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सचेतन 144 : श्री शिव पुराण- ईश्वरीय गुण

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शिवरूप सनातन है  शिवजी कहते हैं ;-- मैं सृष्टि, पालन और संहार का कर्ता हूं। मेरा स्वरूप सगुण और निर्गुण है! मैं ही सच्चिदानंद निर्विकार परमब्रह्म और परमात्मा हूं।  ईश्वरीय गुण आने के बाद आप अपने कर्म व स्वभाव को जानना प्रारंभ कृति हैं जिससे आपका संबंध संसार के साथ और मज़बूत होता है।  ईश्वर के गुणों की चर्चा करें तो ईश्वर जड़ पदार्थ न होकर वह एक सच्चिदानन्दस्वरूप गुणों वाली सत्ता है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की सत्ता है, वह चेतन पदार्थ है तथा वह सदा सर्वदा सब दिन व काल में आनन्द में अवस्थित रहता है। उसे कदापि दुःख व अवसाद आदि नहीं होता जैसा कि जीवात्माओं व मनुष्यों को होता है।  चेतन का अर्थ है कि ज्ञानयुक्त वा संवेदनशील सत्ता।  सृष्टि के पालन और संहार का कर्ता का अर्थ सृष्टि की रचना, उसकी रक्षा और प्रलयरूप में भी अपने गुणों को नहीं छोड़ना से है जिसके कारण ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम धारण कर तीन रूपों में विभक्त  करके शिव की पहचान है।  मैं भक्तवत्सल हूं और भक्तों की प्रार्थना को सदैव पूरी करता हूं। मेरे इसी अंश से रुद्र की उत्पत्ति होगी। रुद्र दु:ख का नि...

सचेतन 143 : श्री शिव पुराण- ईश्वर का दर्शन संभव है।

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जीवन के आनंदमय यात्रा में सृष्टि का आभास  श्री शिव पुराण की कथा हमारे जीवन के विकास की अनंत संभावनाओं को बताता है।लेकिन इन संभावनाओं के होते हुए भी, हम जीवन में वो हासिल नहीं कर पाते जिसके हम योग्य होते हैं, इसका कारण सिर्फ यही है की हम ख़ुद को नहीं पहचान पाते हैं।    हम ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ महावाक्य के बारे में बहुत बार बात करते हैं। इस महावाक्य का अर्थ है- 'मैं ब्रह्म हूं। यहाँ 'अस्मि' शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब हम उसी के रूप में ढल जाते हैं।  जैसे आप जिस वातावरण में रहेंगे आप वैसे ही बन जाएंगे।अगर बात करें आपके रूप की तो आपका मनुष्य जीवन वास्तविक रूप में तो देवताओं के श्रेष्ठ रूप की प्रतिमूर्ति   है, जरूरत है तो बस इसे पहचानने की। जीवन का यदि कोई नाद है तो वह है शिवोहम शिवोहम। यह जानना की मै केवल शरीर भर नहीं, ब्रह्म हूँ और ईश्वर को प्राप्त करने का सामर्थ्य मुझमे है, कठिन जरूर है, असंभव नहीं।आप अपने अंदर की आवाज़ को सुने। जिस दिशा से आवाज़ आ रही हो उस दिशा की ओर चलने की आवश्यकता है।  बाकी जब ह...

सचेतन 142 : श्री शिव पुराण- शिवोहम

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हम यह कहें की शिव तत्व आपको सत् से प्रीति करा कर आपके दुःख का नाश अवश्यंभावी कर देता है। प्रत्येक अवस्थाओं का साक्षी होना ही शिव है, सत् है, यही ईश्वर है, यही चैतन्य है, यही ज्ञानस्वरूप है और यही आनंद स्वरूप है। समस्त शास्त्र, तपस्या, यम और नियमों का निचोड़ यही है कि इच्छामात्र दुःखदायी है और इच्छा का शमन मोक्ष है। इच्छा के शमन से परम पद की प्राप्ति होती है। इच्छारहित हो जाना यही निर्वाण है। शिवोहम का अर्थ है मैं ही शिव हूं।परम ब्रह्म मैं ही हूं। है सदाशिव जो परम ब्रह्म और सर्वप्रथम प्रगट हुए हैं। जिन्होंने स्वयं सृष्टि का निर्माण किया। इसका अर्थ है कि दोनों एक ही हैं। अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ। ब्रह्म अर्थात परम ब्रह्म जो कि स्वयं शिव। फिर वो अलग कहां हुये? मनुष्य ईश्वर का ही अंश है. कहते हैं पंच तत्वों से बना ये मानव शरीर मृत्यु होने पर उन्ही पांच तत्वों में विलीन हो जाता है. आत्मा अजर अमर है, मनुष्य पृथ्वी पर जन्म लेता है तो अलग अलग रूप में, एक जीव चौसट लाख योनियां भोगकर मनुष्य बनता है. मनुष्य का शरीर पाकर वो अपने पुराने जन्मों के विषय में भूल जाता है. विस्मृति उसे प...

