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सचेतन, पंचतंत्र की कथा-35 : धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कथा-2

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आज हम धर्मबुद्धि और पापबुद्धि की कहानी को आगे बढ़ाते हैं।"सचेतन" के विचार के सत्र में आपका स्वागत है! पहला भाग: किसी नगर में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। एक दिन पापबुद्धि ने लालच में आकर धर्मबुद्धि को सुझाव दिया कि वे परदेश जाकर धन कमाएं। धर्मबुद्धि की ईमानदारी और मेहनत से दोनों ने परदेश में खूब धन कमाया। उन्होंने धन जंगल में गाड़ दिया। कुछ दिनों बाद पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि को बुलाया और गड्ढा खोदकर दिखाया कि धन गायब है। उसने धर्मबुद्धि पर चोरी का झूठा आरोप लगाया। धर्मबुद्धि शांतिपूर्वक बोला, "मैं धर्मबुद्धि हूं। मैं कभी चोरी नहीं कर सकता। धार्मिक व्यक्ति दूसरों की संपत्ति को मिट्टी समान और सभी प्राणियों को समान दृष्टि से देखता है।" दोनों के बीच विवाद बढ़ा, और वे न्याय मांगने के लिए राजदरबार गए। दूसरा भाग: दोनों इस विवाद को लेकर राजदरबार में पहुंचे अब आगे की कथा सुनेते हैं -  जब अदालत के अधिकारी धर्म और सत्य की जांच के लिए तैयार हुए, पापबुद्धि ने चालाकी से कहा, "यह मुकदमा शमी वृक्ष देवता के समक्ष सुलझाया जाए। वे हमारे बीच न्याय करेंगे।" ...