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सचेतन- 38 –आत्मबोध – साधना से साक्षात्कार की ओर

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  “ध्यान कोई तकनीक नहीं, एक परिपक्व स्थिति है” क्या आपने कभी यह महसूस किया है कि आप ध्यान करना चाहते हैं, लेकिन मन बैठने को तैयार ही नहीं होता? शरीर बैठ जाता है, आँखें बंद हो जाती हैं, पर मन बाहर ही भटकता रहता है। आत्मबोध में आज का यह विचार हमें एक बहुत स्पष्ट बात सिखाता है— 👉 ध्यान केवल बैठने से नहीं होता, ध्यान जीवन की तैयारी से होता है। आज का विचार हमें  ध्यान की तकनीक नहीं, ध्यान की भूमिका बताता हूँ  शंकराचार्य कहते हैं— एकांत स्थान में बैठकर, इच्छाओं से मुक्त होकर, इंद्रियों को संयम में रखते हुए, एकमात्र, अनंत आत्मा का एकाग्र भाव से चिंतन करो। यह श्लोक हमें बताता है कि ध्यान की चार आधारशिलाएँ क्या हैं। भाग 1: विविक्त देश – बाहरी शांति सबसे पहले कहा गया— विविक्तदेश आसीनः यानि— शांत, एकांत स्थान में बैठना। ध्यान के लिए शोरगुल नहीं, भागदौड़ नहीं, भीड़ नहीं। लेकिन यहाँ एक गहरी बात है— 👉 विविक्त देश केवल स्थान नहीं, मन की स्थिति भी है। आप कमरे में अकेले हो सकते हैं, लेकिन मन बाज़ार में हो। इसलिए एकांत का अर्थ है— जहाँ मन को कम उत्तेजना मिले। विजित...