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सचेतन 149 : श्री शिव पुराण- आपकी सर्वोच्च शक्ति हमारी मानसिक स्थिति का परिणाम है।

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“यत्न देवो भव” की उपासना करनी चाहिए  अगर आपकी परिस्थितियाँ प्रतिकूल हैं तो भी प्रयास और साधनों का उपयोग करते रहना चाहिये। थोड़ा थोड़ा प्रयास करके उच्च-स्तर तक पहुँचा जा सकता है किन्तु मानसिक शक्ति अपने साथ बनी रहनी चाहिये। कार्य करते समय ऊबो नहीं और उत्तेजित भी न हों। यह समझ लें कि हमें तो लक्ष्य तक पहुँचना है। जितनी बार गिरो उतनी बार उठो। एक बार गिरने से उसका कारण मालूम पड़ जायेगा तो दुबारा उधर से सावधान हो जाओगे। यह स्थिति निरन्तर चलती रहे तो अनेक बाधाओं के रहते हुए भी अपने लिये उन्नति का मार्ग निकाला जा सकता है। हार मन के हारने से होती है। मन यदि बलवान है तो इच्छा-पूर्ति भी अधिक सुनिश्चित समझनी चाहिये।  आज यदि स्थिति ठीक नहीं है तो भविष्य में भी वह ऐसी ही बनी रहेगी, ऐसा कमजोर बनाने वाला विचार अपने मस्तिष्क से निकाल दें। श्रेष्ठता अन्दर सुप्तावस्था में पड़ी हुई है। इसमें संशय नहीं कि हम हर आवश्यकता अपने आप पूरी कर सकते हैं पर इसके लिये सतत् अभ्यास की आवश्यकता है। अपना उद्योग बन्द न करें। अकर्मण्यता और आलस्य का, अधीरता और प्रयत्न हीनता का साथ छोड़कर “यत्न देवो भव” की उपासना आ...

सचेतन 148 : श्री शिव पुराण- आपकी सर्वोच्च शक्ति हमारी मानसिक स्थिति का परिणाम है।

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संसार की सम्पूर्ण बाह्य रचना की शक्ति और आधार मन है। स्वयं को सर्वोच्च शक्ति के स्रोत के साथ जोड़ने से एक चमकता हुआ प्रकाश का अनुभव आप अपने अंदर करेंगे जिसको प्रकृति कहते हैं।  शक्ति के मुख्य स्रोत (source) प्रायः मनुष्यों एवं जानवरों की पेशीय ऊर्जा (muscular energy), नदी एवं वायु की गतिज ऊर्जा, उच्च सतहों पर स्थित जलाशय की स्थितिज (potential) ऊर्जा, लहरों एवं ज्वारभाटा की ऊर्जा, पृथ्वी एवं सूर्य की ऊष्मा ऊर्जा, ईंधन को जलाने से प्राप्त ऊष्मा ऊर्जा आदि हैं  सर्वोच्च शक्ति हमारी मानसिक स्थिति का परिणाम है। मन कर्त्ता है। संसार की सम्पूर्ण बाह्य रचना की शक्ति और आधार मन है। हमारा आहार, रहन-सहन, चाल-चलन व्यवहार-विचार, शिक्षा-समुन्नति यह सारी बातें हमारी मानसिक दशा के अनुरूप ही होती हैं। जैसा कुछ चिन्तन करते हैं, विचार करते हैं वैसे ही क्रिया-कलाप भी होते हैं, और तद्नुसार वैसे ही अच्छे बुरे कर्म भी बन पड़ते हैं। सुख और दुःख बन्धन और मुक्ति चूँकि इन्हीं कर्मों का परिणाम हैं इसलिये हमारे उद्धार और पतन का कारण भी हमारा मन ही है।  कोई भी बड़ा कार्य, श्रेष्ठ सत्कर्म या उन्नति करनी ...

