिव पुराण- शिकारी की कथा- शिवरात्रि का माहात्म्य

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सचेतन :25. श्री शिव पुराण-  शिकारी की कथा- शिवरात्रि का माहात्म्य  Sachetan:The Story of the Hunter - The Greatness of Shivratri विद्येश्वर संहिता एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवशंकर से पूछा, 'ऐसा कौन-सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत-पूजन है, जिससे मृत्युलोक के प्राणी आपकी कृपा सहज ही प्राप्त कर लेते हैं?' उत्तर में शिवजी ने पार्वती को 'शिवरात्रि' के व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई- 'एक बार चित्रभानु नामक एक शिकारी था। पशुओं की हत्या करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। वह एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन उसका ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधित साहूकार ने शिकारी को शिव मठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।' शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव-संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल में शिकार के लिए निकला। लेकिन दिनभर बंदी गृह में रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिक...

सचेतन :24. श्री शिव पुराण- समुद्र मंथन - शिवरात्रि की कथा

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सचेतन :24. श्री शिव पुराण-  समुद्र मंथन - शिवरात्रि की कथा Sachetan:Churning of the Ocean - The Story of Shivaratri. विद्येश्वर संहिता भक्ति मार्ग सरल है और निराकार की साधना कठिन है। जो अव्यक्त और निराकार होता है, उसका आप अनुभव नहीं कर सकते। उसमें आप सिर्फ विश्वास कर सकते हैं। चाहे आप निराकार में विश्वास करते हों, फिर भी जो नहीं है, उसके प्रति गहरी भक्ति और प्रेम को विकसित करते हुए उसे बनाए रखना आपके लिए बहुत मुश्किल होगा। जो है, उसकी भक्ति करना आपके लिए ज्यादा आसान है। इसके साथ ही, वह कहते हैं, ‘अगर कोई निरंतर निराकार की भक्ति कर सकता है, तो वह भी मुझे पा सकता है।’ जब वह ‘मैं’ कहते हैं, तो वह किसी व्यक्ति के रूप में अपनी बात नहीं करते हैं, वह उस भक्ति के उस आयाम के बारे में बात करते हैं जिसमें साकार और निराकार और भक्त की आंतरिक या भीतरी स्थिति है।  दोनों शामिल होते हैं। शिवपुराण में भगवान शिव के पूजन के बारे में बताया गया है। भक्तिपूर्वक भगवान शिव की पूजा का उत्सव 'शिवरात्रि' है। और इस उत्सव के लिए साकार और निराकार रूप दोनों की भावना करनी पड़ती है।  महाशिवरात्रि भारतीयों...

सचेतन :20. श्रीशिवपुराण- भगवान शिव की पूजा मूर्ति में और लिंग में भी क्यों की जाती है ?

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सचेतन :20. श्रीशिवपुराण-  भगवान शिव की पूजा मूर्ति में और लिंग में भी क्यों की जाती है ? Sachetan:Why is Lord Shiva worshiped in idol as well as in Linga? विद्येश्वरसंहिता यदि वेदार्थ ज्ञान से श्रवण, कीर्तन तथा मनन की  साधना करना असम्भव हो तो क्या करें?  सूतजी कहते हैं- शौनक ! जो श्रवण,  कीर्तन और मनन – इन तीनों साधनों के अनुष्ठान में समर्थन हो, वह भगवान् शंकर के लिंग एवं मूर्ति की स्थापना करके नित्य उसकी पूजा करे तो संसार-सागर से पार हो सकता है। उसके लिये भक्तिभाव, पूआ और व्यंजनों से युक्त भाँति-भाँति नैवेद्य, राजोपचार, नमस्कार तथा यथाशक्ति जप,  से भगवान् शिव लिंग एवं मूर्ति को चढ़ाये। प्रदक्षिणा, नमस्कार तथा यथाशक्ति जप करे आवाहन से लेकर विसर्जन तक सारा कार्य प्रतिदिन भक्ति भाव से सम्पन्न करे। ऋषियोंने पूछा- मूर्तिमें ही सर्वत्र देवताओं की पूजा होती है (लिंग में नहीं), परंतु भगवान् शिव की पूजा सब जगह  मूर्ति में और लिंग में भी क्यों की जाती है ? सूतजीने कहा- मुनीश्वरो ! तुम्हारा यह प्रश्न तो बड़ा ही पवित्र और अत्यंत अद्भुत है। इस विषय में महादेव जी ही वक्...

