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सचेतन- 14:तैत्तिरीय उपनिषद्: शिक्षावल्ली - स्वर, लय और ताल का संतुलन

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शिक्षावल्ली तैत्तिरीय उपनिषद् (यजुर्वेद की शाखा) का प्रथम भाग है। “वल्ली” का अर्थ है — लता या शाखा। इसलिए शिक्षावल्ली = वह शाखा जिसमें शिक्षा (उच्चारण, स्वर, लय और पाठ की शुद्धि) के विषय में ज्ञान दिया गया है। शिक्षा में उच्चारण, स्वर, मात्रा और बल की शुद्ध परंपरा।इसके छः अंग (तत्त्व) हैं  वर्ण – अक्षरों का शुद्ध उच्चारण। स्वर – उदात्त, अनुदात्त, स्वरित। मात्रा – ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत (ध्वनि की लंबाई)। बल (प्रयास) – उच्चारण में उचित बल और स्पष्टता। साम (समानता) – स्वर-लय का मधुर संतुलन। सातत्य (संधि) – निरंतरता और प्रवाह। शिष्य को यह सिखाना कि वेदपाठ केवल पढ़ने का विषय नहीं है, बल्कि शुद्ध उच्चारण, अनुशासन, सदाचार और आचार–विचार के साथ जीवन जीने की साधना है।   आज के इस सत्र में हम समतान (साम) और सातत्य (सन्तान) के बारे में चर्चा करेंगे जिसका का अर्थ है — मंत्र-पाठ में स्वर, लय और ताल का संतुलन, जिससे उसका उच्चारण मधुर और सुरीला हो। समान स्वर : सभी शब्द एक जैसी ध्वनि में निकलें, बीच में टूट-फूट न हो। लय (ताल) : जैसे गीत गाते समय एक लय होती है, वैसे ही मंत्रोच्चार की ...