सचेतन- 45 – आत्मबोध – “डर किससे था… जब था ही कुछ नहीं?”
रात का समय है। सड़क किनारे एक खंभा खड़ा है। दूर से आपको लगता है — कोई आदमी खड़ा है… शायद कोई खतरनाक व्यक्ति। दिल की धड़कन तेज। कदम रुक गए। मन डर से भर गया। फिर पास जाकर देखा — वह तो सिर्फ एक खंभा था। डर कहाँ गया? भागा नहीं… बस समझ आया। आज आत्मबोध का विचार इसी रहस्य को खोलता है। कहते हैं की — जैसे खंभे को आदमी समझने का भ्रम होता है, वैसे ही ब्रह्म को “जीव” समझ लिया गया है। जब जीव का असली स्वरूप देखा जाता है, तो यह झूठी व्यक्तिगत पहचान मिट जाती है। असली समस्या क्या है? हम खुद को क्या मानते हैं? मैं शरीर हूँ। मैं मन हूँ। मैं दुखी हूँ। मैं सीमित हूँ। मैं अकेला हूँ। यही “जीवभाव” है। लेकिन शास्त्र कहता है — तुम सीमित जीव नहीं… तुम ब्रह्म हो। भ्रम कैसे बनता है? अँधेरे में खंभा है। अज्ञान के कारण मन अपनी कल्पना जोड़ देता है। खंभा + अज्ञान = डर इसी तरह — ब्रह्म + अज्ञान = “मैं सीमित हूँ” असल में “सीमित जीव” नाम की कोई वस्तु अलग से नहीं है। वह केवल गलत पहचान है। समझते ही सब खत्म जब टॉर्च जलती है, क्या आपको डर भगाना पड़ता है? नहीं। बस सच्चाई दिखती है — और डर अपने आप चला ज...