सचेतन 141 : श्री शिव पुराण- शिव तत्व आपके विश्वास का नाम है

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शिव तत्व के प्रवेश मात्र से आपको वर्तमान परिस्थित का ज्ञान होता जाएगा।  शिव तत्व आपके विश्वास का नाम है। जब आप अपने आप को सिर्फ़ कारण या निमित्त मात्र सोच कर विश्वास करते हैं और आप इस विचार मात्र को सत्य मानते हैं की कोई है जो आपको सहयोग करेगा और आप धीरज रखकर नित्य निरन्तर और स्थायी रूप से आप विचार मात्र पर विश्वास करते हैं जो आपको प्रशस्त करता है की कोई श्रेष्ठ या उत्तम या यूँ कहें की अच्छा सा है जो हमारा भला करेगा। यह शुद्ध और पवित्र दृढ़ भाव आपको स्थिर कर देता है और आप वर्तमान परिस्थित या समय में विद्यमान होना शुरू करते हैं आपको ठीक या उचित समझने में आ जाता है। यह वर्तमान में रहने का जीने का सोच आपको मनोहर और सुंदर लगने लगता है यही सत् है।  आपका ज्ञान विद्वान् और पंडित की तरह होने लगता है यानी आपका लिया हुआ हरेक विचार, फ़ैसला और प्रतिज्ञा मान्य होता है, आपके आस पास का माहोल पूज्य और आनंदमय बन जाता है।  सत् वह है जो शाश्वत है नित्य है, सुखस्वरूप महसूस होता है, आनंदस्वरूप का आभास दिलाता है, और ज्ञानस्वरूप बनाता है। वही असत् का अर्थ है जो नश्वर है यानी नष्ट होनेवाला या यह...

सचेतन 140 : श्री शिव पुराण- आख़िर शिवतत्व है क्या?

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शिव 'सत्' यानी सत्य है  श्री शिव पुराण की कथा में ब्रह्मा जी महर्षि नारद से कहते हैं की – हे नारद! तुम सदैव जगत के उपकार में लगे रहते हो। तुमने जगत के लोगों के हित के लिए “आख़िर शिवतत्व है क्या?” बहुत उत्तम बात पूछी है। जिसके सुनने से मनुष्य के सब जन्मों के पापों का नाश हो जाता है। उस परमब्रह्म शिवतत्व का वर्णन मैं तुम्हारे लिए कर रहा हूं।  शिव तत्व का स्वरूप बहुत सुंदर और अद्भुत है। जिस समय महाप्रलय आई थी और पूरा संसार नष्ट हो गया था तथा चारों ओर सिर्फ अंधकार ही अंधकार था, आकाश व ब्रह्माण्ड तारों व ग्रहों से रहित होकर अंधकार में डूब गए थे, सूर्य और चंद्रमा दिखाई देने बंद हो गए थे, सभी ग्रहों और नक्षत्रों का कहीं पता नहीं चल रहा था, दिन-रात, अग्नि-जल कुछ भी नहीं था। प्रधान आकाश और अन्य तेज भी शून्य हो गए थे। शब्द, स्पर्श, गंध, रूप, रस का अभाव हो गया था, सत्य-असत्य सबकुछ खत्म हो गया था, तब सिर्फ 'सत्' ही बचा था। उस तत्व को मुनिजन एवं योगी अपने हृदय के भीतर ही देखते हैं। वाणी, नाम, रूप, रंग आदि की वहां तक पहुंच नहीं है। 'सत्' को हम सभी बहुत नाम से जानते हैं, कहते ...

