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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते

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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचार आपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर, कभी चिंता, कभी भविष्य की टेंशन, तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ कि इस तूफ़ान के बीच भी एक ऐसी जगह है जहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंग यही जगह दिखाता है। यह प्रसंग कहता है कि जिसे आप “मैं” मान बैठे हैं— शरीर, मन, अहंकार— वह सब पानी के बुलबुले जैसा है। और आप? आप वह पानी हैं। आदि शंकराचार्य कहते हैं— जो कुछ भी देखा जा सकता है , महसूस किया जा सकता है , सोचा जा सकता है — वह सब नाशवान है। शरीर, इंद्रियाँ, मन, बुद्धि, यहाँ तक कि “मैं” की भावना भी। ये सब पानी पर बने बुलबुले जैसे हैं। एक पल दिखते हैं, फिर बदलते हैं, और फिर मिट जाते हैं। अगर कोई चीज़ आती-जाती है, तो वह आप कैसे हो सकती है? ज़रा कल्पना कीजिए— पानी की सतह पर एक बुलबुला बनता है। वह चमकता है, सुंदर लगता है, लेकिन थोड़ी देर में फूट जाता है। अब सोचिए— शरीर बदल रहा है विचार बदल रहे हैं भावनाएँ बदल रही हैं अहंकार भी बदल रहा है...