सचेतन- 6: निदिध्यासन – आत्मा का साक्षात्कार
स्वामी विवेकानंद कहते थे — "जब विचारों का शुद्धिकरण हो जाता है, तब मन सत्य में स्थित होता है। तब ज्ञाता और ज्ञेय के बीच भेद मिट जाता है। यही है निदिध्यासन — आत्मा के स्वरूप में स्थित हो जाना।" निष्कर्ष निदिध्यासन आत्म-चिंतन की वह पराकाष्ठा है, जहाँ 'जानना' और 'हो जाना' एक हो जाता है।निदिध्यासन आत्म-चिंतन की वह गहरी अवस्था है, जहाँ हम किसी बात को केवल समझते नहीं, बल्कि उसे पूरी तरह जीने लगते हैं। 'ज्ञान' और 'अनुभव' एक हो जाते हैं। या निदिध्यासन का मतलब है – बार-बार सोचकर किसी बात को अपने जीवन का हिस्सा बना लेना। जब हम जो जानते हैं, वही हम बन जाते हैं – यही निदिध्यासन है। यह अभ्यास व्यक्ति को मायाजाल से मुक्त करके , स्वरूप में स्थित करता है। “मन को बार-बार सत्य की ओर मोड़ना ही निदिध्यासन है। और अंततः वही मन ब्रह्मस्वरूप हो जाता है।” महत्व: यह ज्ञान को अनुभव में बदलने की प्रक्रिया है। केवल विचार नहीं, अनुभूति होती है। यहाँ साधक अपने भीतर की आत्मा को ब्रह्मरूप में देखता है। कैसे करें: नियमित ध्यान करें – विशेषकर “मैं कौन हूँ?”, “सोऽहम” (मैं वही ...