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मार्च, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सचेतन:बुद्धचरितम्-10 छन्दकनिवर्तनम् (The Return of Chandak):

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छन्दक (बुद्ध का सारथी) के रथ लौटाने और बुद्ध के अकेले तपस्या की ओर बढ़ने का वर्णन। कुछ मुहूर्त में भगवान भास्कर के उदित हो जाने पर वे नरश्रेष्ठ एक आश्रम जा पहुँचे थे। सिद्धार्थ गौतम ने अपने सामने एक पवित्र स्थान देखा। यह था भार्गव ऋषि का आश्रम, जहाँ चारों ओर शांति और आध्यात्मिकता का वातावरण था। उन्होंने अपने घोड़े, कन्टक, को स्नेहपूर्वक सहलाया और बोले, "प्रिय मित्र, तुमने आज मुझे मेरी नई यात्रा की ओर बढ़ने में सहायता की।" घोड़े की आँखों में भी एक अजीब सी चमक थी, मानो वह अपने स्वामी की भावनाओं को समझ रहा हो। इसके बाद सिद्धार्थ ने अपने प्रिय सेवक छन्दक की ओर स्नेहभरी दृष्टि डाली और कहा, "हे प्रिय छन्दक! तुमने मेरे प्रति जो निःस्वार्थ प्रेम और समर्पण दिखाया है, उससे मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। लेकिन अब समय आ गया है कि तुम इस अश्व को लेकर वापस लौट जाओ। राजा और परिवार को मेरी ओर से प्रणाम कहना।" यह कहकर उन्होंने अपने सारे आभूषण उतार दिए और छन्दक को सौंप दिए। फिर उन्होंने अपने मुकुट से एक तेजस्वी मणि निकालकर छन्दक के हाथ में रखी और बोले, "हे छन्दक! इस मणि को लेकर राजा...

सचेतन:बुद्धचरितम्-9 अभिनिष्क्रमण-3 (The Great Renunciation)

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मुक्ति की राह पर पहला कदम राजकुमार सिद्धार्थ ने दृढ़ निश्चय के साथ घोड़े की पीठ पर चढ़ते हुए सिंहनाद किया, "जब तक मैं जन्म और मृत्यु के चक्र का अंत नहीं देख लूँगा, तब तक मैं इस कपिलवस्तु नगर में वापस नहीं लौटूँगा!" उनकी इस प्रतिज्ञा को सुनकर देवता भी प्रसन्न हो उठे। स्वर्ग से देवताओं ने आकर उनकी राह को रोशन करने का निश्चय किया। कुछ देवताओं ने अग्निरूप धारण कर मार्ग में प्रकाश फैलाया, ताकि अंधकार उनकी यात्रा में बाधा न बने। रात की यात्रा, नई सुबह की ओर कन्थक अश्व पूरी शक्ति से दौड़ पड़ा। ऐसा लग रहा था जैसे वह हवा से बातें कर रहा हो। राजकुमार की धुन इतनी प्रबल थी कि एक ही रात में उन्होंने अनेकों योजन (यानी कई सौ किलोमीटर) की दूरी तय कर ली। वे तेजी से अज्ञात की ओर बढ़ रहे थे—मोह, बंधन और सांसारिक सुखों को त्यागकर एक नयी रोशनी, एक नये सत्य की खोज में। यह वही क्षण था जब राजकुमार सिद्धार्थ ने अपने भव्य जीवन, राजमहल की ऐश्वर्यता और सुख-सुविधाओं को छोड़कर आत्मज्ञान की राह पकड़ ली। आगे चलकर यही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध के रूप में प्रसिद्ध हुए और संसार को ज्ञान और करुणा का मार्ग दिखाया। य...

