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फ़रवरी, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सचेतन :89 श्री शिव पुराण- अर्धनारीश्वर पुरुष और प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा ही काम है। रागात्मक प्रवृत्ति के लिए  शक्ति और शिव दोनों अभिभाज्य तरह से मौजूद होना चाहिए। राग यानी प्रेम उत्पन्न करने या बढ़ाने वाला प्रेममय प्रीतिवर्धक। 'राग' शब्द संस्कृत की 'रंज्' धातु से बना है। रंज् का अर्थ है रंगना। जिस तरह एक चित्रकार तस्वीर में रंग भरकर उसे सुंदर बनाता है, उसी तरह संगीतज्ञ मन और शरीर को संगीत के सुरों से रंगता ही तो हैं। रंग में रंग जाना मुहावरे का अर्थ ही है कि सब कुछ भुलाकर मगन हो जाना या लीन हो जाना। संगीत का भी यही असर होता है। जो रचना मनुष्य के मन को आनंद के रंग से रंग दे वही राग कहलाती है। शिव नर के द्योतक हैं तो शक्ति नारी की। वे एक दुसरे के पूरक हैं। शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी करती हैं। शिव कारण हैं तो शक्ति कारक है  शिव संकल्प करते हैं; शक्ति संकल्प सिद्धी। शक्ति जागृत अवस्था हैं तो शिव सुसुप्तावस्था है। शक्ति मस्तिष्क हैं तो  शिव हृदय है...

सचेतन :87 श्री शिव पुराण- अर्धनारीश्वर रहस्य

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमने बात किया था की कामवासना भी एक उपासना, साधना है। काम, जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। पुरुष का तात्पर्य विवेक संपन्न मनुष्य से है अर्थात विवेक शील मनुष्यों के लक्ष्यों की प्राप्ति ही पुरुषार्थ है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अविभक्त तत्व था। सृष्टि के आरंभ में प्रजापति अकेले थे।     विश्वरचना के लिए भी दो विरोधी भाव चाहिए। विरोध के बाद हमारे मन में परिकल्पना और किसी उद्देश्य का उद्गम होता है। फिर जब आप उस उद्देश्य की पूर्ति हेतु काम करते हैं तो उससे आनंद का अनुभव होता है।  प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। रागात्मक प्रवृत्ति के लिए  शक्ति और शिव दोनों अभिभाज्य ट्र्ह से मौजूद होना चाहिए। राग यानी प्रेम उत्पन्न करने या बढ़ाने वाला प्रेममय प्रीतिवर्धक। शिव नर के द्योतक हैं तो शक्ति नारी की। वे एक दुसरे के पूरक हैं। शिव के बिना शक्ति का अथवा शक्ति के बिना शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं है। शिव अकर्ता हैं। वो संकल्प मात्र करते हैं; शक्ति ...

सचेतन :86 श्री शिव पुराण- कामदेव ने ही शिव व पार्वती के बीच प्रेम बनाया था

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ आम तौर पर दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में, जिस चीज को लोग दैवी या ईश्वरीय मानते हैं, उसे अच्छा ही दर्शाया जाता है। लेकिन अगर आप शिव पुराण को ध्यान से पढ़ें, तो आप शिव की पहचान अच्छे या बुरे के रूप में नहीं कर सकते। वह सब कुछ हैं - वह सबसे बदसूरत हैं, वह सबसे खूबसूरत भी हैं। वह सबसे अच्छे और सबसे बुरे हैं, वह सबसे अनुशासित भी हैं, मगर पियक्कड़ भी। उनकी पूजा देवता, दानव और दुनिया के हर तरह के प्राणी करते हैं। हमारी तथाकथित सभ्यता ने अपनी सुविधा के लिए इन हजम न होने वाली कहानियों को नष्ट भी किया, मगर शिव का सार दरअसल इसी में है। जब राक्षस तारकासुर ने आतन्क मचा दिया था तब तारकासुर के वध के लिये देवताओं ने कामदेव से विनती की कि वह शिव व पार्वती मे प्रेम बना दे क्योकि तारकासुर को वह वरदान था कि केवल शिव व पार्वती का पुत्र ही तारकासुर का वध कर सकता है। तो कामदेव तथा देवी रति कैलाश पर्वत शिव का ध्यान भन्ग करने के लिये गये पर कामदेव का बाण लगने से शिव का ध्यान तो भन्ग हो गया पर शिव को बहुत क्रोध आ गया व शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल कर कामदेव को भस्म कर दि...

