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सचेतन- 03: आत्मबोध की यात्रा - “कर्म नहीं, ज्ञान ही अज्ञान को मिटाता है”

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“हम जीवन भर कुछ न कुछ करते रहते हैं… काम, पूजा, जप, ध्यान, सेवा… लेकिन एक सवाल है— क्या केवल करने से अज्ञान मिट जाता है? शंकराचार्य इस श्लोक में इसका बहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत्॥ सरल अर्थ “कर्म— यानी कोई भी क्रिया, अज्ञान को नहीं मिटा सकती, क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं है। लेकिन ज्ञान अज्ञान को वैसे ही नष्ट कर देता है जैसे प्रकाश गहरे अंधकार को मिटा देता है ।” कर्म और मोक्ष का प्रश्न “दोस्तों, यहाँ एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही जा रही है। हम सोचते हैं— अगर मैं ज़्यादा पूजा करूँ, ज़्यादा ध्यान करूँ, ज़्यादा साधना करूँ, तो शायद मोक्ष मिल जाएगा। लेकिन शंकराचार्य कहते हैं— कर्म चाहे जितना भी हो, वह अज्ञान को नहीं मिटा सकता। क्योंकि अज्ञान कोई वस्तु नहीं है, जिसे काम करके हटाया जाए। अज्ञान है— गलत समझ।” शंकराचार्य कर्म को क्या कहते हैं? “शंकराचार्य यहाँ एक बात साफ़ करते हैं— ज्ञान के अलावा जितनी भी साधनाएँ हैं— सबको वे कर्म कहते हैं। ✔️ कर्मयोग ✔️ उपासना ✔️ ध्यान ✔️ अष्टांग योग ✔...

सचेतन- 05: सत् — सत्य और कर्म की शुद्धि

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बहुत सुंदर और सारगर्भित बात है — “क्यों है मनुष्य जन्म कीमती?” इसका उत्तर वेदांत बहुत गहराई से देता है, क्यों है मनुष्य जन्म अनमोल? इस सृष्टि में लाखों योनियाँ हैं — पर केवल मनुष्य ही वह प्राणी है जिसमें सत्-चित्-आनन्द का विकास संभव है। सत् — सत्य और कर्म की शुद्धि “सत्” का अर्थ है — जो सदा है , जो बदलता नहीं , जो शुद्ध, शाश्वत और सत्य है। संसार में सब कुछ बदलता है — शरीर, भावनाएँ, रिश्ते, हालात... लेकिन “ सत् ” — वह चिरंतन सत्य — नहीं बदलता। मनुष्य में “सत्” कैसे प्रकट होता है? केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो यह जान सकता है कि: मेरा कर्म सही है या गलत? मैं जो कर रहा हूँ, उसमें कोई स्वार्थ तो नहीं? क्या मैं सत्य के साथ खड़ा हूँ? यानी मनुष्य ही अपने कर्मों की शुद्धि कर सकता है। और जब कर्म स्वार्थरहित , सत्यनिष्ठ , और सेवा भाव से प्रेरित होते हैं, तो वही सत् का प्रकाश बनते हैं। कहते हैं: “सत्यमेव जयते” — केवल सत्य की ही विजय होती है। जब हम सच्चाई से जुड़ते हैं , तो हमारे कर्म भी धर्ममय हो जाते हैं। तब जीवन भटकता नहीं, संवरता है। “सत्” का अर्थ केवल दर्शन नहीं, बल्कि एक जीन...