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सचेतन 233: शिवपुराण- वायवीय संहिता - गुरु भक्त उपमन्यु की कथा

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उपमन्यु का उपवास  उपमन्यु महर्षि आयोद धौम्य के शिष्यों में से एक थे। इनके गुरु धौम्य ने उपमन्यु को अपनी गाएं चराने का काम दे रखा थ। उपमन्यु दिनभर वन में गाएं चराते और सायँकाल आश्रम में लौट आया करते थे। एक दिन गुरुदेव ने पूछा- "बेटा उपमन्यु! तुम आजकल भोजन क्या करते हो?" उपमन्यु ने नम्रता से कहा- "भगवान! मैं भिक्षा माँगकर अपना काम चला लेता हूँ।" महर्षि बोले- "वत्स! ब्रह्मचारी को इस प्रकार भिक्षा का अन्न नहीं खाना चाहिए। भिक्षा माँगकर जो कुछ मिले, उसे गुरु के सामने रख देना चाहिए। उसमें से गुरु यदि कुछ दें तो उसे ग्रहण करना चाहिए।" उपमन्यु ने महर्षि की आज्ञा स्वीकार कर ली। अब वे भिक्षा माँगकर जो कुछ मिलता उसे गुरुदेव के सामने लाकर रख देते। गुरुदेव को तो शिष्य कि श्रद्धा को दृढ़ करना था, अत: वे भिक्षा का सभी अन्न रख लेते। उसमें से कुछ भी उपमन्यु को नहीं देते। थोड़े दिनों बाद जब गुरुदेव ने पूछा- "उपमन्यु! तुम आजकल क्या खाते हो?" तब उपमन्यु ने बताया कि- "मैं एक बार की भिक्षा का अन्न गुरुदेव को देकर दुबारा अपनी भिक्षा माँग लाता हूँ।" महर्षि ने ...

सचेतन 232: शिवपुराण- वायवीय संहिता - मनःशक्ति के लिए प्राण को लय-तालयुक्त करें

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श्वास-प्रश्वास की गति को लयबद्ध करना प्राणायाम है।  मनःशक्ति के अभिवर्धन के लिए प्राण-प्रक्रिया को लय-तालयुक्त रखना आवश्यक है। प्रसन्नता, उत्फुल्लता, सरसता और स्फूर्ति की प्राप्ति का यही उपाय है।  इसीलिए अगर आप मनःशक्ति के विकास के आकाँक्षी हैं तो लय-तालयुक्त श्वास-प्रक्रिया का अभ्यास अवश्य प्रारंभ कीजिए।  प्राणायाम की विशिष्टता भी उसके लय-तालबद्ध होने में ही है।  सोऽहम् साधना प्राण-प्रक्रिया की इसी लय-तालबद्धता का विकसित रूप है।  अनायास फूट पड़ने वाली गुनगुनाहट प्राणतत्व की इसी लय-ताल की हठात् अभिव्यक्ति है।  साधकों और उत्कर्ष शीला को इस लय-तालबद्ध श्वास-प्रश्वास का सचेत अभ्यास करना चाहिए। श्वास-प्रश्वास की स्वयं की सामान्य गति निश्चित कर ली जाय और प्रयास किया जाय कि अधिकाधिक समय इस गति में एकतानता, समस्वरता बनी रहे। आरम्भ यहीं से किया जाता है।  आगे इस अभ्यास को सूक्ष्म, उच्चस्तरीय, श्रद्धा सिक्त बनाया जाता है। जिसका सर्वोत्कृष्ट रूप है सोऽहम् की सहज-साधना। उस लक्ष्य की प्राप्ति तो बाद की बात है। किन्तु प्राणतत्व का अधिकाधिक लाभ लेना चाहने वालों को लय...