सचेतन :21. श्री शिव पुराण- पुरुष-वस्तु और शिव का साकार रूप

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सचेतन :21. श्री शिव पुराण-  पुरुष-वस्तु और शिव का साकार रूप Sachetan:Purusha-Vastu and Shiva's corporeal form विद्येश्वरसंहिता भगवान शिव की पूजा सब जगह  मूर्ति में और लिंग में भी क्यों की जाती है ? तो कहा गया है की शिव से भिन्न जो दूसरे दूसरे देवता हैं, वे साक्षात् ब्रह्म नहीं हैं। इसलिये कहीं भी उनके लिये निराकार लिंग नहीं उपलब्ध होता। शिव के निष्कल निराकार होने के कारण ही उनकी पूजा का आधारभूत लिंग भी  निराकार ही प्राप्त हुआ है। अर्थात शिवलिंग शिव के निराकार स्वरूप का प्रतीक है। इसी तरह शिव के सकल या साकार होने के कारण उनकी पूजा का आधारभूत विग्रह साकार प्राप्त होता है अर्थात शिव का साकार-विग्रह उनके साकार स्वरूप का प्रतीक होता है। यही कारण है कि सब लोग लिंग (निराकार) को प्रकृति वस्तु और मूर्ति (साकार) को पुरुष वस्तु दोनों रूप में सदा भगवान् शिवकी पूजा करते हैं। हम मनुष्य और हमारे आस पास के प्राकृतिक संपदा का भी निराकार और साकार स्वरूप है  हमारा शक्ल सूरत ढाँचा साकार प्रकृति वस्तु के स्वरूप है। हमारे गुण अवगुण और सोच द्रष्टा निराकार स्वरूप प्रकृति वस्तु के रूप में है...

सचेतन :22. श्री शिव पुराण- 'शिवरात्रि' के उत्सव के लिए साकार और निराकार...

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सचेतन :22. श्री शिव पुराण-  'शिवरात्रि' के उत्सव के लिए साकार और निराकार रूप दोनों की भावना करनी पड़ती है। Sachetan:For the celebration of 'Shivratri' both the corporeal and formless forms have to be felt. विद्येश्वरसंहिता लोग लिंग (निराकार रूप में) प्रकृति वस्तु की भावना से और मूर्ति (साकार) को पुरुष वस्तु के दोनों रूप में सदा भगवान् शिवकी पूजा करते हैं। पुरुष-वस्तु अर्थात् अविकृत भाव से साकार स्वरूप में सुस्थिर रहने वाली वस्तु के बारे में कही गई है। यह एक स्वयं के कल्याणमय होने का विषय है जिसे अच्छी तरह समझ में आ जाए तो जीवन सफल हो जाएगा।अगर हम पुरुष-वस्तु रूप से भगवान शिव का दर्शन कर लें जो हार, नूपुर, केयूर, किरीट, मणिमय कुण्डल, यज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र, पुष्प - माला, रेशमी वस्त्र, हार, मुद्रिका, पुष्प, ताम्बूल, कपूर, चन्दन एवं अगुरुका अनुलेप, धूप, दीप, श्वेतछत्र, व्यंजन, ध्वजा, चंवर तथा अन्यान्य दिव्य उपहार द्वारा, जिनका वैभव वाणी और मन की पहुँच से परे उतना सुंदर है। कहते हैं की सबसे पहले ब्रह्मा और विष्णुने भगवान् शंकर का दर्शन किया और की पूजा की। इससे प्रसन्न हो...

