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सचेतन 2.67: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी ने सीता जी से पहली बार मिलने पर सार्थक भाषा का प्रयोग किया

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सांत्वना यानी ढारस और आश्वासन के लिए उचित भाषा का चयन करना चाहिए  पराक्रमी हनुमान जी ने भी सीताजी का विलाप, त्रिजटा की स्वप्न चर्चा तथा राक्षसियों की डाँट-डपट— ये सब प्रसंग ठीक-ठीक सुन लिये और उन्होंने सोचा की यदि मैं इन्हें सान्त्वना दिये बिना ही लौट जाऊँ और श्री रामचन्द्रजी के कार्य की सिद्धि के लिये अपने स्वामी वानर राज सुग्रीव को उत्तेजित करूँ तो वानर सेना के साथ उनका यहाँ तक आना व्यर्थ हो जायगा (क्योंकि सीता इसके पहले ही अपने प्राण त्याग देंगी)। अच्छा तो राक्षसियों के रहते हुए ही अवसर पाकर आज मैं यहीं बैठे-बैठे इन्हें धीरे-धीरे सांत्वना यानी शांति देने का काम, ढारस और आश्वासन। दूंगा; क्योंकि इनके मन में बड़ा संताप है।  मानव जीवन में संताप कोई ऐसा बहुत बड़ा कष्ट या दुःख है जिससे मन जलता हुआ सा जान पड़े। बहुत तीव्र मानसिक क्लेश या पीड़ा लगता हो। दुश्मन का भय सताता हो। और प्रायः जब आप कोई पाप आदि करते है तो मन में होने वाला अनुताप भी संताप बन जाता है।  हनुमान जी ने विचार किया की एक तो मेरा शरीर अत्यन्त सूक्ष्म है, दूसरे मैं वानर हूँ। विशेषतः वानर होकर भी मैं यहाँ मानवोच...