सचेतन 139 : श्री शिव पुराण- चंपा और केवड़े के फूलों से शिव पूजन नहीं करना चाहिए।

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गलत नीतियों से पूजा नहीं करनी चाहिए  माना जाता है कि एक बार नारद मुनि को पता चला की एक ब्राह्मण ने अपनी बुरी इच्छाओं के लिए चंपा के फूल तोड़े और जब नारद मुनि के वृक्ष्र से पूछा कि क्या किसी ने उसके फूलों को तोड़ा है तो पेड़ ने इससे इनकार कर दिया। चंपा के फूल  की सच्चाई जान गए थे नारद मुनि हालांकि जब नारद मुनि ने पास ही के शिव मंदिर में शिवलिंग को चंपा के फूलों से ढ़ंका पाया तो उन्हें सारी सच्चाई समझ आ गई और उन्हें यह बात की समझते देर नहीं लगी कि ब्राह्मण  ने भगवान शिव की यहां पर पूजा की और भगवान की कृपा से वह ब्राह्मण एक शक्तिशाली राजा बन गया, जिसने गरीबों को परेशान करना शुरू कर दिया था और भगवान शिव ने उस ब्राह्मण की मुराद भी पूरी की। शिव की पसंदीदा फूल था चंपा जब नारद ने भगवान से उस ब्राह्मण की मदद करने का कारण पूछा तो भगवान शिव ने कहा कि जो चंपा के फूल से मेरी पूजा करता था, उसे वो मना नहीं कर पाए। इसके बाद नारद मुनि वापस आए और चंपा के वृक्ष का शाप दे दिया कि उसके फूल कभी भी भगवान शिव की पूजा में स्वीकार नहीं किए जाएंगे, क्योंकि वृक्ष ने उनसे झूठ बोला और उन्हें गुमराह कर...

सचेतन 138 : श्री शिव पुराण- पुष्पों द्वारा शिव पूजा का माहात्म्य

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ऋषियों ने पूछा :– हे महाभाग ! अब आप यह बताइए कि भगवान शिवजी की किन-किन फूलों से पूजा करनी चाहिए? विभिन्न फूलों से पूजा करने पर क्या-क्या फल प्राप्त होते हैं?  सूत जी बोले :- हे ऋषियो! यही प्रश्न नारद जी ने ब्रह्माजी से किया था। ब्रह्माजी ने उन्हें पुष्पों द्वारा शिवजी की पूजा के माहात्म्य को बताया। ब्रह्माजी ने कहा :- नारद! लक्ष्मी अर्थात धन की कामना करने वाले मनुष्य को कमल के फूल, बेल पत्र, शतपत्र और शंख पुष्प से भगवान शिव का पूजन करना चाहिए। एक लाख पुष्पों द्वारा भगवान शिव की पूजा होने पर सभी पापों का नाश हो जाता है और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। एक लाख फूलों से शिवजी की पूजा करने से मनुष्य को संपूर्ण अभीष्ट फलों से की प्राप्ति होती है। जिसके मन में कोई कामना न हो, वह उपासक इस पूजन से शिव स्वरूप हो जाता है । मृत्युंजय मंत्र के पांच लाख जाप पूरे होने पर महादेव के स्वरूप के दर्शन हो जाते हैं। एक लाख जाप से शरीर की शुद्धि होती है। दूसरे लाख के जाप से पहले जन्म की बातें याद आ जाती हैं। तीसरे लाख जाप के पूर्ण होने पर इच्छा की गई सभी वस्तुओं की प्राप्ति हो जाती है। चौथे लाख जाप पूर्ण ...

सचेतन 137 : श्री शिव पुराण- महादेव स्वरूप बुद्धि, दृष्टि और ज्ञान का अद्भुत मिलन है।