सचेतन:बुद्धचरितम्-8 अभिनिष्क्रमण-2 (The Great Renunciation)

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https://sachetan.org/renunciation/ एक समय की बात है, जब राजकुमार सिद्धार्थ के हृदय में वैराग्य का बीज अंकुरित हो चुका था। उनकी यह भावना इतनी प्रबल हो उठी कि वे अपने पिता और राजा की आज्ञा लेकर एक बार फिर वन की ओर चल पड़े। उनके मन में वन की सुंदरता और प्रकृति के अद्भुत गुणों को निहारने की तीव्र इच्छा थी। वे दूर-दूर तक फैले हरे-भरे वन में गहराई तक गए। वहाँ पहुँचकर, राजकुमार सिद्धार्थ ने देखा कि किसान हल चलाकर जमीन जोत रहे थे। हल चलते ही जमीन के तृण और कुशायें उखड़ गई थीं, और उसमें रहने वाले छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े मरकर बिखर गए थे। इस दृश्य को देखकर राजकुमार सिद्धार्थ का हृदय द्रवित हो उठा। उन्हें अपने परिजनों की याद आ गई, और उन्होंने महसूस किया मानो उनका स्वजन का बध हो गया हो। इस दुखदायी दृश्य से उनके मन में विश्व के जन्म और मृत्यु के चक्र पर गहन चिंतन शुरू हो गया। उन्होंने सोचा कि यह जीवन कितना नश्वर है और हर प्राणी कितना असहाय है। इसी चिंतन में डूबे हुए राजकुमार सिद्धार्थ ने उस हरित तृण युक्त सुंदर और पवित्र भूमि पर ध्यान लगाना शुरू किया। वे विश्व के इस जन्म-मृत्यु के रहस्य को समझने के ल...

सचेतन:बुद्धचरितम्-7 अभिनिष्क्रमण (The Great Renunciation):

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"बुद्धचरितम्" के सर्गों का वर्णन गौतम बुद्ध के जीवन की विभिन्न अवस्थाओं और घटनाओं को सुंदर काव्यात्मक भाषा में प्रस्तुत करता है। बुद्धचरित 28 सर्गों में था जिसमें 14 सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। हमने अबतक भगवत्प्रसूति (The Divine Birth) : इस सर्ग में बुद्ध के दिव्य जन्म का वर्णन सुना, जिसमें उनकी माता माया का उन्हें लुम्बिनी वन में जन्म देना शामिल है।, अन्तःपुरविहार (Life in the Palace) : इसमें बुद्ध के राजमहल में बिताए गए युवावस्था के दिनों का वर्णन सुना, जहाँ उनकी जीवनशैली और विलासिता का चित्रण होता है। संवेगोत्पत्तिः (The Genesis of Disenchantment) : बुद्ध के मन में वैराग्य की उत्पत्ति का वर्णन सुना, जब उन्होंने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का सामना किया। और  स्त्रीविघातन (Renunciation of Women) : यह सर्ग बुद्ध की महल की स्त्रियों और उनके प्रति उनकी अनासक्ति का वर्णन सुना। आज हम  अभिनिष्क्रमण (The Great Renunciation) : बुद्ध के महल छोड़ने और संन्यासी जीवन को अपनाने का वर्णन सुनेगे एक बार राजकुमार सिद्धार्थ के मन में वैराग्य का भाव इतना प्रबल ह...

सचेतन:बुद्धचरितम्-6 स्त्रीविघातन

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स्त्रीविघातन (Renunciation of Women) : यह सर्ग बुद्ध की महल की स्त्रियों और उनके प्रति उनकी अनासक्ति का वर्णन करता है।अभिनिष्क्रमण (The Great Renunciation): बुद्ध के महल छोड़ने और संन्यासी जीवन को अपनाने का वर्णन। Renunciation रिˌनन्‌सिˈएश्‌न्‌ यानी किसी वस्‍तु या विश्‍वास को औपचारिक रूप से त्‍याग देना; परित्‍याग बुद्ध के जीवन की एक रोचक घटना यह है जब वे अभी राजकुमार सिद्धार्थ थे और उनका सामना नगर की स्त्रियों से हुआ था। यह घटना उनके वैराग्य की ओर बढ़ने के महत्वपूर्ण कदमों में से एक थी। एक दिन, नगर की कुछ स्त्रियाँ नगर उद्यान से बाहर निकलकर राजपुत्र सिद्धार्थ के पास आईं। उनके हाथों में कमल के फूल थे, जिन्हें उन्होंने उसके स्वागत के लिए लाया था। इन स्त्रियों का उद्देश्य युवा राजकुमार को उनकी ओर आकर्षित करना था। हालाँकि, जब उन्होंने राजपुत्र को देखा, तो उनकी खूबसूरती और तेज से इतनी अभिभूत हो गईं कि कुछ क्षण के लिए वो बोल नहीं पाईं, सिर्फ उसे निहारती रहीं। तभी पुरोहित का पुत्र उदायी ने उन्हें संबोधित किया और कहा, "आप सभी अपनी कला में निपुण हैं, भावों को समझने में पारंगत हैं और आपके प...

