संदेश

यात्रा लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सचेतन- 08: सत्-चित्-आनन्द – मनुष्य जीवन की अनमोल यात्रा

चित्र
 नमस्कार साथियो, आप सुन रहे हैं सचेतन , जहाँ हम बात करते हैं आत्मिक जागरण की, और उस सत्य की जो हमारे भीतर ही छुपा है। आज का विषय है — “सत्-चित्-आनन्द” — यह कोई शब्द नहीं, बल्कि मनुष्य जीवन की तीन दिव्य सीढ़ियाँ हैं जो हमें अज्ञान से ज्ञान की ओर , अस्थिरता से स्थिरता की ओर , और दुख से आनंद की ओर ले जाती हैं। 1. सत् — सत्य और कर्म की शुद्धि सत् अवस्था – मन की अमरता की खोज मन हमेशा कुछ ऐसा चाहता है जिसे समय मिटा न सके , जिसे काल छीन न पाए , जो नाशवान न हो । यह उसकी अमरता की अनंत तलाश है। वह सतत उस सत्य की खोज में रहता है जो शाश्वत है, अविनाशी है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र से परे है। जब मन को सत्य का साक्षात्कार होता है, जब वह आत्मा के समीप पहुँचता है, तब धीरे-धीरे मृत्यु का भय लुप्त होने लगता है । यही वह क्षण होता है जब मन अपनी "सत् अवस्था" में प्रवेश करता है — जहाँ उसे वह मिल जाता है जिसे काल या परिस्थिति बदल नहीं सकते । यह अवस्था, न केवल शांति देती है, बल्कि असली अस्तित्व का बोध भी कराती है। “सत्” का अर्थ है — जो सदा है, जो बदलता नहीं । यह शुद्धत...

सचेतन 2.110 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी का लंका में प्रवेश

चित्र
हनुमान जी की लंका यात्रा का वृत्तांत सूर्यदेव के अस्ताचल में जाने के बाद हनुमान जी ने लंका में प्रवेश किया। लंका में प्रवेश करते ही काली कान्तिवाली एक स्त्री अट्टहास करती हुई उनके सामने खड़ी हो गई। उसके सिर के बाल प्रज्वलित अग्नि के समान दिखते थे। वह हनुमान जी को मार डालना चाहती थी। (बाएँ हाथ से प्रहार करके) वीर! मैं साक्षात् लङ्कापुरी हूँ। तुमने अपने पराक्रम से मुझे जीत लिया है, इसलिए तुम समस्त राक्षसों पर पूर्णतः विजय प्राप्त कर लोगे। अब सीता जी की खोज हनुमान जी ने पूरी रात लंका में घर-घर घूमकर सीता जी की खोज की। रावण के महल में प्रवेश करने पर भी उन्हें सीता जी का दर्शन नहीं हुआ। शोक में डूबे हनुमान जी ने एक उत्तम गृहोद्यान देखा। वहाँ उन्हें एक अशोक-वृक्ष के पास सीता जी का दर्शन हुआ। श्रीरामपत्नी सीता जी उपवास करने के कारण अत्यन्त दुर्बल हो चुकी थीं। उनके केश धूल से धूसर हो गए थे। वे राक्षसियों से घिरी हुई थीं, जो उन्हें बारम्बार धमका रही थीं। हनुमान जी ने उन्हें अशोक-वृक्ष के नीचे बैठा देखा और वहीं से निहारने लगे। इतने में रावण के महल से करधनी और नूपुरों की झनकार के साथ एक गम्भीर को...

सचेतन 2.108 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - पवनपुत्र हनुमान जी की अद्भुत यात्रा

चित्र
हनुमान की अद्वितीय उड़ान नमस्ते और स्वागत है  सचेतन के इस विचार के सत्र में। आज की कहानी में हम सुनेंगे पवनपुत्र हनुमान जी की अद्भुत यात्रा, जब उन्होंने लंका पूरी से समुद्र को लांघकर अपने मित्रों से मिलने का साहसिक कार्य किया। हनुमान जी, पंखधारी पर्वत के समान वेगशाली, बिना थके और बिना रुके उस सुंदर आकाश को पार करने लगे, जो नाग, यक्ष, और गंधर्वों से भरा हुआ था। आकाशरूपी समुद्र में चंद्रमा कुमुद के समान और सूर्य जलकुक्कुट के समान थे। हनुमान जी आकाश में उड़ते हुए, चंद्रमंडल को नखों से खरोंचते हुए, नक्षत्रों और सूर्य मंडल सहित आकाश को समेटते हुए और बादलों के समूह को खींचते हुए-से अपार महासागर को पार करने लगे। सफेद, लाल, नीले, मंजीठ के रंग के, हरे और अरुण वर्ण के बड़े-बड़े मेघ आकाश में शोभा पा रहे थे। हनुमान जी उन मेघ-समूहों में प्रवेश करते और बाहर निकलते थे, जिससे वे कभी दिखते और कभी अदृश्य हो जाते थे। इस प्रकार, वे आकाश में बादलों की आड़ में छिपते और प्रकाशित होते चंद्रमा के समान प्रतीत हो रहे थे। महातेजस्वी हनुमान जी अपने महान सिंहनाद से मेघों की गंभीर गर्जना को भी मात करते हुए आगे ब...