सचेतन- 46 –आत्मबोध; “मैं” और “मेरा” का भ्रम कब टूटेगा?”
क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है — कोई आपकी बुराई करे तो दिल टूट जाता है… कोई आपकी तारीफ करे तो मन फूल जाता है? क्यों? क्योंकि हम हर चीज़ को “मैं” और “मेरा” से जोड़ लेते हैं। मेरा सम्मान। मेरी सफलता। मेरा परिवार। मेरा विचार। और जब “मेरा” हिलता है… तो भीतर भूचाल आ जाता है। आज आत्मबोध के विचार में हम बाट करते हैं - यह “मैं” और “मेरा” ही असली अज्ञान है। श्लोक कहता है — जब अपने असली स्वरूप का ज्ञान होता है, तो “मैं” और “मेरा” वाला अज्ञान तुरंत मिट जाता है। जैसे सही दिशा जान लेने से दिशा का भ्रम खत्म हो जाता है। असली बीमारी क्या है? हम सोचते हैं कि दुख की वजह है — पैसा नहीं है। लोग अच्छे नहीं हैं। परिस्थितियाँ खराब हैं। लेकिन शास्त्र कहता है — दुख की जड़ है “मैं” और “मेरा” की पकड़। जब “मैं शरीर हूँ” मान लिया, तो शरीर का दर्द “मेरा दर्द” बन गया। जब “मैं पद हूँ” मान लिया, तो पद का गिरना “मेरी हार” बन गया। यही अज्ञान है। दिशा का भ्रम मान लीजिए आप रास्ता भूल गए। आपको पूर्व दिशा चाहिए, पर आप पश्चिम की तरफ चल रहे हैं। जब कोई सही दिशा बता देता है — क्या आपको अंधेरा हटाना पड़ता...