सचेतन:बुद्धचरितम्-5 "संवेगोत्पत्तिः

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संवेगोत्पत्तिः (मोहभंग) (The Genesis of Disenchantment) : बुद्ध के मन में वैराग्य की उत्पत्ति का वर्णन है, जब उन्होंने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का सामना किया।"मोहभंग" का अर्थ है भ्रांति का दूर होना, अज्ञान का नाश होना या निराशा की भावना। यह तब होता है जब किसी की उम्मीदें पूरी नहीं होती हैं या जब कोई सच्चाई से अवगत होता है। मोह, बुद्धि का अज्ञान होता है और इसी अज्ञान के कारण मनुष्य भौतिक आकर्षण में फंस जाता है, जब मनुष्य सत् और असत् तथा नित्य एवं अनित्य का भेद जान जाता है तब वो निराशक्त हो जाता है, उसे किसी भी चीज का आकर्षण नही रह जाता। कहानी बुद्ध के वैराग्य की उत्पत्ति की: एक समय की बात है, जब राजकुमार सिद्धार्थ अपने महल में सुख-सुविधा से घिरे हुए थे, पर उनका मन कहीं न कहीं असंतुष्ट था। उन्होंने सुना कि वन की सुंदरता बड़ी मनमोहक होती है—कोमल घास, वृक्षों पर कोयल की कूक और कमलों से सजे तालाब। ये सभी विवरण सुनकर उनके मन में वन जाने की तीव्र इच्छा जाग उठी। राजा, अपने पुत्र की इच्छा जानकर, वनविहार की आज्ञा दे दी। परंतु उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि राजकुमार को रास्ते में को...

सचेतन:बुद्धचरितम्-4 "अन्तःपुरविहार"

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शाक्यराज के राज्य में एक बालक का जन्म हुआ जिसे देखकर सभी लोगों के मन में बड़ी खुशी और उमंग भर गई। बालक के जन्म के साथ ही राज्य में संपत्ति और समृद्धि अपने आप बढ़ने लगी, जैसे बरसात के पानी से नदी का जलस्तर बढ़ जाता है। धन-धान्य, हाथी, घोड़े सब कुछ बढ़ने लगे और राज्य चोर और शत्रुओं से मुक्त हो गया। राजा ने बालक का नाम 'सिद्धार्थ' रखा। सिद्धार्थ शब्द का अर्थ है, 'जिसने अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो' या 'जिसे (अस्तित्व का) अर्थ मिल गया हो'. यह शब्द संस्कृत के दो शब्दों 'सिद्ध' और 'अर्थ' से मिलकर बना है. 'सिद्ध' का अर्थ है 'पूर्ण' और 'अर्थ' का अर्थ है 'अर्थ या संपत्ति'। यह नाम उसे इसलिए दिया गया क्योंकि उसके जन्म से राज्य में सभी का कल्याण होने लगा था। उसकी माता, माया देवी, अपने पुत्र की महानता और प्रभाव को देखकर इतनी प्रसन्न हुईं कि उन्हें धरती पर रहने में कठिनाई होने लगी और वे स्वर्ग चली गईं। सिद्धार्थ की माता की मृत्यु उनके जन्म के कुछ ही समय बाद हो गई थी। इसके बाद, उनकी माता की बहन, जिसे मौसी कहते हैं, जिसका नाम मह...