सचेतन :23. श्री शिव पुराण- भक्ति भक्त की आंतरिक स्थिति है।

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सचेतन :23. श्री शिव पुराण-  भक्ति भक्त की आंतरिक स्थिति है। Sachetan:Bhakti is the inner condition of the devotee. विद्येश्वर संहिता भक्तिपूर्वक भगवान शिव की पूजा का उत्सव 'शिवरात्रि' है। और इस उत्सव के लिए साकार और निराकार रूप दोनों की भावना करनी पड़ती है।  निराकार रूप यानी जिसका कोई आकार न हो, जिसके आकार की भावना नहीं की गई हो। या कुछ छिपा हुआ है छदमयुक्त है जो अभी तक मिला नहीं है। यहाँ तक को जो सीधा सादा, सरल होने की अवस्था को निराकार की संज्ञा दी जाती है। कहते हैं की ब्रह्म, ईश्वर, अल्लाह, आकाश, शिव, सभी निराकार हैं। भगवान शिव कहते हैं की ‘अगर कोई निरंतर निराकार भक्ति कर सकता है, तो वह भी मुझे पा सकता है।’ जब वह ‘मैं’ कहते हैं, तो वह किसी व्यक्ति के रूप में अपनी बात नहीं करते हैं, वह उस आयाम की बात करते हैं जिसमें साकार और निराकार दोनों शामिल होते हैं। भक्ति को आमतौर पर मंदिर जाने और पूजा करने से जोड़कर देखा जाता है, ऐसा तथाकथित भक्तों के बाहरी कामों को देखकर सोचा जाता है। भक्ति के उस आयाम के बारे में यह बात कही जा रही जो भक्त की आंतरिक या भीतरी स्थिति है।  भक्ति बुद्ध...

सचेतन :19. श्रीशिवपुराण- यदि वेदार्थ ज्ञान से श्रवण, कीर्तन तथा मनन की ...

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नवंबर 22, 2022-  ShreeShivPuran  सचेतन :19. श्रीशिवपुराण-  यदि वेदार्थ ज्ञान से श्रवण, कीर्तन तथा मनन की  साधना करना असम्भव हो तो क्या करें?  Sachetan: What to do if it is impossible to practice hearing, chanting and meditation with Vedarth knowledge? विद्येश्वरसंहिता गंगा-यमुना के संगम स्थल परम पुण्यमय प्रयाग में, सत्यव्रतमें तत्पर रहनेवाले महातेजस्वी महाभाग महात्मा मुनियों ने एक विशाल ज्ञानयज्ञका आयोजन किया और महाभाग महात्मा मुनियों ने श्री सूत जी से आग्रह किया की हे मुनि! आप हमें वेदान्तसार-सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराण- की कथा सुनाइये। सूत जी कहते हैं- मुनीश्वरो ! इस साधन-का माहात्म्य बताने के प्रसंग में मैं आप- लोगों के लिये एक प्राचीन वृत्तांत का वर्णन करूँगा, उसे ध्यान देकर आप सुनें। पहले की बात है, पराशर मुनि के पुत्र मेरे गुरु व्यासदेव- जी सरस्वती नदी के सुन्दर तट पर तपस्या कर रहे थे। एक दिन सूर्य तुल्य तेजस्वी विमान से यात्रा करते हुए भगवान् सनत्कुमार अकस्मात् वहाँ जा पहुँचे। उन्होंने मेरे गुरुको वहाँ देखा। वे ध्यान में मग्न थे । उससे जगने पर उन्होंने ब्...

सचेतन :17. श्रीशिवपुराण- वेदांग से उत्कृष्ट परिणाम संभव हैं।

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सचेतन :17. श्रीशिवपुराण- वेदांग से उत्कृष्ट परिणाम संभव हैं। Sachetan: Excellent results are possible from Vedanga. विद्येश्वरसंहिता वैदिक धर्म और सभ्यता की जड़ में संसार के सभी सभ्यता किसी न किसी रूप में दिखाई देता है। वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र को ही वेदांग कहा जाता है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरूक्त - ये छः वेदांग है। शिक्षा - इसमें वेद मन्त्रों के उच्चारण करने की विधि बताई गई है। स्वर एवं वर्ण आदि के उच्चारण-प्रकार की जहाँ शिक्षा दी जाती हो, उसे शिक्षा कहा जाता है। इसका मुख्य उद्येश्य वेदमन्त्रों के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण किये जाने का है। शिक्षा का उद्भव और विकास वैदिक मन्त्रों के शुद्ध उच्चारण और उनके द्वारा उनकी रक्षा के उदेश्य से हुआ है। कल्प - वेदों के किस मन्त्र का प्रयोग किस कर्म में करना चाहिये, इसका कथन किया गया है। इसकी तीन शाखायें हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र।  श्रौतसूत्र वैदिक ग्रन्थ हैं और वस्तुत: वैदिक कर्मकांड का कल्पविधान है। गृह्यसूत्र – इनमें गृहिक यज्ञों एवं उत्सव आदि से सम्बद्ध विविध विधियों का विधिवत् वर्णन किया गया...

