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सचेतन- 30 – अहंकार का जन्म

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(Ātmabodha Verse 30: The Birth of the Ego) आपने अहंकार के बारे में बहुत कुछ सुना होगा। कभी कहा जाता है— “ईगो छोड़ो।” “अहंकार को मारो।” “ईगो सबसे बड़ी समस्या है।” लेकिन ज़रा एक पल रुककर सोचिए— अगर अहंकार से लड़ना ही अहंकार को और मज़बूत कर देता हो तो? अगर अहंकार कोई दुश्मन नहीं, बल्कि एक गलत पहचान हो? आत्मबोध का श्लोक 30 यही गहरा रहस्य खोलता है। यह श्लोक अहंकार से लड़ना नहीं सिखाता, बल्कि यह दिखाता है कि अहंकार पैदा कैसे होता है—और खुद ही कैसे गिर जाता है। अगर आप थोड़ा भी आत्मिक रास्ते पर चले हैं, तो आपने यह समझना शुरू कर दिया होगा— “मैं शरीर नहीं हूँ।” “मैं विचार नहीं हूँ।” “मैं देखने वाला हूँ।” यह समझ शांति देती है। जीवन हल्का लगता है। लेकिन ईमानदारी से देखें तो अंदर कहीं एक हल्की-सी भावना रह जाती है— “मैं एक जागरूक व्यक्ति हूँ।” “मैं साक्षी हूँ, और दुनिया अलग है।” यहीं पर अहंकार का सबसे सूक्ष्म रूप जन्म लेता है— आध्यात्मिक अहंकार। आत्मबोध का श्लोक 30 यहीं से अगला कदम दिखाता है। यात्रा के दो चरण वेदांत में आत्म-ज्ञान की यात्रा दो चरणों में समझाई जाती है। पहला चरण —...

क्या आपका व्यक्तित्व सिर्फ़ परतों का रंग है?

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सचेतन- 15:   आत्मबोध की यात्रा “मैं कौन हूँ — या सिर्फ़ परतों का रंग?” नमस्कार मित्रों, क्या कभी ऐसा हुआ है कि— आप हँस रहे हैं… लेकिन भीतर कुछ भारी है? सब आपको मज़बूत समझते हैं… लेकिन मन चाहता है कि कोई बस पूछ ले— “तुम ठीक हो?” आज का सवाल बहुत छोटा है, लेकिन बहुत गहरा है— “मैं कौन हूँ?” क्या मैं वही हूँ जो दिखता हूँ? क्या मैं वही हूँ जो लोग मेरे बारे में सोचते हैं? क्या मैं वही हूँ जो मैं दुनिया को दिखाता हूँ? या फिर… मैं इन सबसे कुछ और हूँ? आज की यह बात किसी परीक्षा के लिए नहीं है। यह बस एक याद दिलाना है। अगर मन थोड़ा खुला हो, तो मेरे साथ चलिए। क्रिस्टल की छोटी-सी कहानी कल्पना कीजिए— एक बिल्कुल साफ़, बेरंग क्रिस्टल। उसके पास नीला कपड़ा रख दें— वह नीला दिखने लगता है। लाल कपड़ा रख दें— वह लाल दिखने लगता है। लेकिन क्या क्रिस्टल सच में बदल जाता है? नहीं। वह बस रंग पकड़ता है । हमारी भावनाएँ, हमारी भूमिकाएँ, हमारे नाम और पहचान— ये सब रंग हैं। और हम? हम वह क्रिस्टल हैं। आत्मबोध का सूत्र — शंकराचार्य की दृष्टि हज़ारों साल पहले आदि शंकराचार्य ने आत्मबोध में लिखा: “...