सचेतन- 22:तैत्तिरीय उपनिषद्: विज्ञानमय कोश
मान लीजिए कोई बच्चा पूछे — “बुद्धि क्या होती है?” यदि हम कहें “निर्णय करने की शक्ति”, तो वह अमूर्त लगेगा। लेकिन यदि हम इसे “एक राजा” के रूपक में समझाएँ — जैसे राजा अपनी प्रजा को नियंत्रित करता है, वैसे ही बुद्धि हमारे मन, प्राण और शरीर को नियंत्रित करती है — तो बच्चा तुरंत समझ जाएगा। यही है पुरुष-रूपक – दार्शनिक सत्यों को “व्यक्ति-आकृति” का रूप देकर समझाना। पुरुष-रूपक उपनिषद् की एक शैली है जिसमें प्रत्येक कोश को पुरुष (मानव-आकृति) मानकर उसके सिर, अंग और हृदय बताए जाते हैं, ताकि अमूर्त सत्य को मूर्त और समझने योग्य रूप दिया जा सके। जैसे पहले कहा गया – अन्नमय कोश (शरीर) = एक आवरण है। प्राणमय कोश = शरीर में प्राण का आवरण। मनोमय कोश = विचार और भावना का आवरण। फिर आता है विज्ञानमय कोश – उपनिषद कहता है: यह धर्म-धारण करने वाली बुद्धि है। इसे कर्तृत्व का केंद्र कहा गया। यह “पुरुष” (आत्मा का प्रतीक) की तरह सबको धारण करता है। उदाहरण रूप में: जैसे राजा अपनी प्रजा को नियम और व्यवस्था से नियंत्रित करता है, वैसे ही विज्ञानमय कोश (विवेक-बुद्धि) शरीर, प्राण और मन – सबको दिशा देता है। यह “कर्त्...