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सचेतन- 12:तैत्तिरीय उपनिषद्: शिक्षा से ब्रह्मानंद तक — साधना की संपूर्ण ...

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सचेतन- 12:तैत्तिरीय उपनिषद्: शिक्षा से ब्रह्मानंद तक — साधना की संपूर्ण यात्रा ब्रह्मविद्या कि साधना पढ़ने या सुनने से नहीं , बल्कि तप, साधना और आत्मनिष्ठा से प्रकट होती है। ब्रह्मविद्या का अर्थ – "ब्रह्म" का ज्ञान। ब्रह्म = अनंत, सर्वव्यापक चेतना, जो सृष्टि के प्रत्येक कण में विद्यमान है।ब्रह्मविद्या वह विद्या है जो हमें यह समझाती है कि — हम केवल शरीर या मन नहीं हैं, बल्कि उस अनंत ब्रह्म के अंश हैं। यह परम ज्ञान है, जिससे जीवन का वास्तविक उद्देश्य समझ आता है और आत्मा की मुक्ति होती है।जैसे एक बूँद यह जान ले कि वह समुद्र से अलग नहीं, बल्कि उसी का अंश है — यही ब्रह्मविद्या का बोध है। जब चेतना शुद्ध हो जाती है, तब ब्रह्मविद्या का साक्षात्कार होता है।कह सकते हैं: चेतना = अनुभव करने की क्षमता और ब्रह्मविद्या = उस अनुभव का परम ज्ञान। इस क्षमता और ज्ञान के लिए साधना करनी पड़ती है।   तैत्तिरीय उपनिषद् – प्रथम शिक्षावल्ली के प्रारंभ का सार है, जिसमें शिक्षा शब्द के अर्थ और उसके छह मौलिक तत्त्वों की व्याख्या मिलती है।“सचेतन” का सीधा अर्थ है — जागरूक होकर जीना ।यह उपनिषद् की शिक्षा...

सचेतन 2.85 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी के द्वारा प्रमदावन (अशोकवाटिका) का विध्वंस

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शास्त्रों में शत्रु के शक्ति को जानने के लिए चार उपाय बताये हैं—साम, दान, भेद और दण्ड। स्वागत है आपका हमारे इस विशेष सचेतन के सत्र में, जहां हम आपको सुनाएंगे हनुमान जी के प्रमदावन विध्वंस की अद्भुत कथा। आइए, इस रोमांचक यात्रा पर चलें। बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।। अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता ।। हनुमान् जी ने बार-बार सीता जी के चरणो मे सिर नवाया और फिर हाथ जोड़कर कहा- हे माता ! अब मै कृतार्थ हो गया । आपका आशीर्वाद अमोघ ( अचूक ) है , यह बात प्रसिद्ध है ।। सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।। सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी ।। 4 ।। हे माता ! सुनो, सुंदर फल वाले वृक्षो को देखकर मुझे बड़ी ही भूख लग आई है । ( सीता जी ने कहा- ) हे बेटा ! सुनो, बड़े भारी योद्धा राक्षस इस वन की रखवाली करते है ।।  तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं ।। 5 ।। ( हनुमान् जी ने कहा – ) हे माता ! यदि आप मन मे सुख माने ( प्रसन्न होकर ) आज्ञा दे तो मुझे उसका भय तो बिलकुल नही है ।। देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।...