सचेतन :85 श्री शिव पुराण- सुरक्षित काम प्राकृतिक व्यवहार के लिए आवश्यक माना गया है

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ कामवासना भी एक उपासना, साधना है। काम पूर्ति से दिमाग की गन्दगी निकलकर जिन्दगी सुधर जाती है। काम, जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। पुरुषार्थ = पुरुष+अर्थ =पुरुष का तात्पर्य विवेक संपन्न मनुष्य से है अर्थात विवेक शील मनुष्यों के लक्ष्यों की प्राप्ति ही पुरुषार्थ है। प्रत्येक प्राणी के भीतर रागात्मक प्रवृत्ति की संज्ञा काम है। वैदिक दर्शन के अनुसार काम सृष्टि के पूर्व में जो एक अविभक्त तत्व था वह विश्वरचना के लिए दो विरोधी भावों में आ गया। इसी को भारतीय विश्वास में यों कहा जाता है कि आरंभ में प्रजापति अकेला था। उसका मन नहीं लगा। उसने अपने शरीर के दो भाग। वह आधे भाग से स्त्री और आधे भाग से पुरुष बन गया। तब उसने आनंद का अनुभव किया। स्त्री और पुरुष का युग्म संतति के लिए आवश्यक है और उनका पारस्परिक आकर्षण ही कामभाव का वास्तविक स्वरूप है।  कामदेव के अस्त्र शस्त्र धनुष प्रकृति के समान है जो सबसे ज्यादा मजबूत है। यह धनुष मनुष्य के काम में स्थिर-चंचलता जैसे दोनों अलंकारों से युक्त है। इसीलिए इसका एक कोना स्थिरता का और एक...

सचेतन :84 श्री शिव पुराण- कामदेव मनुष्य को कर्म करने की प्रेरणा देता है

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमारा मन कामरूप होने के कारण मदन स्वरूप है। दर्प यानी अहंकार, घमंड, गर्व, मन का एक भाव जिसके कारण व्यक्ति दूसरों को कुछ न समझे, अक्खड़पन।कंदर्प नाम का अर्थ "प्यार के देवता, कंदर्प का अर्थ है प्यार के स्वामी" होता है। हिंदू संस्कृति में पुराणों की चर्चा खूब मिलती है। इन्हीं पुराणों में से एक है – शिव पुराण। तो क्या है इस पुराण में – सिर्फ कहानियां या कहानियों के जरिए कुछ और बताने की कोशिश की गई है? जिस विशाल खालीपन को हम शिव कहते हैं, वह सीमाहीन है, शाश्वत है। मगर चूंकि इंसानी बोध रूप और आकार तक सीमित होता है, इसलिए हमारी संस्कृति में शिव के लिए बहुत तरह के रूपों की कल्पना की गई। गूढ़, समझ से परे ईश्वर, मंगलकारी शंभो, बहुत नादान भोले, वेदों, शास्त्रों और तंत्रों के महान गुरु और शिक्षक, दक्षिणमूर्ति, आसानी से माफ कर देने वाले आशुतोष, स्रष्टा के ही रक्त से रंगे भैरव, संपूर्ण रूप से स्थिर अचलेश्वर, सबसे जादुई नर्तक नटराज, आदि। यानी जीवन के जितने पहलू हैं, उतने ही पहलू शिव के बताए गए हैं। कामदेव को हिंदू शास्त्रों में प्रेम और काम का देवता मान...

