सचेतन- 50 –आत्मबोध “मोहमाया का समुद्र और भीतर का राम”
– एक सच्चा सवाल क्या आपको कभी लगा है कि जीवन एक समुद्र जैसा है? लहरें ही लहरें… चिंता… आसक्ति… गुस्सा… तुलना… डर… और हम बीच समुद्र में तैरते जा रहे हैं। आज आत्मबोध का श्लोक 50 हमें बताता है — इस समुद्र को पार किया जा सकता है। और उसके उस पार क्या है? शांति। आत्मा का आनंद। आत्माराम अवस्था। “मोहार्णव” क्या है? श्लोक कहता है — तीर्त्वा मोहार्णवम् अर्थात — मोह के समुद्र को पार करके। मोह क्या है? गलत पहचान। मैं शरीर हूँ। मैं पद हूँ। मैं नाम हूँ। मैं धन हूँ। मैं संबंध हूँ। जब हम इन चीज़ों को “मैं” मान लेते हैं, तभी शुरू होता है समुद्र। फिर हर लहर हमें हिलाती है। लोग तारीफ करें — खुश। आलोचना करें — टूट गए। यही है मोह का समुद्र। राग-द्वेष के राक्षस श्लोक आगे कहता है — राग-द्वेषादि राक्षसान् हत्वा राग — जो मुझे पसंद है। द्वेष — जो मुझे नापसंद है। बस यही दो चीज़ें हमें नचाती रहती हैं। जो चाहिए वह मिले तो ठीक। न मिले तो क्रोध। जो नापसंद है वह सामने आए तो द्वेष। न जाए तो दुख। हम बाहर के लोगों से नहीं लड़ रहे, हम अपने भीतर के राक्षसों से लड़ रहे हैं। लालच। ईर्ष्या। अहंकार। तु...