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सचेतन: ज्ञान योग-6: माया की भूमिका

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माया एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है 'जो नहीं है' या 'भ्रम'। अद्वैत वेदांत के अनुसार, ब्रह्म ही सत्य है, जो कि एक अनंत, अव्यक्त, और निराकार सत्ता है। माया उस पर्दे की तरह है जो ब्रह्म और जीवात्मा के बीच में होती है, जिससे जीवात्मा खुद को ब्रह्म से अलग और भिन्न समझती है। माया और अविद्या का संबंध माया वह शक्ति है जो अविद्या को जन्म देती है। अविद्या यहाँ ज्ञान की अनुपस्थिति को दर्शाती है, जो आत्मा को यह भ्रम देती है कि वह शारीरिक और मानसिक विशेषताओं वाला एक व्यक्ति है। इस भ्रांति के कारण ही जीव जन्म, मृत्यु, और पुनर्जन्म के चक्र में फंसा रहता है। अविद्या की अवधारणा अविद्या, जो संस्कृत में "अज्ञान" या "ज्ञान की अनुपस्थिति" का प्रतीक है, भारतीय दर्शन, विशेषकर वेदांत और सांख्य दर्शन में एक महत्वपूर्ण संकल्पना है। अविद्या को वास्तविकता की सच्ची प्रकृति को न समझ पाने की स्थिति के रूप में देखा जाता है, जिससे व्यक्ति सांसारिक मोह और दुखों का अनुभव करता है। अविद्या का मुख्य विचार यह है कि यह मानवीय समझ की सीमाओं को दर्शाता है और यह बताता है कि कैसे वास्तव...

सचेतन, पंचतंत्र की कथा-16 : "राजकुमारी, बुनकर और झूठी माया की कहानी"

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नमस्कार दोस्तों! स्वागत है सचेतन के इस विचार के सत्र में, जहां हम आपको सुनाते हैं अनोखी और दिलचस्प कहानियाँ। आज हम बात करेंगे एक ऐसी कहानी की, जिसमें चालाकी, प्रेम, और छल की माया ने एक पूरे राज्य को भ्रमित कर दिया। यह कहानी है एक राजकुमारी, एक बुनकर और उसके विष्णु-रूप धारण करने की। कहानी की शुरुआत: राजा की चिंता और रानी का संदेह राजा के महल में हलचल मच गई थी। राजकुमारी के महल में कंचुकियों ने उसकी हालत देखी और राजा से शिकायत की। राजा ने अपनी रानी से कहा, "देवी, कंचुकियों की बात पर ध्यान दो। यह देखो कि कौन ऐसा व्यक्ति है जो राजकुमारी के पास आता है। उसके लिए काल भी क्रोधित है।" रानी ने जल्दी से राजकुमारी के महल में जाकर उसकी हालत देखी। उसके होंठ कटे हुए थे और अंगों पर नाखून के निशान थे। रानी ने अपनी बेटी से गुस्से में पूछा, "कुल-कलंकिनी! किसने तुम्हारी चाल को बर्बाद कर दिया? क्या तू जानती है कि यह कितना बड़ा अपराध है?" शर्म से झुकी हुई राजकुमारी ने आखिरकार सच बता दिया - उसके पास आधी रात को भगवान विष्णु का रूप धारण करके कोई आता है। रानी ने यह सुनते ही बड़ी खुशी से जाकर...

सचेतन 3.19 : आध्यात्मिक स्वतंत्रता: आत्मा की मुक्ति की यात्रा

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नमस्कार श्रोताओं, और स्वागत है इस हमारे विशेष सचेतन के इस विचार के सत्र  में.  आज हम एक गहरे और सार्थक विषय पर चर्चा करेंगे, जिसे हम "आध्यात्मिक स्वतंत्रता" कहते हैं। आध्यात्मिक स्वतंत्रता का अर्थ क्या है? यह कैसे प्राप्त होती है, और हमारे जीवन में इसका क्या महत्व है? आइए, इस विषय पर गहराई से विचार करें। आज़ादी, यह शब्द सुनते ही हमारे मन में गर्व, उत्साह और साहस की भावना जाग्रत होती है। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि आज़ादी का सही अर्थ क्या है? क्या यह केवल बाहरी स्वतंत्रता है, या इससे अधिक गहरा और व्यापक अर्थ है? आइए, इस विषय पर गहराई से चर्चा करें। आज़ादी का सबसे पहला और प्रत्यक्ष अर्थ है बाहरी स्वतंत्रता। यह वह अवस्था है जहाँ एक देश, समाज, या व्यक्ति पर किसी और का नियंत्रण नहीं होता। एक स्वतंत्र देश अपने निर्णय खुद लेने के लिए सक्षम होता है, और वहाँ के नागरिक स्वतंत्र रूप से अपनी राय व्यक्त कर सकते हैं, अपने धर्म का पालन कर सकते हैं, और अपने अधिकारों का आनंद ले सकते हैं। लेकिन आज़ादी का अर्थ केवल बाहरी स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है। आध्यात्मिक स्वतंत्रता का अर्थ: आध्यात्मिक ...