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शिव तत्व मन के परे है। महादेव स्वरूप में शिव चन्द्र समान हैं। चन्द्र लिंग, यानी चन्द्र- गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित सोमनाथ का मंदिर चंद्र से संबंधित ही है। पश्चिम बंगाल में चंद्रनाथ लिंग चटागाव शहर से 34 मील दूर पश्चिम बंगाल में स्थित है। कई पवित्र तीर्थ इस क्षेत्र को घेरे हुए हैं। देवी पुराण ने इस क्षेत्र की बहुत प्रशंसा की। शिव तत्व वह तत्व है जो कि मन के परे है। चंद्रमा मन का प्रतीक होता है। मन के परे निर्गुण अवस्था को कैसे कोई अभिव्यक्त कर सकता है? इस निर्वचनीय स्थिति को कैसे कोई समझ सकता है? समझने, अनुभव करने और व्यक्त करने के लिये मानस का थोड़ा उपयोग करना आवश्यक है। अप्रकट, अनंत, अवचेतन अवस्था को प्रकट जगत में व्यक्त करने के लिये कुछ मन की आवश्यकता होती है। इसीलिये, अव्यक्त को व्यक्त करने के लिये शिव के शिखर पर यह पतला सा चन्द्रमा है जो कि मन का द्योतक है। ब्रह्मज्ञान मन के परे है, परन्तु उसे व्यक्त करने के लिये थोड़े मानस की आवश्यकता है - यही चंद्रशेखर का प्रतीक है। शिव को महादेव कहने का महत्व यही है की ऐसी कोई घटना जो नहीं हुई हो। कोई युद्ध नहीं हुआ,...

सचेतन 136 : श्री शिव पुराण- 'ईशान' सम्पूर्ण सिद्धियों का परिचायक है

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ईशन सूर्य लिंग के रूप में व्याप्त है  वेद में भगवान शिव की अष्टमूर्तियों सर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव, ईशान रूपों की बात करते हैं । ईशना : - सूर्य लिंग, कोणार्क मंदिर, उड़ीसा । यह क्षेत्र उड़ीसा राज्य में पुरी जगन्नाथ क्षेत्र के निकट है। कोणार्क अब खंडहर में है और मंदिर टुकड़ों में है और अब, भक्त यहां किसी भी भगवान या देवी को नहीं देख सकते हैं। किंवदंती है कि श्रीकृष्ण के पुत्र सांबा को एक बार कुष्ठ रोग हो गया था और वह यहां सूर्य और लिंग की पूजा करके ठीक हो गए थे और तब से यह क्षेत्र सभी रोगों का उपचार केंद्र बन गया। आज भी उसी आस्था और भक्ति से पूजा-पाठ चल रहा है ईशना में 'ईशान' शब्द सम्पूर्ण सिद्धियों के अर्थ में प्रयुक्त होता है और 'आ' शब्द दाताका वाचक है। जो सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाली है, वह देवी 'ईशाना' कही गयी है। यह हिंदू देवता और उत्तर पूर्व दिशा का दिकपाल है। उन्हें अक्सर भगवान शिव के रूपों में से एक माना जाता है, और उन्हें अक्सर रुद्रों में भी गिना जाता है । हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म के कुछ स्कूलों और जैन धर्म में पूजनीय हैं ।वास्तु शास्त...

सचेतन 135 : श्री शिव पुराण- पशुपति मंदिर की कथा

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योगी शिव और शून्यता पशुपति शैववाद सबसे पुराने शैव संप्रदायों में से एक है, जिसका नाम पशुपति से लिया गया है । संप्रदाय पशुपति को "सर्वोच्च देवता, सभी आत्माओं का स्वामी और सभी अस्तित्व का कारण" मानता है। पशुपति मंदिर बागमती नदी के किनारे पर देवपाटन नामक गाँव में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित एक प्रसिद्ध और पवित्र हिंदू मंदिर है। यह हिंदू मंदिर बागमती नदी के किनारे पर सदियों से बसाये गए मंदिरों, आश्रमों, मूर्तियों और शिलालेखों का विशाल संग्रह है। सन 1979 ईस्वी से यूनेस्को ने इस मंदिर परिसर को विश्व धरोहर स्थलों की सूची में शामिल किया है। पशुपतिनाथ मंदिर के बारे में कई प्रकार की कथाएँ बताई जाती  हैं। एक कथा के अनुसार एक बार भगवान शिव और पार्वती काठमांडू घाटी में आए और यात्रा के दौरान बागमती नदी के किनारे पर विश्राम किया। भगवान शिव यहाँ की खूबसूरती और जंगलों से इतने खुश हुए, कि उन्होंने और पार्वती ने खुद को हिरण के रूप में बदल लिया और जंगलों में घूमने चले गए। काठमांडू घाटी में कई ऐसे स्थान हैं, जहां भगवान शिव हिरण के रूप में गए हुये थे। कुछ लोग और देवता भगवान शिव की खोज ...

