सचेतन- 41 –आत्मबोध “तुम जानने वाले नहीं… तुम स्वयं प्रकाश हो”
सचेतन- 41 –आत्मबोध “तुम जानने वाले नहीं… तुम स्वयं प्रकाश हो” क्या आपने कभी सोचा है… कि जो सब कुछ जान रहा है… क्या उसे भी कोई जान सकता है? आप किताब पढ़ते हैं… आप सोचते हैं… आप महसूस करते हैं… लेकिन जो इन सबको देख रहा है — वह कौन है? आज आत्मबोध के विचार में एक बहुत बड़ा रहस्य खोलते हैं। कहते हैं की — आत्मा में “जानने वाला”, “ज्ञान” और “जिसे जाना जा रहा है” — इन तीनों का कोई भेद नहीं है। आज इसे बहुत सरल भाषा में समझते हैं… दिल से… अनुभव से… जीवन से। हम सामान्यतः कैसे जानते हैं? जब आप मोबाइल देखते हैं— आप = देखने वाले मोबाइल = जिसे देखा जा रहा है देखने की प्रक्रिया = ज्ञान यह तीन भाग हैं। वेदांत इसे कहते हैं — त्रिपुटी । हम हर चीज़ ऐसे ही जानते हैं। लेकिन शंकराचार्य कहते हैं — आत्मा के मामले में यह नियम लागू नहीं होता। आत्मा को “जानना” संभव क्यों नहीं? अगर कोई आपसे पूछे— “क्या आप खुद को जानते हैं?” आप कहेंगे — “हाँ।” लेकिन ज़रा सोचिए… क्या आप खुद को बाहर से देख सकते हैं? क्या आप खुद को एक वस्तु की तरह पकड़ सकते हैं? नहीं। क्यों? क्योंकि जो जान रहा है… वही आप हैं। ...