सचेतन- 62 – आत्मबोध –“तुम बाहर भी हो… और भीतर भी — एक ही प्रकाश”
एक सवाल… जो कुछ आप देख रहे हैं… क्या वह सिर्फ बाहर है? और जो आप सोच रहे हैं… क्या वह सिर्फ अंदर है? या… अंदर और बाहर — दोनों में एक ही सत्य है? “क्या सच में बाहर और अंदर अलग हैं?” आज का आत्मबोध कहता है — जो भीतर है… वही बाहर है और जो बाहर है… वही भीतर है। श्लोक का सरल भावार्थ है की “ब्रह्म स्वयं अंदर और बाहर पूरे जगत में व्याप्त होकर सबको प्रकाशित करता है… जैसे अग्नि लोहे के गर्म गोले में भरकर उसे चमका देती है।” क्या अंदर और बाहर अलग हैं? हम हमेशा ऐसा सोचते हैं — बाहर दुनिया है अंदर मेरा मन है दो अलग चीज़ें लेकिन… श्लोक कहता है — जिससे मन भी जाना जाता है और दुनिया भी… वह एक ही है चेतना का खेल जब आप सोचते हैं… आपको अपने विचार पता चलते हैं जब आप देखते हैं… आपको दुनिया दिखती है अब ध्यान दें — दोनों को जानने वाली चीज़ एक ही है वह है — चेतना सोच भी वही… देखना भी वही…” कैसे काम करती है यह चेतना? सरल भाषा में समझिए — चेतना पहले आपके मन को प्रकाशित करती है फिर उसी मन के माध्यम से दुनिया को भी जानती है इसलिए — जो भीतर है और जो बाहर है दोनों उसी से प्रकाशित हैं लाल गरम ल...