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आप अपना शरीर नहीं हैं – यह बात सुनकर डर और असुरक्षा कैसे गायब हो जाती है?

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आप अपना शरीर नहीं हैं। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है, क्योंकि बचपन से हमें यही सिखाया गया है— “मैं यह शरीर हूँ।” इसीलिए हम इसके लिए डरते हैं, बीमार पड़ने से घबराते हैं, बुढ़ापे से डरते हैं, और मौत का ख़याल आते ही काँप जाते हैं। लेकिन सोचिए— अगर यह मान्यता ही ग़लत हो तो? अगर यह शरीर आप नहीं, बल्कि सिर्फ़ एक साधन हो? आत्मबोध के प्रसंग में -  यही बात बहुत साफ़ शब्दों में कहता है— और अगर इसे सही से समझ लिया जाए, तो डर और असुरक्षा की जड़ ही कट जाती है। आदि शंकराचार्य कहते हैं— मैं स्थूल शरीर से अलग हूँ, इसलिए जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु मुझसे संबंधित नहीं हैं। और आगे— मैं इंद्रियाँ नहीं हूँ, इसलिए शब्द, रूप, स्वाद जैसी इंद्रिय-वस्तुओं से मेरा कोई वास्तविक संबंध नहीं है। अब इसे बहुत आसान भाषा में समझते हैं। शरीर आप क्यों नहीं हो सकते? ज़रा सोचिए— आप अपने शरीर को देख सकते हैं। आप कहते हैं— “मेरा हाथ दुख रहा है” “मेरा शरीर थक गया है” जिसे आप देख रहे हैं, जिसके बारे में आप बोल रहे हैं— वह “आप” कैसे हो सकता है? शरीर पैदा होता है, बढ़ता है, बदलता है, बीमार पड़ता है...