सचेतन 147 : श्री शिव पुराण- आपकी शक्ति ही आपकी प्रकृति है

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आपके अंदर तीन प्रकार की शक्तियाँ मौजूद हैं ‘योग' के अभ्यास से एक अद्भुत सितारा (आत्मा) आपके भृकुटि के बीच सदा चमकता रहेगा। प्रमुख वैज्ञानिक और प्रसारक भले ही इस स्त्रोत की मान्यता का खंडन करें परन्तु अनेक अनेक लोग दैनिक प्रार्थना, चिंतन, सकारात्मक पुष्टिकरण इत्यादि द्वारा अपने जीवन को सशक्त एवं आशावान बनाने में इसका उपयोग करते हैं | योग अभ्यास का प्रयोग करें अथवा न करें, यह आपका निजी फैसला है |  इस प्रतिक्रिया की शुरुआत में सोचिये मैं, प्रकाश हूँ, चमकता हुआ प्रकाश। स्वयं को सर्वोच्च शक्ति के स्रोत के साथ जोड़ने से एक चमकता हुआ प्रकाश का अनुभव आप अपने अंदर करेंगे जिसको प्रकृति कहते हैं।  व्यापकतम अर्थ में, प्रकृति यानी प्राकृतिक, भौतिक या पदार्थिक जगत या ब्रह्माण्ड हैं। "प्रकृति" का सन्दर्भ भौतिक जगत के दृग्विषय से हो सकता है और सामन्यतः जीवन से भी हो सकता हैं। प्रकृति का अध्ययन, विज्ञान के अध्ययन का बड़ा हिस्सा है। यद्यपि मानव प्रकृति का हिस्सा है, मानवी क्रिया को प्रायः अन्य प्राकृतिक दृग्विषय से अलग श्रेणी के रूप में समझा जाता है। आपकी प्रकृति 'उमा' नाम से विख्या...

सचेतन 146 : श्री शिव पुराण- स्वयं को सर्वोच्च शक्ति के स्रोत के साथ जोड़ना

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सचेतन 146 : श्री शिव पुराण- स्वयं को सर्वोच्च शक्ति के स्रोत के साथ जोड़ना

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एक अद्भुत सितारा (आत्मा) भृकुटि के बीच सदा चमकता है। आज हम बात करेंगे की एक अद्भुत सितारा (आत्मा) भृकुटि के बीच सदा चमकता है। जिससे आपके ईश्वरीय गुण से विकसित व्यक्तित्व का निर्माण होता है।  शिव स्वरूप और ईश्वरीय गुण का आभास और दर्शन होने के बाद आपको स्वयं एक अनुभव होता है की हम कुछ आध्यात्मिक कार्य करें धीरे धीरे आप देखेंगे की ब्रह्माजी स्वयं आपकी भृकुटि से प्रकट होंगे। ब्रह्माजी आपके सृष्टि के निर्माता बन जाएँगे, श्रीहरि विष्णु इसका पालन करेंगे  तथा आपके स्थिरता के लिए रुद्र रूप भी उपस्थित होगा जो प्रलय के समय काम आयेगा।  एक अद्भुत सितारा (आत्मा) भृकुटि के बीच सदा चमकता है। व्यक्तित्व अभौतिक है, आप वास्तविक रूप में आत्मा हैं। आप शरीर नहीं है। ये शरीर आपका है पर आप शरीर नहीं हैं। जिस मानव का हार्ट ट्रान्सप्लांट किया जाता है उसका स्वभाव दान किये व्यक्ति जैसा नहीं बन जाता है। हार्ट प्राप्त किये हुए व्यक्ति का व्यक्तित्व ठीक वैसा ही रहता है जैसा कि पहले था। - भारतीय संस्कृति में भृकुटि के मध्य तिलक लगाना अथवा बौद्ध धर्म में तीसरी आँख का उल्लेख, आत्मा का ही प्रतीक हैं हालांक...