सचेतन :83 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: कामदेव का जन्म

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता के इस संवाद में ब्रह्माजी ने मुनिश्रेष्ठ नारद जी को अपने मानसपुत्र तथा सप्तर्षियों में से एक मरीचि जो वायु और कश्यप ऋषि के पिता हैं और उन्होंने कामदेव का नाम कैसे रखा उसके बारे में बताया। ब्रह्मा जी मुनिश्रेष्ठ नारद जी से कहते हैं की हमारे मन की तरह यह कामरूप होने के कारण आप काम नाम से भी विख्यात हो गये। लोगों को मदमत् बना देने के कारण तुम्हारा एक नाम मदन होगा।वे बड़े दर्प से उत्पन्न हुए तो दर्पक कहलाए और संर्दप होने के कारण ही जगत में कंदर्प नाम से भी तुम्हारी ख्याती होगी। दर्प यानी अहंकार, घमंड, गर्व, मन का एक भाव जिसके कारण व्यक्ति दूसरों को कुछ न समझे, अक्खड़पन।कंदर्प नाम का अर्थ "प्यार के देवता, कंदर्प का अर्थ है प्यार के स्वामी" होता है।एक पौराणिक देवता जो काम और वासना के उत्प्रेरक माने जाते हैं; कामदेव; मदन; अनंग; मन्मथ संगीत में रुद्रताल का एक प्रकार या भेद ब्रह्मा जी ने कहा समस्त देवताओं का सम्मिलित बल पराक्रम भी तुम्हारे साथ समान नहीं होगा। अतः सभी स्थानों पर तुम्हारा अधिकार होगा, सर्वव्यापी होगे। ...

सचेतन :83 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: कामदेव का जन्म

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सचेतन :82 श्री शिव पुराण- रूद्र संहिता: पुरुष जन्म लेते ही अपने मन को भी मथने लगते हैं

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ श्री शिव पुराण के रूद्र संहिता से यह संवाद ब्रह्माजी और मुनिश्रेष्ठ नारद जी के बीच हो रहा है।  ब्रह्मा जी कहते हैं- मुनिश्रेष्ठ हे नारद जी! तदन्नतर मेरे अभिप्राय को जानने वाले मरीचि आदि मेरे पुत्र सभी मुनियों ने उस पुरुष का उचित नाम रखा। दक्ष आदि प्रजापतिओं ने उसका मुंह देखते ही परोक्ष के भी सारे वृतांत जानकर उनके लिए स्थान और पत्नी प्रदान की। मेरे पुत्र मरीचि आदि द्विजों ने उस पुरुष के नाम निश्चित करके उससे यह युक्तियुक्त बात कही। मरीचि एक ऋषि हैं। वे ब्रह्मा के एक मानसपुत्र तथा सप्तर्षियों में से एक हैं। गीता के अनुसार मरीचि वायु है और कश्यप ऋषि के पिता हैं। इनका विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सम्भूति के साथ हुआ था। पुरुष यानी जीवात्मा (आत्मा) जिसको कपिल मुनि कृत सांख्य शास्त्र में पुरुष कहा गया है - ध्यान दीजिये इसमें यह लिंग द्योतक न होकर आत्मा द्योतक है। मरीचि एक ऋषि जीवात्मा (आत्मा) को पुरुष का उचित संज्ञा दिया। ऋषि बोले- पुरुष जन्म लेते ही अपने मन को भी मथने लगे। इसलिए लोक में मन्मथ नाम से विख्यात होंगे। यह पुरुष मनोभव! तीनों लोकों म...

सचेतन :81 श्री शिव पुराण- हम वास्तव में कौन हैं?

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में केशव ने बताया है की काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।   द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । वास्तव में राग-द्वेष का अर्थ 'अहम्'-(मैं-पन-) से है। अहं या फिर अहम् संस्कृत भाषा का महत्वपूर्ण  शब्द है। अहम् (अहं ) का उपयोग  उत्तम  पुरुष एकवचन(First person) के लिए किया जाता है। जब वक्ता श्रोता से या अन्य किसी व्यक्ति से  स्वयं के बारे में बाते कर रहे हो तब । 'अहम्'-(मैं-पन-) या फिर अहंकार यह एक बहुत ही जटिल अवधारणा है, जिसमें मनोविज्ञान, दर्शनशास्र जैसे विभिन्न क्षेत्र शामिल हैं।'अहम्'-(मैं-पन-) में सबसे महत्वपूर्ण पहलुओं या सबसे बड़ी संभावना को खोजना जहां आप सादगी के साथ अपने आप को प्रस्तुत करने की कोशिश कर सकते हैं  अहंकार के कई अलग-अलग सिद्धांत और उपचार भी है। जिसमें अहंकार को जब वास्तव में हम खुद की मानसिक छवि सोचते हैं और हम अपने शरीर, हमारे चरित्र और हमारे अस्तित्व को सामान्य रूप से देखना शु...

