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सचेतन- 14: आत्मबोध की यात्रा - जब आप सोते हैं, तब आप क्या होते हैं?

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“कल रात आप सोए थे… ना कोई विचार था, ना कोई चिंता, ना कोई डर, ना कोई पहचान। लेकिन सुबह उठकर आपने कहा— ‘मैं बहुत अच्छी नींद सोया।’ अब ज़रा सोचिए— जब सब कुछ सो गया था, तब यह ‘मैं’ कौन था जो नींद का अनुभव कर रहा था? ” अनाद्यविद्यानिर्वाच्या कारणोपाधिरुच्यते। उपाधित्रितयादन्यमात्मानमवधारयेत्॥ बहुत सरल अर्थ  जो अज्ञान शुरुआत से चला आ रहा है, जिसे शब्दों में पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता— वही कारण शरीर कहलाता है। लेकिन ध्यान से समझो— आत्मा इन तीनों शरीरों से अलग है। तीसरा शरीर – कारण शरीर “अब तक हमने दो शरीर समझे— 1️⃣ स्थूल/मोटा शरीर – जिससे हम चलते, खाते, थकते हैं। 2️⃣ सूक्ष्म शरीर – जिससे हम सोचते, डरते, खुश होते हैं। अब आता है तीसरा— कारण शरीर। जब आप गहरी नींद में होते हैं— ना सपना, ना विचार, ना पहचान— वह अवस्था कारण शरीर की होती है।” नींद में क्या होता है?  “नींद में आप कहते हैं— ‘मैं कुछ नहीं जानता था।’ इसका मतलब— अज्ञान मौजूद था। लेकिन यह अज्ञान कोई दुश्मन नहीं है। यह वही है जो शरीर और मन को आराम देता है। यह अज्ञान शुरुआत से है , इसलिए इसे कहते हैं— ...

सचेतन- 13: आत्मबोध की यात्रा - “मेरे अनुभव कहाँ से आते हैं?”

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“कभी आपने कहा है— मुझे भूख लगी है… मुझे डर लग रहा है… मैं बहुत खुश हूँ… मुझे गुस्सा आ रहा है… लेकिन कभी आपने खुद से पूछा— ये सब महसूस कौन कर रहा है? क्या आत्मा को भूख लगती है? क्या आत्मा डरती है? या ये सब किसी और से आ रहा है?” पञ्चप्राणमनोबुद्धिदशेन्द्रियसमन्वितम्। अपञ्चीकृतभूतोत्थं सूक्ष्माङ्गं भोगसाधनम्॥ सरल अर्थ हमारे अंदर साँस, मन, बुद्धि और इंद्रियाँ हैं। ये सब मिलकर एक सूक्ष्म शरीर बनाते हैं। यही सूक्ष्म शरीर हमें सुख और दुःख महसूस करने में मदद करता है। हमारे अंदर क्या-क्या है? “शंकराचार्य बताते हैं— हमारे अंदर पाँच प्राण हैं: • साँस अंदर जाना • साँस बाहर जाना • पूरा शरीर चलना • खाना पचना • ऊपर उठने की शक्ति फिर है— मन — जो सोचता है बुद्धि — जो समझती है और हैं दस इंद्रियाँ— • आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा • हाथ, पैर, मुँह, पेट, नीचे के काम ये सब मिलकर सूक्ष्म शरीर बनाते हैं।” अनुभव कैसे होते हैं? “अब एक आसान बात समझो— जब आप कहते हो— ‘मुझे भूख लगी है’ तो आत्मा भूखी नहीं है। भूख प्राण में होती है। जब आप कहते हो— ‘मुझे डर लग रहा है’ तो आत्मा नहीं डरती। डर ...