सचेतन 145 : श्री शिव पुराण- ईश्वरीय गुण का आभास और दर्शन

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 भक्तवत्सल यानी भगवान की सच्चे दिल से भक्ति करना। ईश्वरीय गुण का आधार शिव हैं जिसमें सृष्टि का निर्माण, उसका पालन करना और संहार कर्ता के रूप में महसूस किया जाता है। यह गुण एक व्यक्तित्व पर्सनालिटी का निर्माण करता है जिसको आप शारीरिक रूप से यानी भौतिक रूप में नहीं देख सकते हैं यह व्यक्तित्व का एक अभौतिक पहलू है।  जब शिव के स्वरूप को सगुण और निर्गुण रूप से समझते हैं तो आपका ईश्वरीय गुण  या आपका व्यक्तित्व वास्तविक रूप में आपकी आत्मा से ही पता चलता है। आप शरीर को देखकर ईश्वरीय गुण का निर्धारण नहीं कर सकते हैं। ये शरीर आपका है पर आप शरीर नहीं हैं।  जिस मानव का हार्ट ट्रान्सप्लांट किया जाता है उसका स्वभाव दान किये व्यक्ति जैसा नहीं बन जाता है। हार्ट प्राप्त किये हुए व्यक्ति का व्यक्तित्व ठीक वैसा ही रहता है जैसा कि पहले था।  ईश्वरीय गुण का आभास और दर्शन आपको भृकुटि के मध्यम से हो सकता है। भारतीय संस्कृति में भृकुटि के मध्य तिलक लगाना अथवा बौद्ध धर्म में तीसरी आँख का उल्लेख, यह आत्मा का ही प्रतीक हैं हालांकि इन नयनों से आत्मा दिखती नहीं है किन्तु इसकी आंतरिक शक्ति का ...

सचेतन 144 : श्री शिव पुराण- ईश्वरीय गुण

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शिवरूप सनातन है  शिवजी कहते हैं ;-- मैं सृष्टि, पालन और संहार का कर्ता हूं। मेरा स्वरूप सगुण और निर्गुण है! मैं ही सच्चिदानंद निर्विकार परमब्रह्म और परमात्मा हूं।  ईश्वरीय गुण आने के बाद आप अपने कर्म व स्वभाव को जानना प्रारंभ कृति हैं जिससे आपका संबंध संसार के साथ और मज़बूत होता है।  ईश्वर के गुणों की चर्चा करें तो ईश्वर जड़ पदार्थ न होकर वह एक सच्चिदानन्दस्वरूप गुणों वाली सत्ता है। इसका अर्थ यह है कि ईश्वर की सत्ता है, वह चेतन पदार्थ है तथा वह सदा सर्वदा सब दिन व काल में आनन्द में अवस्थित रहता है। उसे कदापि दुःख व अवसाद आदि नहीं होता जैसा कि जीवात्माओं व मनुष्यों को होता है।  चेतन का अर्थ है कि ज्ञानयुक्त वा संवेदनशील सत्ता।  सृष्टि के पालन और संहार का कर्ता का अर्थ सृष्टि की रचना, उसकी रक्षा और प्रलयरूप में भी अपने गुणों को नहीं छोड़ना से है जिसके कारण ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र नाम धारण कर तीन रूपों में विभक्त  करके शिव की पहचान है।  मैं भक्तवत्सल हूं और भक्तों की प्रार्थना को सदैव पूरी करता हूं। मेरे इसी अंश से रुद्र की उत्पत्ति होगी। रुद्र दु:ख का नि...

सचेतन 143 : श्री शिव पुराण- ईश्वर का दर्शन संभव है।

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जीवन के आनंदमय यात्रा में सृष्टि का आभास  श्री शिव पुराण की कथा हमारे जीवन के विकास की अनंत संभावनाओं को बताता है।लेकिन इन संभावनाओं के होते हुए भी, हम जीवन में वो हासिल नहीं कर पाते जिसके हम योग्य होते हैं, इसका कारण सिर्फ यही है की हम ख़ुद को नहीं पहचान पाते हैं।    हम ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ महावाक्य के बारे में बहुत बार बात करते हैं। इस महावाक्य का अर्थ है- 'मैं ब्रह्म हूं। यहाँ 'अस्मि' शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब हम उसी के रूप में ढल जाते हैं।  जैसे आप जिस वातावरण में रहेंगे आप वैसे ही बन जाएंगे।अगर बात करें आपके रूप की तो आपका मनुष्य जीवन वास्तविक रूप में तो देवताओं के श्रेष्ठ रूप की प्रतिमूर्ति   है, जरूरत है तो बस इसे पहचानने की। जीवन का यदि कोई नाद है तो वह है शिवोहम शिवोहम। यह जानना की मै केवल शरीर भर नहीं, ब्रह्म हूँ और ईश्वर को प्राप्त करने का सामर्थ्य मुझमे है, कठिन जरूर है, असंभव नहीं।आप अपने अंदर की आवाज़ को सुने। जिस दिशा से आवाज़ आ रही हो उस दिशा की ओर चलने की आवश्यकता है।  बाकी जब ह...