सचेतन 231: शिवपुराण- वायवीय संहिता - प्राण विद्या

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प्राण को प्रखर, पुष्ट, और संकल्प मय बनायें   हम सभी सचेतन के दौरान ध्यान और प्राणायाम करते समय प्राण की जागरूकता रखें जिससे सारे हमचल, ताल, लय और प्राकृतिक सौंदर्य को हम देख पायेंगे और इसके आनन्द को महसूस भी कर पायेंगे। हमारी प्राण-शक्ति सक्रिय है और यह प्राणतत्व सर्वत्र नटराज की तरह हरेक वस्तु में निरन्तर नृत्य-निरत करवाता रहता है। प्राणों की शक्ति से जो नृत्य आप महसूस करते हैं वही आपका जीवन है। जीवन-शक्ति प्राण-शक्ति का ही दूसरा नाम है।  अध्यात्म शास्त्र में प्राण तत्व की गरिमा का भाव भरा उल्लेख है। प्राण की उपासना का आग्रह किया गया है। इसका तात्पर्य इसी प्राणतत्व की लय-तालबद्धता के नियमों को जानना और उससे लाभ उठाना है।  अपने प्राण को प्रखर, पुष्ट, और संकल्प मय बनाना होगा जिससे आप हर क्रिया में सिद्धि का आधार बना सकते हैं। प्राण को आकर्षित करने में सफलता उन्हें ही मिल सकती हैं, जो इस लय-ताल की विधि को समझते और अपनाते हैं। हमारे सृजनात्मक चिंतन करने के लिए और प्रश्नाकुलता होने के लिए प्राण हमारा साध्य, साधन और माध्यम है। यह चिंतन ही हमारी वैश्विक दृष्टिकोण को उजागर ...

सचेतन 230: शिवपुराण- वायवीय संहिता - प्राण-शक्ति सक्रिय है और इसके कुछ नियम हैं

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सचेतन में जब हम सभी ध्यान और प्राणायाम करते वक़्त प्राण की जागरूकता बना कर रखें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में हर एक वस्तु सृष्टि के अस्तित्व को बनाये रखने के लिए निरन्तर गति एवं क्रिया के साथ स्फुरण रहती है यानी हरेक चीज में हलचल होता है। छोटे से छोटे परमाणु से लेकर ग्रह, नक्षत्र, सूर्य सभी पिण्ड पदार्थ गतिशील हैं। यह परिवर्तन तो अस्थाई है लेकिन इसका मूल तत्व स्थायी है, जिसका नाम प्राण है।  यह गति और बदलाव ही ताल और रिदम है और वही ताल-इस प्रकृति का नियम है और मानव शरीर में प्राण तत्व इन सभी ताल और रिदम को शक्ति प्रदान करता है। इसी प्राण तत्व के ताल और नियम  के कारण हम सभी में चेतना सजीवता, प्रफुल्लता, स्फूर्ति, सक्रियता जैसी शारीरिक विशेषता है जिसके कारण हम उत्तरदायित्व होने के साथ साथ जागृत है।यहाँ तक की मानसिक तरंगें जैसे हमारी मनस्विता, तेजस्विता, चातुर्य, दक्षता, प्रतिभा और हमारी अभिव्यक्ति  जैसे हमारी सहृदयता, करुणा, कर्तव्यनिष्ठा, संयमशीलता, तितीक्षा, श्रद्धा, सद्भावना, समस्वरता आदि भी प्राण के द्वारा संचालित होती है और इन सम्वेदनाओं को समझने का अवसर भी इसी से मिलता है।...

सचेतन 229: शिवपुराण- वायवीय संहिता - प्राण से ही मानव शरीर में लय और ताल का संचारण हो रहा है।

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प्राण से सम्वेदनाओं को समझने का अवसर मिलता है।  अगर आप सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को महसूस करके देखिए तो पायेंगे की हर वस्तु में पूरी तरह से सृष्टि का अस्तित्व उसकी गति एवं क्रिया निरन्तर स्फुरण रहती है यानी हलचल का अनुभाव प्रत्येक वस्तु में है।  छोटे से छोटे परमाणु से लेकर ग्रह, नक्षत्र, सूर्य सभी पिण्ड पदार्थ गतिशील हैं। प्रकृति में कोई भी वस्तु स्थिर नहीं है। और जो आपको स्थिर दिखायी दे रहा है उस वस्तुओं के अन्तराल में भी प्रचण्ड गति हो रही है जिसकी गति आप ना ही देख पा रहे हैं और अनुभव भी नहीं हो रहा है। जैसे आप इस पृथ्वी के ले लीजिये अगर इसका एक अणु भी यदि गतिहीन हो जाय तो सारी व्यवस्था लड़खड़ा उठेगी। यह अनवरत स्फुरण से ही विश्व चल रहा है।   यह गतिमान क्रिया का चलना या कोई भी पदार्थ शक्ति के द्वारा ही संचालित होती है। अगर संचालन है तो परिवर्तन है और उसके आकर और नया रूप का परिवर्तन है। कोई भी वस्तु नित्य एवं स्थायी नहीं हैं।  इस स्थिति परिवर्तन में, क्रियाशीलता एवं गतिशीलता में सिर्फ़ एक चीज स्थायी है वही मूल तत्व भी है। जिसका नाम प्राण तत्व है। संपूर्ण  ब्रह्मा...

