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सचेतन- 43 वेदांत सूत्र: विवेक : क्या सच में हमारा है, और क्या सिर्फ़ कु...

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नमस्कार, मैं आपका स्वागत करता हूँ सचेतन की इस कड़ी में। आज हम बात करेंगे— विवेक , यानी वह आंतरिक प्रकाश जो हमें दिखाता है कि जीवन में क्या वास्तव में हमारा है और क्या केवल कुछ समय के लिए आया हुआ अतिथि। 1. विवेक क्या है? विवेक का अर्थ है— जीवन में होने वाली हर घटना, हर संबंध, हर वस्तु को ध्यान से देखना और यह पहचानना कि— क्या स्थायी (नित्य) है, और क्या अस्थायी (अनित्य)। हम रोज़ अनुभव करते हैं कि— शरीर बदलता है, रूप-रंग बदलता है, मन के भाव बदलते हैं, सुख-दुख आते-जाते रहते हैं, और धन, सत्ता, पद—इनका कोई ठिकाना नहीं। 👉 इसलिए ये सब अस्थायी हैं—कुछ समय के लिए आए अतिथि। लेकिन इसके विपरीत— आत्मा नहीं बदलती। चेतना नहीं बदलती। ब्रह्म , जो सबका आधार है, वह अटल, स्थिर और नित्य है। 👉 यही है स्थायी सत्य । जब यह स्पष्ट हो जाता है कि क्या बदलता है और क्या नहीं , तो मन सही दिशा में चलने लगता है। 2. विवेक से जीवन में क्या बदलता है? विवेकशील व्यक्ति— छोटी-छोटी बातों में नहीं उलझता चिंता, डर, और ग़ुस्से से धीरे-धीरे मुक्त होने लगता है बाहरी चीज़ों को देखकर बेचैन नहीं होता और जीवन का गहरा, स्...

सचेतन- 23:तैत्तिरीय उपनिषद्: विज्ञानपुरुष ही “कर्त्ता” है

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विज्ञानमय कोश = वह आवरण/स्तर जिसमें बुद्धि (Intellect), विवेक (Discrimination), और निर्णय-शक्ति काम करते हैं। कर्त्ता अर्थात् वह जो कार्य करता है (doer/subject)। उदाहरण: राम फल खाता है । → यहाँ "राम" कर्त्ता है, क्योंकि खाने का काम वही कर रहा है। वाक्य का वह अंग जिससे यह ज्ञात होता है कि क्रिया किसके द्वारा की जा रही है , उसे कर्त्ता कहते हैं। उपनिषद इसे “कर्त्ता” (Doer / Decision-maker) कहता है, क्योंकि: निर्णय लेने की शक्ति – शरीर (अन्नमय) केवल साधन है, प्राण (ऊर्जा) केवल शक्ति है, मन केवल भावनाएँ और विचार है। लेकिन क्या करना है और क्या न करना है, इसका निर्णय बुद्धि लेती है। धर्म-अधर्म का विवेक –  मन कह सकता है “मुझे मिठाई खानी है”, लेकिन बुद्धि तय करती है – “यह मेरे स्वास्थ्य के लिए ठीक है या नहीं।” इस विवेक से कर्म की दिशा बनती है। कर्तृत्व का आधार – उपनिषद कहता है कि कर्म का असली जिम्मेदार बुद्धि है। क्योंकि शरीर, प्राण और मन तो उपकरण मात्र हैं, उन्हें दिशा बुद्धि ही देती है। इसलिए इसे “कर्त्ता” कहा गया। विज्ञानमय कोश का रूपक, “विज्ञानपुरुष” है तैत्तिरीयोपनि...

सचेतन- 06: चित् — ज्ञान और विवेक का विकास

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🌿 “इस सृष्टि में लाखों योनियाँ हैं — पर केवल मनुष्य ही वह प्राणी है जिसमें सत्-चित्-आनन्द का विकास संभव है।” 🕉️ भावार्थ: सत् (सत्य या अस्तित्व) – यथार्थ को जानने और कर्म की शुद्धि का बोध। चित् (चेतना) – जागरूकता, ज्ञान और विवेक की वृद्धि। आनन्द (परम सुख) – आत्मा से जुड़कर प्राप्त होने वाला शाश्वत सुख। 🐾 जीवों की 84 लाख योनियों में केवल मनुष्य योनि ही ऐसी है जो आत्मबोध, मोक्ष और ईश्वर-प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ सकती है। यह एक संदेश है: "मनुष्य जन्म कोई संयोग नहीं — यह एक विशेष अवसर है। सत्कर्म, आत्मबोध और दिव्यता की ओर बढ़ो — यही सच्चा मानव धर्म है।" आज "चित्" के बारे में विचार करते हैं जिसका अर्थ है — बोध , जागरूकता , और आत्म-चेतना । यह वही शक्ति है: जो हमें अन्य सभी प्राणियों से अलग बनाती है। चित् क्यों विशेष है? क्योंकि केवल मनुष्य ही ऐसा है जो यह पूछ सकता है: "मैं कौन हूँ?" "मैं क्यों जन्मा हूँ?" "क्या यह जीवन केवल खाने, कमाने और मरने तक सीमित है?" दूसरे जीव केवल जैविक जीवन जीते हैं — पर मनुष्य में यह क्षमता है कि ...