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सचेतन- 61 – आत्मबोध “जो सबको रोशन करता है… उसे कौन रोशन करेगा?”

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  अभी आप सब कुछ देख पा रहे हैं… कमरा… मोबाइल… लोग… 👉 क्यों? क्योंकि रोशनी है। लेकिन एक गहरा सवाल… 👉 जो रोशनी को भी दिखाए… वह क्या है? आज का आत्मबोध कहता है — 👉 तुम उसी रोशनी हो… जिससे सब कुछ दिखाई देता है। आज के श्लोक का सरल भावार्थ है  “जिसकी वजह से सूरज, चाँद और सब प्रकाश चमकते हैं… लेकिन जिसे वे प्रकाशित नहीं कर सकते… जिससे यह पूरा जगत दिखाई देता है — वही ब्रह्म है।” क्या सूरज ही सबसे बड़ा प्रकाश है? हम मानते हैं — 👉 सूरज है तो सब दिखता है 👉 रात है तो कुछ नहीं दिखता सही है… लेकिन एक बात सोचिए — 👉 सूरज को भी “आप” ही जानते हैं 👉 अगर आप न हों… तो क्या सूरज का कोई मतलब है? असली प्रकाश क्या है? श्लोक कहता है — 👉 सूरज, चाँद, आग — ये सब “दिखने वाले” प्रकाश हैं पर… 👉 जो इन्हें भी “जानता” है 👉 वही असली प्रकाश है 👉 वही चेतना है चेतना के बिना कुछ नहीं मान लीजिए — पूरा कमरा रोशनी से भरा है… लेकिन अगर आप बेहोश हैं? 👉 क्या कुछ दिखेगा? 👉 क्या कुछ समझ आएगा? 👉 नहीं। इसका मतलब — 👉 असली रोशनी बाहर नहीं 👉 अंदर की चेतना है जिसे कोई नहीं दिखा सकता दुनिया की हर चीज़… 👉 किसी न किस...