सचेतन 228: शिवपुराण- वायवीय संहिता - प्राण वायु से रोगों का विनाश होता है

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हमारे पांच प्राण और पांच उप-प्राण हैं  अध्यात्म का ज्ञान शरीर को जानने से आरंभ होता है आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करना है तो शरीर की शुद्धि आवश्यक है जो योग, ध्यान, आराधना और प्रार्थना से संभव है यानी आत्म ज्ञान का मार्ग सिद्धि कर्मों से खुलता है।   उपमन्यु महर्षि आयोद धौम्य के शिष्यों में से एक थे और एक बार उपमन्यु  ने श्री कृष्णजी से सिद्धि कर्मों के बारे में पूछे तो उन्होंने कहा की सिद्धि कर्म का मार्ग हमारे प्राण वायु से शुरू होता है। सर्वप्रथम प्राण वायु को जीतना चाहिए क्योंकि इस पर विजय प्राप्त होने से सब वायुओं पर विजय मिल जाती है। क्रमानुसार अभ्यस्त किया गया प्राणायाम सब दोषों को हटा देता है। यह शरीर की भी रक्षा करता है। जब प्राण वायु पर विजय प्राप्त हो जाती है तो विष्ठा, मूत्र, कफ सभी मंद पड़ जाते हैं। श्वास वायु लंबी तथा देर से आने लगती है। हल्कापन, द्रुतगमन, उत्साह, बोलने में चातुर्य सभी रोगों का विनाश सब प्राणायाम की सिद्धि से पूरे हो जाते हैं। प्राण समस्त जीवन का आधार और सार है; यह वह ऊर्जा है जो तेज है, और सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त है। प्राण उस प्रत्येक...

सचेतन 227: शिवपुराण- वायवीय संहिता - आत्म ज्ञान का मार्ग सिद्धि कर्मों से खुलता है

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प्राणियों का यह समागम भी संयोग-वियोग से युक्त हैं आपने आपको और स्वयं के गुण और शरीर को भी समझने के लिए विवेक चाहिए जिसको पार्थक्य ज्ञान कहते हैं। और मुनियों द्वारा वायु देवता से पूछे गये प्रश्न -बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर से व्यतिरिक्त किसी आत्मा नामक वस्तु की वास्तविक स्थिति कहाँ है?  और आत्मा क्या है? उसके जबाब में वायुदेवता ने कहा की आत्म विषय को जानने के लिए सर्वव्यापी चेतना और बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर को पृथक मानना अवश्य है। लेकिन यह भी निश्चित है की अध्यात्म का ज्ञान शरीर को जानने से आरंभ होता है लेकिन आत्म विषय शरीर से अलग है।  आत्मा नामक कोई पदार्थ निश्चय ही विद्यमान है। उसकी सत्ता या मौजूदगी हेतु  सत्पुरुष बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर को आत्मा नहीं मानते; क्योंकि यह सब हमारी स्मृति (बुद्धि का ज्ञान) है जो अनियत और अनिश्चित है।  इसीलिये वेदों और वेदान्तों में आत्मा को पूर्वानुभूत विषयों का स्मरण कर्ता, सम्पूर्ण ज्ञेय पदार्थो में व्यापक तथा अन्तर्यामी कहा जाता है। ज्ञानी पुरुष निरन्तर विचार करके उस आत्मतत्त्व का साक्षात्कार कर पाते हैं। आत्मतत्त्व का साक्षात्कार हेत...

