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सचेतन- 47 –आत्मबोध; “जब सब कुछ मैं ही हूँ…”

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  क्या कभी आपने सोचा है — अगर सच में सब एक ही हैं, तो हमें अलग-अलग क्यों दिखते हैं? यह मैं… यह तुम… यह मेरा… यह दुनिया… हम हर जगह अलग-अलग चेहरों को देखते हैं। लेकिन आत्मबोध का आज का विचार कहता है की — जिसे सच्चा ज्ञान हो जाता है, वह पूरी दुनिया को अपने ही आत्मस्वरूप में देखता है। क्या यह संभव है? आइए आज इसे सरल भाषा में समझते हैं। श्लोक कहता है — जो योगी सही ज्ञान से जाग चुका है, वह ज्ञान की दृष्टि से पूरे जगत को अपने ही आत्मा में स्थित देखता है। और सबको अपने ही स्वरूप के रूप में देखता है। दृष्टि बदलती है, दुनिया नहीं ध्यान दीजिए — दुनिया नहीं बदलती। दृष्टि बदलती है। जैसे समुद्र में लहरें उठती हैं। अगर लहर खुद को सिर्फ “लहर” माने, तो वह कहेगी — मैं छोटी हूँ, मैं बड़ी हूँ, मैं टूट रही हूँ। लेकिन अगर लहर समझ जाए — मैं पानी हूँ… तो क्या बदल गया? लहर अभी भी है। लेकिन डर चला गया। मैं शरीर हूँ या चेतना? हम अभी क्या मानते हैं? मैं शरीर हूँ। मैं मन हूँ। मैं विचार हूँ। इसलिए तुलना होती है। ईर्ष्या होती है। डर होता है। लेकिन जब ज्ञान आता है — तो समझ आता है — मैं शरीर ...