सचेतन- 36 –आत्मबोध – “मैं कौन हूँ?” हम जीवन भर एक ही प्रश्न से जूझते रहते हैं— “मैं कौन हूँ?” कभी हम स्वयं को शरीर मान लेते हैं, कभी मन, कभी रिश्ते, कभी सफलता या असफलता। लेकिन आत्मबोध का यह अंतिम श्लोक हमें सीधा, स्पष्ट और निर्भय उत्तर देता है— “तुम वही हो, जिसे तुम खोज रहे थे।” शंकराचार्य कहते हैं— मैं नित्य शुद्ध हूँ, सदा मुक्त हूँ, एक हूँ, अखंड आनंद स्वरूप हूँ, अद्वैत हूँ, मैं ही वह सत्य–ज्ञान–अनंत ब्रह्म हूँ। अब इसे बहुत सरल भाषा में समझते हैं। नित्य, शुद्ध और मुक्त सबसे पहले तीन शब्द— नित्य – जो कभी बदलता नहीं शुद्ध – जिस पर कोई दाग नहीं लगता मुक्त – जो कभी बंधा ही नहीं हम अक्सर कहते हैं— “मैं बंधन में हूँ”, “मैं परेशान हूँ”, “मुझे मुक्ति चाहिए।” आत्मबोध कहता है— 👉 मुक्ति कोई भविष्य की घटना नहीं है। 👉 मुक्ति तुम्हारा स्वभाव है। जैसे आकाश को कभी साफ़ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती, वैसे ही आपको मुक्त होने की ज़रूरत नहीं— आप पहले से मुक्त हैं। अखंड आनंद – स्थायी सुख हम जिस सुख को जानते हैं, वह आता है और चला जाता है— हँसी, मज़ा, उत्साह, सफलता। इसे आत...
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