सचेतन 226: शिवपुराण- वायवीय संहिता - आत्म विषय आपकी चेतना, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर से पृथक है।

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सचेतन 226: शिवपुराण- वायवीय संहिता - आत्म विषय आपकी चेतना, बुद्धि, इन्द्रिय और शरीर से पृथक है।  अध्यात्म का ज्ञान शरीर को जानने से आरंभ होता है| आपको स्वयं के गुण को भी समझने के लिए विवेक चाहिए जिसको पार्थक्य ज्ञान कहते हैं। यानी पृथक या अलग होने वाली अवस्था का पता चलना या अलग अलग परिस्थितियों में उस घटना का भाव का पता चलना और यहाँ तक की एक वस्तु को दूसरी वस्तु से अलग करने वाला गुण को समझना।  योगशास्त्र में अनुसार बुद्धि तत्त्व एवं पुरुष के भेद का ज्ञान नहीं होने की दशा में भी शास्त्र के आधार पर सामान्य विवेक ज्ञान का होना आवश्यक है।  हमारे पास पाँच तन्मात्राएँ, पाँच भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा प्रधान (चित्त), महत्तत्त्व ( बुद्धि ), अहंकार और मन-ये चार अन्त:करण-सब मिलकर चौबीस तत्त्व होते हैं जिसको पृथक पृथक जानना चाहिए। हमारे कर्म करने की दो अवस्था है पहला है कारण अवस्था और दूसरा है कार्य अवस्था जिसका भाव भी पृथक पृथक होना चाहिए।  कारण अवस्था में जब हम कोई कर्म करते हैं तो हम उस वस्तु या क्रिया से पुर्व संबद्ध रहते हैं यानी हम जानते हैं की किस...

सचेतन 225: शिवपुराण- वायवीय संहिता - अभीष्ट इच्छा की वासना ही तमोगुण है

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जब आप मन में बहुत सारी कामनाएँ और ख़ूब सारा ख़याली प्लाव पकाने लगते हैं तो तमोगुण का आगमन आपके अंदर होने लगता है। आपका गुण आपसे और आपके शरीर से बंधा रहता है यह आपसे बाहर नहीं है। हमारे अपने गुण के कारण ही जीवन में माया और भ्रम पैदा होता है। यह त्रिगुनात्मक है जो सत्त्व, रज और तम कहलाता है।   इन तीनों गुणों मे सत्त्वगुण तो निर्मल होता है और इसका आवरण सुख की अनुभूति और ज्ञान का विस्तार करता है। इस गुण से आपका आत्म सम्मान और हर कार्य में  स्वयं की मौजूदगी महसूस होती है जिससे आप प्रभावशाली और उद्यमशील हो जाते हैं।  स्वयं के बारे में नहीं जान पाना या अज्ञानता के कारण किसी भी कर्म को करते रहना सिर्फ़ आपको स्वार्थ और अहंकार जैसे मूल शत्रु को ओर ले जाता है। आप घमंडी बन जाते हैं। अगर आपके साथ ऐसा कुछ हो रहा है तो समझिए रजोगुण और तमोगुण उत्पन्न होना शुरू हो गया है।  रजो गुण जब बढ़ता है तो हम विषयों में सुख की कल्पना करने लगते हैं और मैं सुखी हूँ वाला भाव ही आपका धर्म बनाने लगता है। रजो गुण के  कारण से व्यक्तियों की बौद्धिक क्षमता विकृत हो जाती है उनका ज्ञान अभिमान मे...

सचेतन 224: शिवपुराण- वायवीय संहिता - रजोगुण के कारण सुख की कल्पना प्रारंभ होती है

