सचेतन 259: शिवपुराण- वायवीय संहिता - भाव योग से जीवन ऊर्जा का महासागर बन जाता है

भगवान नित्य विग्रह और चिन्मय हैं जिनमें आपका भगवत्स्वरूप दिखता है।

भाव योग में जब जीवन ऊर्जा का रूपांतरण होता है तो आपका हृदय करुणा रस से द्रवित हो जाता है। यही भाव योग के मूल में श्रद्धा का होना है। अगर श्रद्धा का भाव नहीं है तो सब कुछ मिथ्या है। भाव करते-करते भगवत्कृपा से आप सच्चे भाव में प्रवेश करते हैं और आप एक साधक के रूप में स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्मतर और सूक्ष्मतम में भाव में प्रवेश करते हैं। 

इस दिव्य भावना में प्रवेश करते ही आप भगवान की अर्चना और आनंदानुभूति करते हैं। वैसे हमने स्पर्श योग में चर्चा किया था की शरीर के आवरण हैं यह पाँच आवरण  को प्राणमय-कोश: क्रिया-शक्ति (करने की शक्ति), मनोमय-कोश: इच्छा-शक्ति (इच्छा की शक्ति) और विज्ञानमय-कोश: ज्ञान-शक्ति (जानने की शक्ति), आनंदमय कोष  से भी जानते हैं जिसे देह के पाँच भेद भी माने जाते हैं--स्थूल, सूक्ष्म, कारण, भाव और चिन्मय। चिन्मय और भाव देह कुछ विलक्षण हैं। 

भगवान नित्य विग्रह और वह चिन्मय है। विग्रह यानी वह स्थूल स्वरूप जिसकी आप पूजा करते हैं और चिन्मय का मतलब ज्ञान से भरा हुआ आनंदमय होना अर्थात् ज्ञान के साथ सुप्रीम चेतना में प्रवेश करना फिर आपका यह देह देह नहीं रह जाता आप भगवत्स्वरूप ही हो हैं। 

मनुष्य के पास एक सूक्ष्म और असीम अंतर्जगत है, और दूसरा स्थूल और सीमित बाह्य जगत् है। जिस प्रकार वाह्य जगत अनेक रूपात्मक है, उसी प्रकार अन्तर्जगत् अनेक भावात्मक और कलात्मक है। बाह्य जगत् मनुष्य के स्थुल शरीर को स्थिति एवं संरक्षणा प्रदान करता है तो साथ ही मानसिक जगत्‌ को भी सुख-दुःख, आशा निराशा आदि के अनेक स्पंदनों से भरता रहता है जो अपनी अभिव्यक्ति के लिए अस्थिर हो उठते हैं और अपनी कला से उसको व्यक्त करते हैं। 

हमारे भारत वर्ष में भक्ति भाव से काव्य, नृत्य एवं अन्य ललित कलाओं के द्वारा मनुष्य के अन्तर्जंगत्‌ और बहिजंगत्‌ की क्रिया-प्रतिक्रिया की रागात्मक अनुभूति की अभिव्यक्ति बहुत सारे भक्तों ने किया है। अभिव्यक्ति की कुशल शक्ति ही तो कला है जो मन के अंतःकरण की सुन्दर प्रस्तुति करता है।

भाव योग से जीवन ऊर्जा का महासागर बन जाता है और अंतश्‍चेतना जाग्रत होती है तो ऊर्जा जीवन को कला के रूप में उभारती है। कला जीवन को सत्‍यम् शिवम् सुन्‍दरम् से समन्वित करती है। इसके द्वारा ही बुद्धि आत्‍मा का सत्‍य स्‍वरुप झलकता है। कला उस क्षितिज की भाँति है जिसका कोई छोर नहीं, इतनी विशाल इतनी विस्‍तृत अनेक विधाओं को अपने में समेटे, तभी तो मीरा भक्ति काल की एक ऐसी संत हैं, जिनका सब कुछ कृष्ण के लिए समर्पित था। यहां तक कि कृष्ण को ही वह अपना पति मान बैठी थीं। भक्ति की ऐसी चरम अवस्था कम ही देखने को मिलती है।

इंसान आमतौर पर शरीर, मन और बहुत सारी भावनाओं से बना है। यही वजह है कि ज्यादातर लोग अपने शरीर, मन और भावनाओं को समर्पित किए बिना किसी चीज के प्रति खुद को समर्पित नहीं कर सकते। विवाह का मतलब यही है कि आप एक इंसान के लिए अपनी हर चीज समर्पित कर दें, अपना शरीर, अपना मन और अपनी भावनाएं। आज भी कई इसाई संप्रदायों में नन बनने की दीक्षा पाने के लिए, लड़कियां पहले जीसस के साथ विवाह करती हैं। कुछ लोगों के लिए यह समर्पण, शरीर, मन और भावनाओं के परे, एक ऐसे धरातल पर पहुंच गया, जो बिलकुल अलग था, जहां यह उनके लिए परम सत्य बन गया था। ऐसे लोगों में से एक मीराबाई थीं, जो कृष्ण को अपना पति मानती थीं।

मीराबाई सोलहवीं शताब्दी की एक कृष्ण भक्त और कवयित्री थीं। मीरा बाई ने कृष्ण भक्ति के स्फुट पदों की रचना की है। संत रैदास या रविदास उनके गुरु थे।

वे विरक्त हो गईं और साधु-संतों की संगति में हरिकीर्तन करते हुए अपना समय व्यतीत करने लगीं। ये मंदिरों में जाकर वहाँ मौजूद कृष्णभक्तों के सामने कृष्णजी की मूर्ति के आगे नाचती रहती थीं। 

भाव योग में आप आराम से बैठें, मुस्कराएं, दूसरों से बातें करें, इन सबके लिए आपको बहुत ज्यादा भरोसा की जरूरत है। लेकिन यह सब आप अनजाने में और बिना प्रेम-भाव के कर रहे हैं। इस भरोसा को पूरी जागरुकता और प्रेम के साथ करना सीखिए। यही भक्ति है। इस सृष्टि पर पूरा भरोसा रखते हुए अगर आपने जागरुकता और प्रेम के साथ भाव योग और सचेतन होना सीख लिया, तो यही भक्ति है। भक्ति कोई मत या मान्यता नहीं है। भक्ति इस अस्तित्व में होने का सबसे खूबसूरत तरीका है।


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