सचेतन – 01 विवेकचूडामणि- “जिसे हम खोज नहीं सकते… वही सबसे सच्चा है”
क्या कभी आपने सोचा है… जिसे आप पूरे जीवन ढूंढ रहे हैं— शांति, सुख, संतोष… अगर वह किसी जगह पर नहीं है… किसी इंसान में नहीं है… किसी चीज़ में नहीं है… तो फिर वह है कहाँ? आज का विचार बहुत गहरा है… लेकिन मैं इसे बिल्कुल आसान भाषा में समझाऊँगा। शुरुआत ही क्यों महत्वपूर्ण है? हर अच्छी यात्रा की शुरुआत कैसे होती है? नम्रता से। विवेक-चूडामणि की शुरुआत भी यही सिखाती है— पहले सिर झुकाओ… पहले स्वीकार करो कि “मुझे अभी सब नहीं पता…” और फिर वह कहता है— मैं उस गुरु को प्रणाम करता हूँ… जो परमानंद स्वरूप है… जो हर जगह है… लेकिन फिर भी पकड़ में नहीं आता। “जो दिखता नहीं… वही सच्चा है” यहाँ एक बहुत अजीब बात कही गई है— जो हर जगह है… वही हमारी आँखों से नहीं दिखता। क्यों? क्योंकि हम उसे गलत जगह ढूंढ रहे हैं। हम सोचते हैं— अगर कुछ है, तो दिखना चाहिए छूना चाहिए महसूस होना चाहिए लेकिन सोचिए… क्या आप अपने “मन” को देख सकते हैं? क्या आप “सोच” को पकड़ सकते हैं? नहीं। फिर भी वह है। उसी तरह… जो असली सत्य है… वह दिखाई नहीं देता… लेकिन वही सबसे वास्तविक है। हमारी सबसे बड़ी गलती हम क्या करते हैं? ...