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सचेतन- 48 –आत्मबोध “सब कुछ आत्मा ही है…”

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  क्या होगा अगर मैं आपसे कहूँ — जो दुनिया आप देख रहे हैं… वह असल में आप ही हैं? आप, मैं, यह धरती, यह आकाश — सब एक ही सत्य का विस्तार हैं। यह कोई कवि की कल्पना नहीं। आत्मबोध के विचार में आज हम यही बात करते हैं — “आत्मा ही यह पूरा जगत है। आत्मा से अलग कुछ भी नहीं।” सुनने में अजीब लगता है? आइए इसे बिल्कुल सरल भाषा में समझते हैं। श्लोक कहता है — यह पूरा जगत आत्मा ही है। आत्मा से अलग कुछ भी नहीं है। जैसे मिट्टी से बने घड़े, बर्तन, पात्र — असल में मिट्टी ही हैं। वैसे ही जो कुछ हम देखते हैं, वह आत्मा ही है। घड़ा और मिट्टी मान लीजिए आपके सामने एक घड़ा है। आप कहते हैं — यह घड़ा है। लेकिन अगर गहराई से देखें — यह घड़ा किससे बना है? मिट्टी से। अगर मिट्टी हटा दें — क्या घड़ा बचेगा? नहीं। तो सच क्या है? घड़ा एक नाम है। सत्य मिट्टी है। रूप बदल गया — सत्य नहीं बदला। नाम और रूप का खेल दुनिया में हम क्या देखते हैं? पेड़। इंसान। जानवर। पहाड़। लेकिन हर चीज़ के पीछे क्या है? एक ही चेतना। नाम अलग। रूप अलग। मूल तत्व एक। जैसे सोने से हार, अंगूठी, कंगन बनते हैं। हम कहते हैं — यह अंगूठी ...