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सचेतन- 53 – “मैं अलग नहीं… मैं वही हूँ”

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एक गहरा प्रश्न क्या आपने कभी सोचा है… जब यह शरीर नहीं रहेगा, जब यह नाम, यह पहचान, यह कहानी सब समाप्त हो जाएगी… तब “मैं” कहाँ जाऊँगा? क्या मैं कहीं चला जाऊँगा? या… मैं हमेशा से वहीं था? - “मरने के बाद हम कहाँ जाते हैं?” आज आत्मबोध का यह विचार एक बहुत गहरी सच्चाई खोलता है —  आप कहीं जाते नहीं… बस अपने असली स्वरूप में स्थापित हो जाते हैं। श्लोक का सरल अर्थ “जब उपाधियाँ (शरीर-मन आदि) समाप्त हो जाती हैं, तब ज्ञानी पूर्ण रूप से उस सर्वव्यापक सत्य में स्थित हो जाता है — जैसे पानी पानी में मिल जाता है, आकाश आकाश में, और प्रकाश प्रकाश में।” “मिलना” क्या सच में मिलना है? श्लोक कहता है — जल जल में मिल जाता है। पर ज़रा सोचिए… अगर एक गिलास पानी समुद्र में डाल दें… क्या वह पानी कहीं गया? या वह हमेशा से पानी ही था? बस “गिलास का नाम” हट गया। - “आप कभी अलग थे ही नहीं…” घड़े का आकाश एक और उदाहरण… एक घड़े के अंदर आकाश है। घड़े के बाहर भी आकाश है। जब घड़ा टूटता है… क्या अंदर का आकाश बाहर के आकाश में “जाता” है? नहीं। वह हमेशा से एक ही था। बस घड़े की सीमा खत्म हुई।- “आप सीमित नहीं हैं…” तो “मै...