सचेतन 2.71: रामायण कथा: सुन्दरकाण्ड - सीताजी का तर्क-वितर्क
हनुमान जी को देखकर सीताजी का तर्क-वितर्क चलता रहा और फिर सीता जी ने बताया की उन्हें रावण बलपूर्वक हर कर लाया था। हनुमान जी को भी विश्वास हो गया की वे सीताजी ही हैं। हनुमान जी ने कहा की आप ठीक-ठीक मुझे बताइये। मैं आपके विषय में जानना चाहता हूँ। दुःख के कारण आप में जैसी दीनता आ गयी है, जैसा आपका अलौकिक रूप है तथा जैसा तपस्विनी का-सा वेष है, इन सबके द्वारा निश्चय ही आप श्रीरामचन्द्रजी की महारानी जान पड़ती हैं। हनुमान जी की बात सुनकर विदेह नन्दिनी सीता श्रीरामचन्द्रजी की चर्चा से बहुत प्रसन्न थीं; अतः वृक्ष का सहारा लिये खड़े हुए उन पवनकुमार से बोलीं- कपिवर! जो भूमण्डल के श्रेष्ठ राजाओं में प्रधान थे, जिनकी सर्वत्र प्रसिद्धि थी तथा जो शत्रुओं की सेना का संहार करने में समर्थ थे, उन महाराज दशरथ की मैं पुत्रवधू हूँ, विदेहराज महात्मा जनक की पुत्री हूँ और परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीराम की धर्मपत्नी हूँ मेरा नाम सीता है। अयोध्या में श्रीरघुनाथजी के अन्तःपुर में बारह वर्षों तक मैं सब प्रकार के मानवीय भोग भोगती रही और मेरी सारी अभिलाषाएँ सदैव पूर्ण होती रहीं। तदनन्तर तेरहवें ...