सचेतन :80 श्री शिव पुराण- राग-द्वेष पर विजय पाने के उपाय

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में केशव ने बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।   द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । द्वेष का भाव चिढ़, शत्रुता, वैर से है। चित्त मन का सबसे भीतरी आयाम है, और राग-द्वेष का संबंध उस चीज से है जिसे हम चेतना कहते हैं। अगर आपका मन सचेतन हो गया, अगर आपने चित्त पर एक खास स्तर का सचेतन नियंत्रण पा लिया, तो आपकी पहुंच अपनी चेतना तक हो जाएगी तो हम राग-द्वेष का नियंत्रण कर सकते हैं।  हमारी प्रत्येक इन्द्रिय प्रत्येक विषय के राग-द्वेष में अलग-अलग स्थिति के साथ रहता है।  इन्द्रिय में अनुकूलता और प्रतिकूलता की मान्यता होती है जिससे मनुष्य के राग-द्वेष भी अनुकूलता और प्रतिकूलता होते हैं।  इन्द्रिय के विषय में अनुकूलता का भाव होने पर मनुष्य का उस विषय में 'राग' हो जाता है और प्रतिकूलता का भाव होने पर उस विषय में 'द्वेष' हो जाता है। वास्तव में राग-द्वेष का अर्थ 'अहम्'-(मैं-पन-) से है। भगवान हमेंशा अपने  स...

सचेतन :79 श्री शिव पुराण- द्वेष से दुःख होता है

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ केशव के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।   एक गरीब आत्म छवि होना ईर्ष्या का एक और कारण है। सामान्य और असामान्य: ईर्ष्या सबसे अच्छा दो मुख्य उदाहरण है। परिवार ईर्ष्या, सहोदर स्पर्द्धा ईर्ष्या के इस प्रकार के एक ट्रेडमार्क विशेषता है। असामान्य ईर्ष्या अक्सर, रुग्ण मानसिक रोग, हो गया हो या चिंतित ईर्ष्या के कारण होता है। ईर्ष्या दो लोगों के एक सामाजिक या व्यक्तिगत संबंधों का हिस्सा है।  द्वेष का अर्थ है की चित्त को अप्रिय लगने की वृत्ति । विशेष— योगशास्त्र में द्वेष उस भाव को कहा गया है जो दुःख का साक्षात्कार होने पर उससे या उसके कारण से हटने या बचने की प्रेरणा करता है। द्वेष का भाव चिढ़, शत्रुता, वैर से है।  भगवान के बारे में कहा जाता है की वो राग-द्वेष से परे है पर अपने भक्तों से प्रेम करता है और उनपर कृपा करता है। चित्त मन का सबसे भीतरी आयाम है, और राग-द्वेष का संबंध उस चीज से है जि...

सचेतन :78 श्री शिव पुराण- ईर्ष्या मानवीय रिश्तों में एक विशिष्ट अनुभव है।

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ केशव के रूप में भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रुओं  के बारे में बताया है की -काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष बड़े शत्रु मनुष्य के अंदर विराजमान रहते हैं ।   लोभ: मनुष्य के अंदर वस्तु के अभाव की भावना होते ही प्राप्ति, सान्निध्य या रक्षा की प्रबल इच्छा जग पड़े, लोभ कहते हैं।  प्रेम को जीवन में अंतरंग हर प्रकार के संबंधओं को बना कर रखने की एक आध्यात्मिक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं जिसमें खुद को मिटा देन की प्रक्रिया की तरह देखते हैं। जब हम ’मिटा देने’ की बात कहते हैं तो हो सकता है, यह नकारात्मक लगे। जब आप वाकई किसी से प्रेम करते हैं तो आप अपना व्यक्तित्व, अपनी पसंद-नापसंद, अपना सब कुछ समर्पित करने के लिए तैयार होते हैं। जब प्रेम नहीं होता, तो लोग कठोर हो जाते हैं। जैसे ही वे किसी से प्रेम करने लगते हैं, तो वे हर जरूरत के अनुसार खुद को ढालने के लिए तैयार हो जाते हैं। यह अपने आप में एक शानदार आध्यात्मिक प्रक्रिया है, क्योंकि इस तरह आप लचीले हो जाते हैं। प्रेम बेशक खुद को मिटाने वाला है और यही इसका सब...

