संदेश

जून, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सचेतन- 6: निदिध्यासन – आत्मा का साक्षात्कार

चित्र
स्वामी विवेकानंद कहते थे — "जब विचारों का शुद्धिकरण हो जाता है, तब मन सत्य में स्थित होता है। तब ज्ञाता और ज्ञेय के बीच भेद मिट जाता है। यही है निदिध्यासन — आत्मा के स्वरूप में स्थित हो जाना।" निष्कर्ष निदिध्यासन आत्म-चिंतन की वह पराकाष्ठा है, जहाँ 'जानना' और 'हो जाना' एक हो जाता है।निदिध्यासन आत्म-चिंतन की वह गहरी अवस्था है, जहाँ हम किसी बात को केवल समझते नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह जीने लगते हैं। 'ज्ञान' और 'अनुभव' एक हो जाते हैं। या निदिध्यासन का मतलब है – बार-बार सोचकर किसी बात को अपने जीवन का हिस्सा बना लेना। जब हम जो जानते हैं, वही हम बन जाते हैं – यही निदिध्यासन है। यह अभ्यास व्यक्ति को मायाजाल से मुक्त करके , स्वरूप में स्थित करता है। “मन को बार-बार सत्य की ओर मोड़ना ही निदिध्यासन है। और अंततः वही मन ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।” महत्व: यह ज्ञान को अनुभव में बदलने की प्रक्रिया है। केवल विचार नहीं, अनुभूति होती है। यहाँ साधक अपने भीतर की आत्मा को ब्रह्मरूप में देखता है। कैसे करें: नियमित ध्यान करें – विशेषकर “मैं कौन हूँ?”, “सोऽहम” (मैं वही ...

सचेतन- 7: आत्मा – चेतना का आधार

चित्र
सचेतन- 7: आत्मा – चेतना का आधार 🕉️ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म को जानना: "अहं ब्रह्मास्मि" – मैं ब्रह्म हूँ जब व्यक्ति अनुभव करता है कि उसकी आत्मा ही ब्रह्म है — यही ब्रह्म-ज्ञान है। "यः वेद निहितं गुहायां" — जो ब्रह्म हृदय की गुफा (आत्मा) में स्थित है, उसे जो जानता है, वही मुक्त होता है। "नेति नेति" (Neti Neti) — ब्रह्म को शब्दों में परिभाषित नहीं किया जा सकता; उसे केवल अनुभव किया जा सकता है — "यह नहीं, वह नहीं", हर सीमा से परे। 🌟 ब्रह्म को जानने का परिणाम: मुक्ति (मोक्ष) — जन्म-मरण से मुक्ति शांति और आनंद — स्थायी, अचल, अपरिवर्तनीय आनंद अहम् का विलय — अहंकार मिट जाता है, केवल चेतना बचती है 📖 एक सरल उदाहरण: जैसे समुद्र की लहरें समुद्र से अलग नहीं होतीं, वैसे ही आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं है। ब्रह्म को जानना = यह जानना कि मैं लहर नहीं, मैं स्वयं समुद्र हूँ। 1. अहं ब्रह्मास्मि (Aham Brahmasmi) – मैं ब्रह्म हूँ — बृहदारण्यक उपनिषद यह उपनिषदिक महावाक्य कहता है कि व्यक्ति की चेतना (आत्मा) और ब्रह्म (सर्वोच्च चेतना) एक ही हैं। यानी हमारी आत्मच...

सचेतन- 16: विवेक से निर्णय (Wise Discernment)

चित्र
विवेक का अर्थ है — सही और गलत, उचित और अनुचित, टिकाऊ और अस्थायी के बीच स्पष्ट समझ । जब कोई व्यक्ति प्रज्ञा (आत्मिक बुद्धि) के प्रकाश में निर्णय करता है, तो उसे कहते हैं विवेक से निर्णय । 🌿 विवेक से निर्णय क्या होता है? भावनाओं में बहकर नहीं, शांति और जागरूकता से निर्णय लेना। “क्या यह मेरे और दूसरों के लिए दीर्घकालिक रूप से सही है?” — ऐसा प्रश्न पूछना। 🧭 विवेकपूर्ण निर्णय का मूल आधार क्या हो? केवल लाभ या हानि पर नहीं — निर्णय नीति (सिद्धांत) और सत्य (सचाई) पर आधारित होना चाहिए। 🌿 उदाहरण: अगर कोई लाभदायक कार्य किसी के साथ अन्याय कर रहा है — विवेक कहेगा: "यह मत करो।" अगर सच बोलना नुकसान पहुँचा सकता है, फिर भी नीति कहती है: "सच बोलो, क्योंकि अंत में सत्य ही स्थायी है।" "सत्यं वद, धर्मं चर" — ( तैत्तिरीय उपनिषद ) सत्य बोलो, धर्म के अनुसार चलो। नीति और सत्य — यही मनुष्य को महान बनाते हैं। सारांश: लाभ–हानि क्षणिक है, लेकिन नीति और सत्य चिरस्थायी हैं। जब निर्णय विवेक , नीति और सत्य से लिए जाते हैं, तब जीवन में स्थायी शांति और संतुलन आता है। विवेक...