सचेतन- 52 – आत्मबोध – “दुनिया में रहकर भी, उससे अछूते कैसे रहें?”
एक गहरा सवाल क्या यह संभव है… कि हम इस दुनिया में रहें, सब कुछ करें, सब कुछ महसूस करें… और फिर भी भीतर से बिल्कुल अछूते रहें? न दुख हमें तोड़े… न सुख हमें बहा ले जाए… आज आत्मबोध का विचार यही रहस्य खोलता है। 🌿 श्लोक का सार “ज्ञानी, शरीर-मन के साथ रहते हुए भी उनके गुणों से अछूता रहता है, आकाश की तरह। वह सब जानकर भी साधारण सा रहता है, और बिना आसक्ति के हवा की तरह चलता है।” आकाश जैसा बनना श्लोक कहता है — व्योमवत् — आकाश जैसा। सोचिए… आकाश में क्या-क्या होता है? बादल आते हैं। बारिश होती है। आंधी आती है। धूप भी होती है। पर क्या आकाश गीला होता है? क्या आकाश जलता है? क्या आकाश टूटता है? नहीं। सब कुछ होता है, पर आकाश अछूता रहता है। हम क्यों उलझ जाते हैं? हमारे साथ क्या होता है? एक शब्द सुन लिया — मन दुखी। किसी ने तारीफ कर दी — मन उड़ने लगा। छोटी-सी बात — पूरे दिन खराब। क्यों? क्योंकि हमने खुद को शरीर और मन मान लिया। जब मन दुखी — तो “मैं दुखी।” जब शरीर बीमार — तो “मैं बीमार।” यही मोह है। ज्ञानी क्या करता है? ज्ञानी भी दर्द महसूस करता है। शरीर को चोट लगे — उसे भी दर्द ...