सचेतन :77 श्री शिव पुराण- मनुष्य के अंदर के छह सबसे बड़े शत्रु (प्रेम से मुक्ति)

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सचेतन :77 श्री शिव पुराण- मनुष्य के अंदर के छह सबसे बड़े शत्रु #RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमारे जीवन का सत्य यह है की जब तक मनुष्य भक्तिभाव से सनातन यानी सत्य की ओर नहीं झुक जाता है, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रु जनित पीड़ा, ये चारों प्रकार के पाप दुखी करते हैं।  दरिद्रता मनुष्य के भीतर पनपने वाला एक ऐसा हीनभाव है, जो औरों की तुलना में स्वयं को गुणों, साम‌र्थ्य, सत्ता और योग्यता में कमतर समझता है। दुःख एक प्रकार का चित्तविक्षेप या अंतराय है जिससे समाधि में विध्न पड़ता है। शरीर के किसी अंग/उपांग की संरचना का बदल जाना या उसके कार्य करने की क्षमता में कमी आना 'रोग' कहलाता है। भय मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। विश्वास और विकास दोनों ही इससे कुंठित हो जाते हैं। भय मानसिक कमजोरी है।  केशव कृष्ण ने बताया कि मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रु विराजमान रहते हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष।  ज्ञान से बड़ा व्यक्ति का कोई मित्र नहीं है। वहीं मोह इंसान का सबसे बड़ा शत्रु है। क्रोध से भयंकर कोई आग नहीं है। क्रोध ऐसी अग्नि है जो व्यक्ति को अंदर ही अंदर...

सचेतन :76 श्री शिव पुराण- मनुष्य के अंदर के छह सबसे बड़े शत्रु

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ हमारे जीवन का सत्य यह है की जब तक मनुष्य भक्तिभाव से सनातन यानी सत्य की ओर नहीं झुक जाता है, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रु जनित पीड़ा, ये चारों प्रकार के पाप दुखी करते हैं।  दरिद्रता मनुष्य के भीतर पनपने वाला एक ऐसा हीनभाव है, जो औरों की तुलना में स्वयं को गुणों, साम‌र्थ्य, सत्ता और योग्यता में कमतर समझता है। दुःख एक प्रकार का चित्तविक्षेप या अंतराय है जिससे समाधि में विध्न पड़ता है। शरीर के किसी अंग/उपांग की संरचना का बदल जाना या उसके कार्य करने की क्षमता में कमी आना 'रोग' कहलाता है। भय मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। विश्वास और विकास दोनों ही इससे कुंठित हो जाते हैं। भय मानसिक कमजोरी है।  केशव कृष्ण ने बताया कि मनुष्य के अंदर छह सबसे बड़े शत्रु विराजमान रहते हैं - काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष।  ज्ञान से बड़ा व्यक्ति का कोई मित्र नहीं है। वहीं मोह इंसान का सबसे बड़ा शत्रु है। उसे जीवन का मूल उद्देश्य नहीं समझने देता। जब व्यक्ति किसी काम में अपना मन नहीं लगा पाता तो काम वासना व्यक्ति को दिमागी रूप से बीमार बना देत...