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मैं सुखी हूँ! यह धर्म समझ कर आसक्त होने से आपके ज्ञान की वृत्ति धीरे धीरे अभिमान की तरफ़ बढ़ने लगती है  आप अपने ज्ञानशक्ति और अपने कला के द्वारा क्रिया करते हैं तो आपका गुण विकसित होकर बाहर निकलता है। यह गुण तीन रूप में प्रकट होता है जो सत्त्व, रज और तम के रूप में आपके प्रकृति को बताता है। आप अपने गुण कारण अपने शरीर से बांधे रहते हैं यह गुण ही हमारे जीवन में माया रूपी आवरण से भ्रम पैदा करता ।  इन तीनों गुणों मे सत्त्वगुण तो निर्मल होता है और इसका आवरण सुख की अनुभूति और ज्ञान का विस्तार करता है। इस गुण से आप अपने उच्चतम मनोवृत्ति में प्रतिष्ठत होते हैं। आपको स्वयं का आत्म सम्मान या आपकी मौजूदगी महसूस होती है। यह सत्त्वगुण के कारण आप प्रभावशाली और उद्यमशील हो जाते हैं।  लेकिन जब हम स्वयं के बारे में नहीं जान पाते हैं तो अज्ञानता के कारण जो भी कर्म कर रहे होते हैं उससे हमारे अंदर अहंकार और स्वार्थ जैसे मूल दोष उत्पन्न होता है। आप जिसे घमंड कहते हैं की यह कार्य मैंने ही तो किया है और ऐसे माया के आवरण के कारण आपके अंदर रजोगुण और तमोगुण उत्पन्न होना शुरू हो जाता है।  रजो ग...

सचेतन 223: शिवपुराण- वायवीय संहिता - सत्त्वगुण के कारण आप प्रभावशाली और उद्यमशील हो जाते हैं।

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तप यानी ज्ञानशक्ति और कला से क्रिया करना जिससे शारीरिक शुद्धि और बुद्ध का गुण विकसित हो सके  हमारे जीवन में पुण्यकर्म और पापकर्म दोनों ही कर्म की प्रधानता होते हैं और यह प्रधानता को समझने के लिए महेश्वर की कृपाप्रसाद चाहिए जिसकी कृपा से आपका  मल नाश हो सके और आप निर्मल-शिव के समान महसूस कर सकें। महेश्वर से प्रार्थना करना है की वे आपके आत्माश्रित दुष्ट भाव का नाश करें, मिथ्या ज्ञान की समाप्ति हो सके, अधर्म के मार्ग पर चलाने से बचा जा सके, आपकी शक्ति का क्षय या दुरुपयोग नहीं हो, अकारण किसी का हेतु यानी माध्यम बनाने से रूका जा सके  और च्युति नहीं बनाना पड़े यानी उपयुक्त कर्म को करने से चूकने का मौक़ा नहीं गमाना पड़े। यही आप अपने माल का नाश करने के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं।  वैसे तो मल का पूर्ण नाश तप से ही संभव होता है। तप का अर्थ यहाँ है की पुरुष अपने ज्ञानशक्ति और अपने कला के द्वारा  क्रिया शक्ति करे जिससे उसकी शारीरिक शुद्धि और बुद्ध का गुण विकसित होकर बाहर निकल कर आये। यह गुण त्रिगुणमय होता है जो सत्त्व, रज और तम के रूप में आपके ही प्रकृति को प्रकट कर...

सचेतन 222: शिवपुराण- वायवीय संहिता - बाह्य इन्द्रियां और अन्त:करण आपके कर्म के द्वार हैं

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सचेतन 222: शिवपुराण- वायवीय संहिता - बाह्य इन्द्रियां और अन्त:करण आपके कर्म के द्वार हैं  जीवन की शुद्धिकरण के लिए तप का प्रयोग करना होता है।  हम चर्चा कर रहे थे की आप जब आध्यात्मिक मार्ग पर होते हैं तो आप अपने परम लक्ष्य तक पहुंचने की जल्दी में होते हैं, आप स्वयं के साक्षात्कार को जल्दी पूरा करना चाहते हैं और यह आध्यात्मिक प्रक्रिया आपके जीवन का बहुत सारे आयाम खोल देती है, ऐसा नहीं है की इस प्रक्रिया में सब कुछ सकारात्मक ही होगा, आपके साथ नकारात्मक चीजें भी होती हैं। अगर आप वाकई आध्यात्मिक मार्ग पर हैं तो आपके चारों ओर हर चीज उथल-पुथल में लगती है। लेकिन आप फिर भी बढ़ रहे हैं, तो यह ठीक है।  कर्म की प्रधानता शिवपुराण के वायवीय संहिता बहुत ही अच्छे से किया गया है की कर्म दो प्रकार के हैं-पुण्यकर्म और पापकर्म। पुण्यकर्म का फल सुख और पापकर्म का फल दुःख है। कर्म अनादि है यानी कर्म का आदि नहीं है यह कर्म की प्रक्रिया जन्म जन्मांतर से चल रहा है जिसके आरंभ का कोई काल या स्थान नहीं है। आप जैसे जैसे कर्म के फल का उपभोग कर लेते हैं वैसे ही उसका अन्त हो जाता है। यानी भोग कर्म का विना...

