सचेतन 3.33 : नाद योग: तुरीय अवस्था: शुद्ध चेतना की अंतिम अवस्था
नमस्कार दोस्तों! स्वागत है आपका हमारे इस खास सचेतन के विचार सत्र में। और आज हम चर्चा करेंगे एक अत्यंत गहन और आध्यात्मिक विषय पर, जिसे "तुरीय अवस्था" कहा जाता है। यह वह अवस्था है जहाँ आत्मा शुद्ध चेतना में प्रवेश करती है और परमात्मा के साथ एकत्व का अनुभव करती है। तो आइए, जानते हैं कि तुरीय अवस्था क्या है और इसका हमारे जीवन में क्या महत्व है। तुरीय अवस्था का अर्थ "तुरीय" शब्द संस्कृत से आया है, जिसका अर्थ है "चौथा"। तुरीय अवस्था वह चौथी अवस्था है, जो जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति अवस्थाओं से परे है। यह शुद्ध चेतना की वह अवस्था है, जहाँ आत्मा अपने सभी बंधनों से मुक्त हो जाती है और परमात्मा के साथ एकत्व का अनुभव करती है। यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति अद्वैत (द्वैत से परे) के अनुभव में होता है, यानी वह अपने और ब्रह्मांड के बीच किसी भी विभाजन का अनुभव नहीं करता। चार अवस्थाएँ आत्मा के अनुभव को चार प्रमुख अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है: जाग्रत अवस्था (वैश्वानर): यह वह अवस्था है जिसमें हम जागते हैं और भौतिक संसार के अनुभवों को प्राप्त करते हैं। यह अवस्था हमारे इ...