सचेतन :74-75 श्री शिव पुराण- मनुष्य के अंदर के छह सबसे बड़े शत्रु

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ भगवान शिव की भक्ति सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है तथा समस्त मनोवांछित फलों को देने वाली है। यह दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश करने वाली है। सनातन का अर्थ है जो शाश्वत हो, सदा के लिए सत्य हो। जिन बातों का शाश्वत महत्व हो वही सनातन कही गई है। हमारे जीवन का सत्य यह है की जब तक मनुष्य भक्तिभाव से सनातन यानी सत्य नहीं हो जाता है, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रु जनित पीड़ा, ये चारों प्रकार के पाप दुखी करते हैं।  दरिद्रता का आशय केवल धनाभाव व सुख-सुविधाओं से वंचित होना ही नहीं है। वस्तुत: दरिद्रता मनुष्य के भीतर पनपने वाला एक ऐसा हीनभाव है, जो औरों की तुलना में स्वयं को गुणों, साम‌र्थ्य, सत्ता और योग्यता में कमतर समझता है।  वेदांत ने सुखदुःख के ज्ञान को अविद्या कहा है । अविद्या शब्द का प्रयोग माया के अर्थ में होता है। भ्रान्ति एवं अज्ञान भी इसके पर्याय है। यह चेतनता की स्थिति तो हो सकती है, लेकिन इसमें जिस वस्तु का ज्ञान होता है, वह मिथ्या होती है। सुखदुःख की निवृत्ति ब्रह्माज्ञान द्वारा हो जाती है। योग की पर...

सचेतन :74 श्री शिव पुराण- शिव की भक्ति से दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश होता है।-2

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ भगवान शिव की भक्ति सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है तथा समस्त मनोवांछित फलों को देने वाली है। यह दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश करने वाली है। जब तक मनुष्य भगवान शिव का पूजन नहीं करता और उनकी शरण में नहीं जाता, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रु जनित पीड़ा, ये चारों प्रकार के पाप दुखी करते हैं।  आर्थिक चिन्तन में दरिद्रता चक्र (cycle of poverty) उस स्थिति को कहते हैं जिसमें एक बार गरीबी (दरिद्रता) की स्थिति आने के बाद वह सदा के लिये बनी रहे, यदि कोई बाहरी हस्तक्षेप न किया जाय। आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक के भेद से त्रिविध दुःख की निवृत्ति को ही यहां दुःखान्त कहा गया है । केवल ईश्वर के अनुग्रह से ही इसकी प्राप्ति होती है । ज्ञान अथवा वैराग्य से भी इसकी उपलब्धि असंभव है । यह दुःखान्त अनात्मक और सात्मक भेद से दो प्रकार का है ।  जो वास्तविक न हो:"वह काल्पनिक बातें सबको सुनाता रहता है, काल्पनिक, कल्पित, ख़याली, मनगढ़ंत, कपोल कल्पित, कपोलकल्पित, अवास्तविक, अयथार्थ, झूठा, हवाई, अप्रकृत, अयथातथ, अयाथार्थिक. जिस...

सचेतन :73 श्री शिव पुराण- शिव की भक्ति से दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश होता है।

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#RudraSamhita   https://sachetan.org/ ब्रह्माजी ने कहा ;- भगवान शिव की भक्ति सुखमय, निर्मल एवं सनातन रूप है तथा समस्त मनोवांछित फलों को देने वाली है। यह दरिद्रता, रोग, दुख तथा शत्रु द्वारा दी गई पीड़ा का नाश करने वाली है। जब तक मनुष्य भगवान शिव का पूजन नहीं करता और उनकी शरण में नहीं जाता, तब तक ही उसे दरिद्रता, दुख, रोग और शत्रु जनित पीड़ा, ये चारों प्रकार के पाप दुखी करते हैं।  आर्थिक चिन्तन में दरिद्रता चक्र (cycle of poverty) उस स्थिति को कहते हैं जिसमें एक बार गरीबी (दरिद्रता) की स्थिति आने के बाद वह सदा के लिये बनी रहे, यदि कोई बाहरी हस्तक्षेप न किया जाय।कोई व्यक्ति या कोई क्षेत्र जब कभी गरीबी से पीड़ित हो जाता है तो उसकी इस स्थिति के कारण उसे (दूसरों की तुलना में) कुछ हानियाँ झेलनी पड़तीं है; इन हानियों के कारण वे गरीबी की दशा से बाहर नहींं निकल पाते। गरीब देशों की इस स्थिति को विकास जाल (development trap) कहा जाता है। दरिद्रता चक्र एक प्रकार का दुष्चक्र है जिसमें धनात्मक फीडबैक काम करता है। उदाहरण के लिये, जो गरीब है उसके अशिक्षित रहने की अधिक सम्भावना है; फिर जो अशिक्ष...