सचेतन- 44 –आत्मबोध “जिसे खोज रहे हो, वह पहले से तुम्हारे पास है”
सचेतन- 44 –आत्मबोध “जिसे खोज रहे हो, वह पहले से तुम्हारे पास है” क्या आपने कभी चश्मा सिर पर रखकर पूरे घर में उसे ढूँढा है? या गले में पड़ी चेन को खोजते-खोजते घबरा गए हैं? भागते रहे… घबराते रहे… और अचानक किसी ने कहा — “अरे, यह तो तुम्हारे पास ही है!” आज आत्मबोध का विचार भी यही कहता है — आत्मा कभी खोई ही नहीं थी। बस भूल गए थे। इसका सरल अर्थ है: आत्मा तो हमेशा से प्राप्त है। लेकिन अज्ञान के कारण वह अप्राप्त जैसी लगती है। जब अज्ञान मिटता है, तो आत्मा ऐसे लगती है जैसे अभी मिली हो — जैसे गले की चेन मिल जाए। ध्यान दीजिए — चेन मिली नहीं… वह पहले से थी। बस भ्रम गया। हम क्या खोज रहे हैं? हर इंसान क्या चाहता है? शांति। सुरक्षा। प्रेम। संतोष। पूर्णता। हम सोचते हैं — जब यह मिलेगा, तब खुश होऊँगा। जब वह मिलेगा, तब पूर्ण हो जाऊँगा। लेकिन शंकराचार्य कह रहे हैं — तुम जिस आनंद को खोज रहे हो, वह तुम्हारा स्वभाव है। समस्या कहाँ है? समस्या यह नहीं कि आत्मा दूर है। समस्या यह है कि हम भूल गए हैं। हमने अपनी पहचान बदल ली है। “मैं शरीर हूँ।” “मैं दुखी हूँ।” “मैं अधूरा हूँ।” यही अज्ञान ...