सचेतन :18. श्रीशिवपुराण- वेदार्थ के ज्ञान से श्रवण, कीर्तन तथा मनन की साधना संभव है।

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सचेतन :18. श्रीशिवपुराण-  वेदार्थ के ज्ञान से श्रवण, कीर्तन तथा मनन की  साधना संभव है।  Sachetan: With the knowledge of Vedartha, it is possible to listen, chant and practice the mind. विद्येश्वरसंहिता वेदार्थ ज्ञान में सहायक शास्त्र को ही वेदांग कहा जाता है। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, ज्योतिष, छन्द और निरुक्त - ये छः वेदांग है। शिक्षा - स्वर एवं वर्ण आदि के अविकल यथास्थिति विशुद्ध उच्चारण, रक्षा के उद्देश्य किया जाना ही  शिक्षा है।  कल्प - कार्य के अनुसार प्रयोग के   विचार और नियम के सूत्र जिसमें करना तीन शाखाएं हैं- श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र और धर्मसूत्र।  व्याकरण - शब्दों का यथार्थ ज्ञान हो सके इसके लिए प्रकृति (शब्द मूल) और प्रत्यय (पदों का निर्माण ) कर के शब्दों की सिद्धि और उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित स्वरों की स्थिति का बोध करना  है।  निरुक्त - शब्द प्रयोग का अर्थपूर्ण निश्चयात्मक और निःशेष रूप से (जिसमें कुछ शेष न हो/ समूचा) जो कथित उसका उल्लेख करना। कल्प - कार्य के अनुसार प्रयोग के   विचार और नियम के सूत्र जिसमें करना तीन शाखाएं हैं- श...

सचेतन :16. श्रीशिवपुराण- वैदिक धर्म और छह वेदांग विश्व की सभी सभ्यताओं के मूल में हैं।

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सचेतन :16. श्रीशिवपुराण-  वैदिक धर्म और छह वेदांग विश्व की सभी सभ्यताओं के मूल में हैं। Sachetan: Vedic religion and the six Vedangas are at the root of all civilizations in the world. विद्येश्वरसंहिता वेदोक्त कर्म अनुष्ठान करके उसके महान् फल को भगवान् शिव के चरणों में समर्पित कर देना ही परमेश्वर पद की प्राप्ति है।  वैदिक धर्म और सभ्यता की जड़ में संसार के सभी सभ्यता किसी न किसी रूप में दिखाई देता है। आदिम हिन्द-अवेस्ता धर्म और उस से भी प्राचीन आदिम हिन्द-यूरोपीय धर्म तक पहुँचती हैं, जिनके कारण वैदिक धर्म यूरोप, मध्य एशिया/ईरान के प्राचीन धर्मों में भी किसी-न-किसी रूप में मान्य थे, जैसे यज्ञ में शिव(रुद्र) और पार्वती का आदर किया जाता है। चौथी सदी में जब ईसाई धर्म शुरू हुआ तो इसमें कर्मकांडों की प्रधानता थी। फलस्वरूप पुनर्जागरण के बाद से इसमें रीति-रिवाज़ों के बजाय आत्मिक परिवर्तन पर अधिक ज़ोर दिया जाता है। अवेस्ता या ज़ेंद अवेस्ता नाम से भी धार्मिक भाषा और धर्म ग्रन्थ दोनों का बोध होता है। जिस भाषा के माध्यम का आश्रय लेकर १४०० से ६०० ई.पू. में जरथुस्त्र धर्म (फारस/ईरान में इस्...

सचेतन :15. श्रीशिवपुराण- भक्ति से ईश्वर से भेंट होता है

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सचेतन :15. श्रीशिवपुराण- भक्ति से ही भगवान का मिलन संभव है। Sachetan: God's meeting is possible with devotion. विद्येश्वर संहिता प्रचंड कलियुग आने पर मनुष्य पुण्य कर्मों से दूर रहेंगे, इस युग में परोपकार के समान दूसरा कोई धर्म नहीं होगा। अतः ऋषि मुनियों ने श्री सूत जी से आग्रह किया की जिस छोटे-से उपायसे इन सबके पापों को तत्काल नाश हो जाय, उसे इस समय कृपापूर्वक बताइये; क्योंकि आप समस्त सिद्धान्त के ज्ञाता हैं।  व्यासजी कहते हैं - उन भावितात्मा मुनियों की यह बात सुनकर सूतजी मन- ही मन भगवान् शंकर का स्मरण करके साध्य-साधन आदिका विचार करते हुए तथा श्रवण, कीर्तन और मनन- इन तीन साधनों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन के बारे में बताया।  पहला कानों के द्वारा भगवान के गुणों और लीलाओं का श्रवण करना, दूसरा वाणी द्वारा सदा प्रभु नाम का जाप करना और तीसरा मन के द्वारा उन्हीं के स्वरूप का मनन करना। यदि व्यक्ति सदा यह तीन साधन करता रहे तो उसे शीघ्र ही परम तत्व का बोध हो सकता है।  व्यासजी कहते हैं - सूतजीका यह वचन सुनकर वे सब महर्षि बोले– 'अब आप हमें वेदान्तसार-सर्वस्वरूप अद्भुत शिवपुराण- की कथा...

