सचेतन- 42 –आत्मबोध “ज्ञान की आग कैसे जले?” क्या आपने कभी सोचा है… हम जानते तो बहुत कुछ हैं, फिर भी भीतर अँधेरा क्यों रहता है? किताबें पढ़ते हैं, प्रवचन सुनते हैं, मंत्र भी जानते हैं… फिर भी डर, गुस्सा, असुरक्षा क्यों नहीं जाती? आज का आत्मबोध - एक अद्भुत उदाहरण देता है। वह कहता है — ज्ञान अपने आप नहीं जलता। उसे रगड़ना पड़ता है। और जब वह जलता है… तो अज्ञान को जला कर राख कर देता है। आइए इसे बहुत सरल भाषा में समझते हैं। पुराने समय की एक विधि प्राचीन भारत में आग कैसे जलती थी? दो लकड़ियाँ होती थीं — नीचे की लकड़ी स्थिर, ऊपर की लकड़ी घूमती हुई। उन्हें लगातार रगड़ा जाता था। धीरे-धीरे गर्मी बढ़ती थी। फिर चिंगारी निकलती थी। फिर आग। शंकराचार्य कहते हैं — ध्यान भी ऐसा ही है। यहाँ लकड़ी कौन है? नीचे की लकड़ी क्या है? आपका मन। ऊपर की लकड़ी क्या है? वेदांत का ज्ञान। महावाक्य — “अहं ब्रह्मास्मि”, “तत्त्वमसि” और रगड़ क्या है? बार-बार सुनना… सोचना… मनन करना… निदिध्यासन करना। यही “मन्थन” है। हम क्यों नहीं बदलते? हम सब सुनते हैं — “आप आत्मा हैं” “आप शुद्ध चैतन्य हैं” “आप प...
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