सचेतन 134 : श्री शिव पुराण- भगवान शिव का एक नाम पशुपति नाथ है

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हम सभी के स्वभाव में पशु के स्वभाव भी समाये हुए हैं वेद में भगवान शिव की अष्टमूर्तियों सर्व, भव, रुद्र, उग्र, भीम, पशुपति, महादेव, ईशान रूपों की बात करते हैं । पशुपति या पशुपतिनाथ, का अर्थ है " सभी जानवरों के भगवान "। यह मूल रूप से वैदिक काल में रुद्र का प्रतीक भी था। पशुपति नाथ का मंदिर धर्म, कला, संस्कृति की दृष्टि से अद्वितीय है। काशी के कण-कण में जैसै शिव माने जाते हैैं, वैसे ही नेेपाल में पग-पग पर मंदिर हैैं, जहां कला बिखरी पड़ी है..इस कला के पीछे धर्म और संस्कृति की जीवंतता छिपी हुई है। नेपाल का सुरम्य नगर काठमांडू अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां का मौसम प्रकृति को हर माह हरा-भरा रखने के लिए अनुकूल है। चारों तरफ बागमती, इंदुमती और विष्णुमती अनेक कल-कल करती नदियां, जो कभी वर्षा के पानी से उछलती-चलती हैं, तो कभी पहाड़ों से निकलने वाले बारहमासी जल स्रोतों का निर्मल जल ले कर मंद-मंद मुस्कुराती, बल खाती चलती हैं, वे देखने में अत्यंत मोहक और लुभावनी लगती हैं। प्रायः हर मौसम में यहां फूलों की बहार रहती है, जो देखने में अत्यंत मोहक है।  पशुपति नाथ शिव की ज...

सचेतन 133 : श्री शिव पुराण- पशुपति प्राणियों के शिव

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शिव और शून्यता आदिम रूपों या शक्तियों का प्रतिनिधित्व करने का अर्थ है की जो सर्वप्रथम, आदि में उत्पन्न, पहला या यूँ कहें की जो अविकसित है या सीधे-सादे ढंग का बहुत पुराना चीज है।  जब हम ‘शिव’ कहते हैं तो हमारा इशारा दो बुनियादी चीजों की तरफ होता है। ‘शिव’ का शाब्दिक अर्थ है- ‘जो नहीं है’। तो शिव शब्द “वो जो नहीं है” और आदियोगी दोनों की ही ओर संकेत करता है, क्योंकि बहुत से तरीकों से ये दोनों पर्यायवाची हैं। ये जीव, जो एक योगी हैं और वो शून्यता, जो सृष्टि का मूल है, दोनों एक ही है। क्योंकि किसी को योगी कहने का मतलब है कि उसने ये अनुभव कर लिया है कि सृष्टि वो खुद ही है।  अगर आपको इस सृष्टि को अपने भीतर एक क्षण के लिए भी बसाना है, तो आपको वो शून्यता बनना होगा। सिर्फ शून्यता ही सब कुछ अपने भीतर समा सकती है। जो शून्य नहीं, वो सब कुछ अपने भीतर नहीं समा सकता। एक बर्तन में समुद्र नहीं समा सकता। ये ग्रह समुद्र को समा सकता है, पर सौर्य मंडल को नहीं समा सकता। सौर्य मंडल ग्रहों और सूर्य को समा सकता है, पर बाकी की आकाश गंगा को नहीं समा सकता। अगर आप इस तरह कदम दर कदम आगे बढ़ें, तो आखिरकार आप द...

सचेतन 132 : श्री शिव पुराण- प्रकृति स्वरूप शिव के आठ स्वरूप लिंग

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विशेष मूर्ति आदिम रूपों या शक्तियों का प्रतिनिधित्व करता है   प्रकृति के निम्नलिखित रूपों या शक्तियों की पूजा उनके आदिम रूप में ही की जाती है, बिना किसी विशेष मूर्ति के उनका प्रतिनिधित्व करते हुए यह शिव रूप है  सर्व  :- भूमि लिंग, कांचीपुरम , तमिलनाडु। यह शिव कांची क्षेत्र में है, जहां भगवान एकम वृक्ष (आम्र (संस्कृत में आम) के पेड़, जो प्रति वर्ष केवल एक फल देते हैं) में क्षिति लिंग के रूप में हैं। पार्वती ने सबसे पहले इस रूप की पूजा की। इस मंदिर में जल से अभिषेक नहीं किया जाता है, इसके स्थान पर चमेली के तेल का उपयोग किया जाता है। यहां की देवी का नाम कामाक्षी है । इनकी कृपा दृष्टि से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भव  :- जल लिंग, थिरुवनई कोइल , (जम्बुकेश्वरम), तमिलनाडु। यह मंदिर त्रिची के बाहरी इलाके में स्थित है, जहां भगवान जम्बुकेश्वर विराजमान हैं और अपने भक्तों पर अपनी सारी कृपा बरसाते हैं। इस क्षेत्र को जम्बुकेश्वर क्षेत्र कहा जाता है, जिसे जल लिंग के नाम से भी जाना जाता है। भक्त गर्भ गृह के बाहर पानीपीठम से निकलने वाले पानी के बुलबुले देख सकते हैं। एक ज...