सचेतन :14. श्रीशिवपुराण- प्रचंड कलियुग आने पर मनुष्य पुण्य कर्मों से दूर रहेंगे

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सचेतन :14. श्रीशिवपुराण- प्रचंड कलियुग आने पर मनुष्य पुण्य कर्मों से दूर रहेंगे Sachetan: Humans will avoid virtuous deeds when the fierce Kalyug arrives. विद्येश्वर संहिता में  गंगा-यमुना के संगम स्थल परम पुण्यमय प्रयागमें, सत्यव्रतमें तत्पर रहनेवाले महातेजस्वी महाभाग महात्मा मुनियोंने एक विशाल ज्ञानयज्ञका आयोजन किया गया। महात्मा मुनियोंने श्री सूत जी से कहा की तीनों लोकों में भूत, वर्तमान और भविष्य तथा और भी जो कोई वस्तु है, वह आपसे अज्ञात नहीं है, आप हमारे सौभाग्यसे इस यज्ञका दर्शन करनेके लिये यहाँ पधार गये हैं और इसी व्यास से हमारा कुछ कल्याण करनेवाले हैं; क्योंकि आपका आगमन निरर्थक नहीं हो सकता। हमने पहले भी आपसे शुभाशुभ तत्त्वका पूरा-पूरा वर्णन सुना है; किंतु उससे तृप्ति नहीं होती, हमें उसे सुननेकी बारंबार इच्छा होती है। महाभाग महात्मा मुनियोंने आग्रह किया की हे! उत्तम बुद्धि वाले सूतजी! इस समय हमें एक ही बात सुननी है। यदि आपका अनुग्रह हो तो गोपनीय होने पर भी आप उस विषय का वर्णन करें। घोर कलयुग आने पर मनुष्य पुण्यकर्मसे दूर रहेंगे, दुराचारमें फँस जायँगे और सब-के-सब सत्य-भाषणसे...

सचेतन :13. श्रीशिवपुराण- विद्येश्वर संहिता – भगवान शंकर का वर्णन- ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’-2

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सचेतन :13. श्रीशिवपुराण- विद्येश्वर संहिता – भगवान शंकर का वर्णन- ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’-2  Sachetan: Method of listening to Shiva Purana किसी भी चीज़ के निर्माण से फले उसका ध्यान उसकी परिकल्पना आवश्यक है, चाहे श्वेतलोहित नामक उन्नीसवें कल्प में ब्रह्मा सृष्टि रचना के ज्ञान के लिए परब्रह्म का ध्यान किया था। तब भगवान शंकर ने उन्हें अपने पहले अवतार ‘सद्योजात रूप’ में दर्शन दिए। इसमें वे एक श्वेत और लोहित वर्ण वाले शिखाधारी कुमार के रूप में प्रकट हुए और ‘सद्योजात मन्त्र’ देकर ब्रह्माजी को सृष्टि रचना के योग्य बनाया। कहते हैं की भगवान शिव के पांच मुख हैं अवतार के रूप में हैं तभी से वे ‘पंचानन’ या ‘पंचवक्त्र’ कहलाने लगे।  भगवान शिव के पश्चिम दिशा का मुख सद्योजात है। यह बालक के समान स्वच्छ, शुद्ध व निर्विकार हैं।  उत्तर दिशा का मुख वामदेव है। वामदेव अर्थात् विकारों का नाश करने वाला। दक्षिण मुख अघोर है। अघोर का अर्थ है कि निन्दित कर्म करने वाला। निन्दित कर्म करने वाला भी भगवान शिव की कृपा से निन्दित कर्म को शुद्ध बना लेता है।  भगवान शिव के पूर्व मुख का नाम तत्पुरुष है। तत्...