सचेतन 142 : श्री शिव पुराण- शिवोहम

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हम यह कहें की शिव तत्व आपको सत् से प्रीति करा कर आपके दुःख का नाश अवश्यंभावी कर देता है। प्रत्येक अवस्थाओं का साक्षी होना ही शिव है, सत् है, यही ईश्वर है, यही चैतन्य है, यही ज्ञानस्वरूप है और यही आनंद स्वरूप है। समस्त शास्त्र, तपस्या, यम और नियमों का निचोड़ यही है कि इच्छामात्र दुःखदायी है और इच्छा का शमन मोक्ष है। इच्छा के शमन से परम पद की प्राप्ति होती है। इच्छारहित हो जाना यही निर्वाण है। शिवोहम का अर्थ है मैं ही शिव हूं।परम ब्रह्म मैं ही हूं। है सदाशिव जो परम ब्रह्म और सर्वप्रथम प्रगट हुए हैं। जिन्होंने स्वयं सृष्टि का निर्माण किया। इसका अर्थ है कि दोनों एक ही हैं। अहम् ब्रह्मास्मि अर्थात मैं ही ब्रह्म हूँ। ब्रह्म अर्थात परम ब्रह्म जो कि स्वयं शिव। फिर वो अलग कहां हुये? मनुष्य ईश्वर का ही अंश है. कहते हैं पंच तत्वों से बना ये मानव शरीर मृत्यु होने पर उन्ही पांच तत्वों में विलीन हो जाता है. आत्मा अजर अमर है, मनुष्य पृथ्वी पर जन्म लेता है तो अलग अलग रूप में, एक जीव चौसट लाख योनियां भोगकर मनुष्य बनता है. मनुष्य का शरीर पाकर वो अपने पुराने जन्मों के विषय में भूल जाता है. विस्मृति उसे प...

सचेतन 141 : श्री शिव पुराण- शिव तत्व आपके विश्वास का नाम है

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शिव तत्व के प्रवेश मात्र से आपको वर्तमान परिस्थित का ज्ञान होता जाएगा।  शिव तत्व आपके विश्वास का नाम है। जब आप अपने आप को सिर्फ़ कारण या निमित्त मात्र सोच कर विश्वास करते हैं और आप इस विचार मात्र को सत्य मानते हैं की कोई है जो आपको सहयोग करेगा और आप धीरज रखकर नित्य निरन्तर और स्थायी रूप से आप विचार मात्र पर विश्वास करते हैं जो आपको प्रशस्त करता है की कोई श्रेष्ठ या उत्तम या यूँ कहें की अच्छा सा है जो हमारा भला करेगा। यह शुद्ध और पवित्र दृढ़ भाव आपको स्थिर कर देता है और आप वर्तमान परिस्थित या समय में विद्यमान होना शुरू करते हैं आपको ठीक या उचित समझने में आ जाता है। यह वर्तमान में रहने का जीने का सोच आपको मनोहर और सुंदर लगने लगता है यही सत् है।  आपका ज्ञान विद्वान् और पंडित की तरह होने लगता है यानी आपका लिया हुआ हरेक विचार, फ़ैसला और प्रतिज्ञा मान्य होता है, आपके आस पास का माहोल पूज्य और आनंदमय बन जाता है।  सत् वह है जो शाश्वत है नित्य है, सुखस्वरूप महसूस होता है, आनंदस्वरूप का आभास दिलाता है, और ज्ञानस्वरूप बनाता है। वही असत् का अर्थ है जो नश्वर है यानी नष्ट होनेवाला या यह...