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सचेतन 07 शरीर, चक्र और पंचमहाभूत – योग की शक्ति को जानें

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नमस्कार! आप सुन रहे हैं सचेतन जहाँ हम “आत्मा की आवाज़” — पर विचार रखते हैं जो आपको प्रकृति, योग और आत्म-ज्ञान, आत्म-उन्नयन से जोड़ता है। आज का विषय है — पंचमहाभूत और उनके संबंधित चक्र और मुद्रा। क्या आप जानते हैं कि हमारा शरीर पाँच मूलभूत तत्वों से बना है? और हर तत्व हमारे शरीर के एक खास ऊर्जा चक्र से जुड़ा हुआ है। आईए, एक-एक करके इन रहस्यमयी तत्वों को समझते हैं। 🔢 1. पृथ्वी तत्व – मूलाधार चक्र 🌿 "Earth Element – Root Chakra" हमारी यात्रा शुरू होती है पृथ्वी से। यह हमें स्थिरता देता है, जड़ से जोड़े रखता है। चक्र : मूलाधार चक्र, रीढ़ की हड्डी के आधार पर स्थित विशेषता : सुरक्षा, स्थिरता, अस्तित्व की भावना मुद्रा : पृथ्वी मुद्रा – अनामिका और अंगूठे को मिलाकर इस मुद्रा को करते हुए गहराई से सांस लें, और जीवन की जड़ों से जुड़ने की अनुभूति करें। 🔢 2. जल तत्व – स्वाधिष्ठान चक्र 💧 "Water Element – Sacral Chakra" जल बहता है – भावनाओं की तरह। यह रचनात्मकता और संबंधों का प्रतिनिधित्व करता है। चक्र : स्वाधिष्ठान चक्र, नाभि के नीचे विशेषता : भावनाएँ, प्रजनन, रचन...

सचेतन 3.28 : नाद योग: ॐ की शक्ति

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सृष्टि की मूल ध्वनि नमस्कार श्रोताओं, और स्वागत है इस हमारे विशेष नाद योग (योग विद्या) पर सचेतन के इस विचार के सत्र  में।और आज हम बात करेंगे उस शक्तिशाली ध्वनि के बारे में, जो न केवल हमारी आध्यात्मिक यात्रा का आधार है, बल्कि पूरी सृष्टि का मूल भी है—ॐ की शक्ति। ॐ का महत्व ॐ, जिसे प्रणव मंत्र भी कहा जाता है, वह ध्वनि है जिसे ब्रह्मांड का आदिम और मूल स्वर माना गया है। यह वह ध्वनि है जिससे सृष्टि की उत्पत्ति हुई, और यही ध्वनि पूरी सृष्टि में व्याप्त है। जब हम ॐ का उच्चारण करते हैं, तो हम उस ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जुड़ जाते हैं, जो हमें शक्ति, शांति, और संतुलन प्रदान करती है। "प्रणव" शब्द संस्कृत से आया है, और इसका मूल अर्थ होता है "वह जो नाद से उत्पन्न हुआ हो।" यह ध्वनि न केवल ब्रह्मांड की उत्पत्ति का प्रतीक है, बल्कि समस्त सृष्टि में व्याप्त ऊर्जा और शक्ति का भी प्रतीक है। ॐ की शक्ति शारीरिक और मानसिक शांति: ॐ का उच्चारण हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। यह मन को शांत करता है और शरीर की ऊर्जा को संतुलित करता है। जब हम ॐ का जाप करते हैं, तो हमें...

सचेतन 2.113 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - अंगद का संकल्प और जाम्बवान का निवारण

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भले ही हममें कितनी भी शक्ति क्यों न हो, धैर्य और समर्पण भी उतना ही महत्वपूर्ण है नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका हमारे आज के विशेष सचेतन के इस विचार के सत्र  में, जहाँ हम बात करेंगे वानर सेना के वीर अंगद के उत्साह और जाम्बवान के विवेकपूर्ण निवारण की।दोस्तों, कहानी शुरू होती है उस समय से, जब हनुमान जी ने निशाचरों के साथ लंका को जीत लिया और युद्ध में रावण का वध कर, सीता माता को साथ लेकर, सफल और प्रसन्नचित्त होकर श्रीरामचन्द्रजी के पास वापस लौटने की तैयारी में थे। कपिवर अंगद ने एक अलग ही निर्णय लिया। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि क्यों न हम सभी जनकनंदिनी सीता को साथ लेकर श्रीराम और लक्ष्मण के पास चलें और उन्हें इस जीत की खबर दें। लंका विजय की ओर अग्रसर वानर सेना के बीच, एक गंभीर विचार-विमर्श चल रहा था। हनुमान जी के द्वारा लंका की खबरें लाने के बाद, अंगद के मन में एक बड़ा ही उत्साहजनक विचार आया। अंगद ने कहा, "हमें लंका जीतनी चाहिए और सीता माँ को मुक्त कराना चाहिए।" उनके इस संकल्प का समर्थन दो अत्यंत बलवान वानर, मैन्द और द्विविद ने किया, जिन्हें पूर्वकाल में ब्रह्माजी से विशेष वरदान प्...

सचेतन 2.112 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी की रणनीति- सीता की दुरवस्था बताकर वानरों को लङ्का पर आक्रमण करने के लिये उत्तेजित करना

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सचेतन 2.112 : रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - हनुमान जी की रणनीति- सीता की दुरवस्था बताकर वानरों को लङ्का पर आक्रमण करने के लिये उत्तेजित करना हनुमान जी का आत्मविश्वास और शक्ति की पराकाष्ठा स्पष्ट थी।  नमस्कार और स्वागत है "महानायक हनुमान" के बारे में सचेतन के इस विचार के सत्र  में। आज हम एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना पर चर्चा करेंगे, जब पवनकुमार हनुमान जी ने वानरों को लंका पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। हनुमान जी ने जब सीता जी की दुरवस्था देखी, तो उन्होंने वानरों को उत्साहित करने के लिए यह कथा सुनाई— हनुमान जी कहते हैं -  "कपिवरो! श्रीरामचन्द्रजी का उद्योग और सुग्रीव का उत्साह सफल हुआ। सीताजी का उत्तम शील-स्वभाव देखकर मेरा मन अत्यन्त संतुष्ट हुआ। वानरशिरोमणियो! जिस नारी का शील-स्वभाव आर्या सीता के समान होगा, वह अपनी तपस्या से सम्पूर्ण लोकों को धारण कर सकती है अथवा कुपित होने पर तीनों लोकों को जला सकती है। राक्षसराज रावण सर्वथा महान् तपोबल से सम्पन्न जान पड़ता है। जिसका अङ्ग सीता का स्पर्श करते समय उनकी तपस्या से नष्ट नहीं हो गया। हाथ से छू जाने पर आग की लपट भी वह काम नहीं कर...