सचेतन 130 : श्री शिव पुराण- उग्र रूप सर्वतोभद्र यानी सभी तरफ से सुन्दर है।

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शिव और अर्जुन के बीच युद्ध राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का परिचायक है। यह एक कसौटी भी है।  महर्षि व्यासजी के कहे अनुसार अर्जुन दिव्य मंत्र 'ॐ नम: शिवाय' का जप और घोर तपस्या किया और भगवान शिव प्रसन्न हुए थे। उसी समय अर्जुन के पास दुर्योधन द्वारा भेजा हुआ 'मूक' नाम का एक राक्षस सूकर का रूप धारण कर वृक्षों को उखाड़ता, पर्वतों को नुकसान पहुंचाता वहां पहुंचा। और भगवान शिव अब अर्जुन का परीक्षा लेना चाहा।   'मूक' नाम का एक राक्षस सूकर को देखकर अर्जुन को समझते देर नहीं लगी कि ये मेरा ही नुकसान-अहित करना चाहता है। उन्होंने तुरंत अपना धनुष-बाण उठा लिया। उसी समय शिवजी अपने गणों सहित भील का रूप (जानवर शिकारी के रूप में) धारण कर वहां पहुंच गए। उसी पल सूकर ने आक्रमण करने के लिए कदम बढ़ाए कि तभी भीलराज और अर्जुन ने एकसाथ बाण छोड़े। भीलराज का बाण सूकर के पीछे के भाग में लगा और मुंह से निकलता हुआ पृथ्वी में चला गया। अर्जुन द्वारा चलाया गया बाण सूकर के मुंह में लगकर उसके पीछे के भाग से निकलकर पृथ्वी पर गिर गया। वह सूकर तत्काल मर गया। यह युद्ध शिव और...

सचेतन 128 : श्री शिव पुराण- शिव आपकी तपस्या से प्रसन्न ज़रूर होते हैं

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कन्नप्पा शिव के कट्टर भक्त थे और पिछले जन्म में पांडवों के अर्जुन थे । कन्नप्पा शिव के कट्टर भक्त थे और श्रीकालहस्तीश्वर मंदिर से निकटता से जुड़े हुए थे। वह एक शिकारी था और माना जाता है कि श्रीकालहस्ती मंदिर के पीठासीन देवता, श्रीकालहस्तीश्वर लिंग को चढ़ाने के लिए उसने अपनी आँखें निकल ली थीं। उन्हें 63 नयनार या पवित्र शैव संतों में से एक माना जाता है , जो शिव के कट्टर भक्त हैं । ऐतिहासिक कालक्रम के अनुसार, वह अपने पिछले जन्म में पांडवों के अर्जुन थे । जब पांडव द्रौपदी सहित वन में अज्ञातवास का समय बिता रहे थे तब उनके तमाम कष्टों को देखते हुए श्रीकृष्ण और महर्षि व्यासजी ने अर्जुन से भगवान शिव को प्रसन्न करके उनसे वर प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। भगवान शिवजी को प्रसन्न करने का उन्होंने उपाय भी अर्जुन को बताया। वीर अर्जुन, शिवजी को प्रसन्न करने के लिए और अपने राज्य पर आए संकटों के निवारण हेतु व्यासजी के निर्देशानुसार इंद्रकील पर्वत पर पहुंच गए। उन्होंने जाह्ववी के तट पर शिवलिंग का निर्माण किया और उस शिवलिंग की विधिवत पूजा-अर्चना करते हुए तप करने लगे। अपने गुप्तचरों द्वारा जब इंद्र को इ...