सचेतन 221: शिवपुराण- वायवीय संहिता - आध्यात्मिक मार्ग पर चलना

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वाकई आप आध्यात्मिक मार्ग पर हैं तो आपके चारों ओर उथल-पुथल है। हमारे कर्म सिर्फ़ एक सीमित संभावना को खोज कर सकता है और एक सीमित इंसान बनाए रखने में मदद करता है। अगर आप आध्यात्मिक मार्ग पर हैं, तो आपको सब कुछ धुंधली नज़र आएगी। इसको साफ़ देखने के लिए आपको अपने कर्म की बेड़ियों को ढीला करना होगा और यह आप शारीरिक स्तर पर आसानी से कर सकते हैं। जो आपको पसंद है उसे आप अचेतना में कर सकते हैं, और जो आपको नापसंद है, उसे आपको सचेतन होकर करना होता है।  आप जब आध्यात्मिक मार्ग पर होते हैं तो आप अपने परम लक्ष्य तक पहुंचने की जल्दी में होते हैं, आप स्वयं के साक्षात्कार को जल्दी पूरा करना चाहते हैं। यह निश्चित है की एक बार जब आध्यात्मिक प्रक्रिया शुरू होती है, बहुत सारे आयाम खोल देती है।जब आप आध्यात्मिक मार्ग पर होते हैं, तो आपके साथ सारी नकारात्मक चीजें भी होती हैं। आपका जीवन एक जबरदस्त गति से बढ़ता है - एक ऐसी गति जो आपके आस-पास के लोगों से कहीं ज्यादा तेज है - तो आपको लगता है कि आपके साथ कोई त्रासदी हो रही है। आप सिर्फ़ एक साधक बन कर इसका  आनंद लेते रहिए।  बहुत से लोगों को यह गलतफहमी है क...

सचेतन 220: शिवपुराण- वायवीय संहिता - कर्म की बेड़ियों को ढीला कैसे करेंगे?

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आध्यात्मिक प्रक्रिया जीवन में बहुत सारे आयाम खोल देती है। सामान्यतः  कर्म फल का नियम मन से प्रेरित क्रियाओं में ही लागू होता है। वैसे दो  प्रकार के कर्म होते हैं संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म । संचित कर्म यह कर्म का गोदाम है, वहाँ सारी जानकारी मौजूद है। अगर आप अपनी आंखें बंद करते हैं, और पर्याप्त जागरूक बन जाते हैं और अपने अंदर देखते हैं, तो आप ब्रह्माण्ड की प्रकृति को जान जाएंगे।  प्रारब्ध कर्म इस जीवन के लिए आबंटित एक खास मात्रा में जानकारी है। आपके जीवन की जीवंतता के आधार पर, जीवन अपने लिए जितनी मात्रा में जानकारी ले सकता है, उतनी ले लेता है।  आपके पास जिस भी तरह का कर्म है, वह एक सीमित संभावना है और यही आपको एक सीमित इंसान बनाता है।आपका हर काम अतीत द्वारा संचालित होता है। अगर आप मुक्ति की दिशा में बढ़ना चाहते हैं, तो पहली चीज जो आपको करने की जरूरत है, वह है कर्म की बेड़ियों को ढीला करना। वरना, आगे बढ़ना नहीं होगा।  अगर आप ईमानदारी से आध्यात्मिक मार्ग पर हैं, तो कुछ भी स्पष्ट नहीं होगा। हर चीज धुंधली होगी।  कर्म की बेड़ियों को ढीला कैसे करेंगे? एक आसन तरीका है...