सचेतन – 63 | आत्मबोध: “जो दिख रहा है… क्या वह सच में वैसा ही है?”
एक बहुत गहरा सवाल… क्या जो आप देख रहे हैं… वह सच में वैसा ही है? या… वह सिर्फ दिख रहा है… लेकिन असल में कुछ और है? “शायद… जो दिख रहा है, वह पूरा सच नहीं है।” थोड़ा रुकिए… और ईमानदारी से सोचिए… क्या आपने कभी जो देखा… वह गलत भी हो सकता है? आज का आत्मबोध एक बहुत बड़ी सच्चाई खोलता है— जो दिखाई दे रहा है… वह अंतिम सत्य नहीं है। शास्त्र कहते हैं— “ब्रह्म इस जगत से अलग है… और ब्रह्म के अलावा कुछ भी नहीं है।” अगर कुछ अलग दिखता है… तो वह है — मृग-मरीचिका… एक भ्रम। एक बहुत सरल उदाहरण… रेगिस्तान में कभी दूर पानी जैसा दिखा है? आपको लगता है— वहाँ सच में पानी है… आप उसकी ओर बढ़ते हैं… लेकिन जैसे-जैसे पास जाते हैं… वह गायब हो जाता है। क्यों? क्योंकि वह कभी था ही नहीं। “दुनिया भी कई बार ऐसी ही मृग-मरीचिका होती है।” उसे कहते हैं — मृग-मरीचिका । ठीक वैसे ही… हम इस दुनिया को देखते हैं— लोग, चीजें, समस्याएं… और मान लेते हैं— यही सब अंतिम सच है। लेकिन… आत्मबोध कहता है— यह भी एक तरह का भ्रम है। एक और उदाहरण… अंधेरे में रस्सी पड़ी थी… आपने उसे साँप समझ लिया… डर गए… दिल तेज़ धड़कने लगा… लेकिन जैस...